फिर से पटरी पर लौटते बैंक

0
18
PSB

राज एक्सप्रेस, भोपाल। सरकार और बैंकों (Bank) के प्रयास से बैंकों के फंसे कर्ज यानी एनपीए का इलाज मुमकिन लग रहा है। कहा जा सकता है कि सरकार और बैंकों के प्रयास से फंसे कर्ज की वसूली के मोर्चे पर बेहतर परिणाम दृष्टिगोचर होने लगे हैं, जिससे बैंकिंग क्षेत्र मजबूती की ओर अग्रसर हो रहा है। जाहिर है, बैंकिंग क्षेत्र के मजबूत होने से अर्थव्यवस्था के और भी बेहतर होने की संभावना निश्चित रूप से बढ़ेगी।

भले ही बैंकों के फंसे कर्ज यानी एनपीए का इलाज लोगों को मुश्किल लग रहा है, लेकिन सरकार और बैंकों के प्रयास से मामले में सकारात्मक परिणाम परिलक्षित होने लगे हैं। एक तरफ सरकार समय-समय पर बैंकों को विभिन्न जरूरतों जैसे नियामकीय और फंसे कर्ज आदि के लिए पूंजी मुहैया करा रही है तो दूसरी तरफ नए-नए कानूनों जैसे, भगोड़ा विधेयक, ऋणशोधन अक्षमता और दिवालिया संहिता आदि के माध्यम से बैंकों को फंसे कर्ज की वसूली में मदद पहुंचा रही है। बैंकों का सकल फंसा कर्ज (ग्रॉस एनपीए) वित्त वर्ष 2017-18 में बढ़कर 11.2 प्रतिशत, राशि में 10.39 लाख करोड़ रुपए हो गया, जिसमें सरकारी बैंकों का सकल फंसा कर्ज 8.95 लाख करोड़ रुपए था, जो उनके कुल कर्ज का 14.6 प्रतिशत है। वित्त वर्ष 2016-17 में समस्त बैंकों का सकल फंसा कर्ज 9.3 प्रतिशत था, जबकि सरकारी बैंकों का सकल फंसा कर्ज 11.7 प्रतिशत था। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी ट्रेंड्स एंड प्रोग्रेस ऑफ बैंकिंग इन 2017-18 नाम की रिपोर्ट में कहा गया है कि पुनर्गठित कजरे के फंसे कर्ज में तब्दील होने और फंसे कर्ज की पहचान की प्रक्रिया पूरी हो जाने के कारण वित्त वर्ष 2017-18 में सरकारी बैंकों का सकल फंसा कर्ज अनुपात 14.6 प्रतिशत पहुंच गया, जबकि शुद्ध फंसे कर्ज का अनुपात आठ प्रतिशत था, जो एक साल पहले 6.9 प्रतिशत था।

हालांकि, निजी बैंकों का सकल फंसा कर्ज का अनुपात आलोच्य अवधि में 4.7 प्रतिशत रहा, जो एक साल पहले 4.1 प्रतिशत था, वहीं विदेशी बैंकों के फंसे कर्ज में आलोच्य अवधि में गिरावट दर्ज की गई। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय बैंक के नए गवर्नर शक्तिकांत दास भी फंसे कर्ज के मामले में बैंकों को कोई रियायत देने के मूड में नहीं हैं। इस बात की तस्दीक उनके हालिया बयान से की जा सकती है। उन्होंने कहा है कि फंसे कर्ज की बड़ी राशि और उसके नकारात्मक प्रभावों से निपटने के लिए अपर्याप्त प्रावधान के परिप्रेक्ष्य में पूंजी संबंधी नियामकीय जरूरतों या जोखिम की स्थिति में पूंजी की पर्याप्तता के नियमों में किसी भी तरह की ढील का दिया जाना बैंकों के साथ-साथ पूरी अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। हालांकि, आईबीसी और फंसी संपत्तियों के समाधान के लिए रिजर्व बैंक की संशोधित रूपरेखा से फंसे कर्ज और इसकी वसूली दर में तेजी आई है। वित्त वर्ष 2017-18 में फंसे कर्ज की वसूली के लिए आईबीसी के तहत नौ हजार 929 अरब रुपए के 701 मामले भेजे गए, जिनमें चार हजार 925 अरब की वसूली की गई। इस तरह, आईबीसी के जरिए वसूली का प्रतिशत 50 है, जो अन्य वसूली के तंत्रों मसलन, लोक अदालत, डीआरटी और सरफेसी कानून आदि में सबसे बेहतर है। लोक अदालत के द्वारा वसूली करने का प्रतिशत चार, डीआरटी के जरिए 5.4 और सरफेसी कानून के द्वारा 25 है।

सरकारी बैंकों के फंसे कर्ज में कमी आई है और बैंक ज्यादातर फंसने वाले संभावित कर्जो की पहचान कर चुके हैं। साथ ही, उनके तुलन पत्र में दिखाने का काम भी लगभग पूरा हो गया है। वित्त वर्ष 2019 की पहली छमाही में इसमें 23 हजार 860 करोड़ रुपए की कमी आई है। पुनर्गठित कर्ज भी मार्च 2017 के सात प्रतिशत से घटकर सितंबर-2018 तक 0.59 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया है। वित्त मंत्रलय के आंकड़ों के अनुसार जिन ऋण खातों की किस्त जमा करने में 31 से 90 दिनों की देरी हुई है और जो अब तक फंसे कर्ज में तब्दील नहीं हुए हैं उनमें लगातार पांच तिमाहियों में 61 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है और यह सितंबर 2018 में यह 0.87 लाख करोड़ रुपए रह गया, जबकि जून-2017 में ऐसे संभावित फंसे कर्ज 2.25 लाख करोड़ रुपए के थे। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में सरकारी बैंकों ने रिकॉर्ड 60 हजार 726 करोड़ की वसूली की है, जो साल भर पहले की इसी तिमाही का दोगुना है। सरकारी बैंकों का प्रोविजन कवरेज रेशियो (पीसीआर) मार्च-2015 में 46.04 प्रतिशत था, जो सितंबर-2018 तक बढ़कर 66.85 प्रतिशत हो गया। यह अनुपात बैंकों की नुकसान सहने की क्षमता के बारे में बताता है। साफ है, सरकारी बैंकों की नुकसान सहने की क्षमता में इजाफा हुआ है।

इधर, सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के सात बैंकों में पुनर्पूजीकरण बॉन्ड के जरिए जल्द ही 28 हजार 615 करोड़ रुपए की पूंजी डालेगी। इस राशि से बैंक अपनी नियामकीय पूंजी की जरूरत को पूरा कर सकेंगे। इन सात सरकारी बैंकों में से बैंक ऑफ इंडिया को सबसे अधिक 10 हजार 86 करोड़ रुपए मिलेंगे। इसके बाद ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स को पांच हजार 500 करोड़ और बैंक ऑफ महाराष्ट्र को चार हजा 498 करोड़ रुपए मिलेंगे। यूको बैंक को तीन हजार 56 करोड़ रुपए और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को दो हजार 159 करोड़ रुपए मिलेंगे। सरकार ने इससे पहले वित्त वर्ष 2018-19 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में 65 हजार करोड़ रुपए की पूंजी डालने की घोषणा की थी। इसमें से 23 हजार करोड़ रुपए की राशि सरकारी बैंकों को दी जा चुकी है, जबकि 42 हजार करोड़ रुपए अभी बैंकों को मिलने हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 41 हजार करोड़ रुपए अतिरिक्त तौर पर देगी, जो पहले की घोषित राशि से अलग होगी। इससे सरकारी बैंकों में केंद्र की तरफ से लगाई जाने वाली रकम 65 हजार करोड़ से बढ़कर 1.06 लाख करोड़ हो जाएगी। सरकारी बैंकों को पूंजी मुहैया कराने से कम से कम दो या तीन बैंक रिजर्व बैंक के प्रॉम्प्ट करेक्टिव ऐक्शन यानी पीसीए के दायरे से मार्च-2019 तक बाहर आ जाएंगे। वित्त मंत्री के अनुसार इससे सरकारी बैंकों की लोन देने की क्षमता बढ़ेगी और वे रिजर्व बैंक के पीसीए फ्रेमवर्क से बाहर आ पाएंगे। पीसीए में उन बैंकों को डाला जाता है, जो कुछ महत्वपूर्ण वित्तीय मानकों का पालन नहीं कर पाते हैं। पीसीए में डाले जाने के बाद बैंकों के लोन देने और नई शाखाएं खोलने पर रोक लगा दी जाती है। सरकारी बैंकों के लिए चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही का परिणाम मिला-जुला रहा। कुछ सरकारी बैंक दूसरी तिमाही में मुनाफे में आ गए तो कुछ अभी भी घाटे में हैं। भारतीय स्टेट बैंक ने दूसरी तिमाही में 945 करोड़ रुपए का मुनाफा अर्जित किया। केनरा बैंक भी दूसरी तिमाही में 300 करोड़ का मुनाफा अर्जित करने में सफल रहा। हालांकि, बैंक ने इस अवधि में 1700 करोड़ रुपए की वसूली की, लेकिन इस राशि का बड़ा हिस्सा फंसे कर्ज के लिए किए गए प्रावधान में चला गया। अन्यथा बैंक की मुनाफा राशि ज्यादा होती। बैंक ऑफ बड़ौदा ने भी दूसरी तिमाही में बेहतर प्रदर्शन किया है। एक अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2019 में सरकारी बैंकों के प्रदर्शन में और भी सुधार आ सकता है।

रिजर्व बैंक ने 31 दिसंबर को अपने एक बयान में कहा कि बैंकिंग क्षेत्र फंसे कर्ज की समस्या से बाहर निकल रहा है और 2015 के बाद पहली बार इसमें कमी आई है। केंद्रीय बैंक ने अपनी अर्धवार्षिक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट में कहा कि बैंकिंग क्षेत्र पटरी पर लौट रहा है। हालांकि, फंसे कर्ज का मौजूदा स्तर अभी भी काफी ऊंचा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बैंकों के कर्जो की गुणवत्ता सुधरी है। उनका सकल फंसा कर्ज सितंबर 2018 में घटकर 10.8 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गया,जो मार्च 2018 में 11.5 प्रतिशत था। वैसे,खनन, खाद्य प्रसंस्करण और निर्माण क्षेत्रों में दबाव अभी भी बढ़ रहा है, लेकिन बैंक इसके समाधान के लिए भी कोशिश कर रहे हैं। इस रिपोर्ट की प्रस्तावना में रिजर्व बैंक के नए गवर्नर ने कहा कि बैंकिंग क्षेत्र फंसे कर्ज के दबाव से बाहर आ रहा है। सितंबर 2015 के बाद सकल फंसे कर्ज के अनुपात में पहली छमाही में कमी और प्रावधान कवरेज अनुपात में सुधार आना सकारात्मक संकेत है।
सतीश सिंह (आर्थिक मामलों के जानकार)

No ratings yet.

Please rate this

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Enter Captcha Here : *

Reload Image