गवाहों की सुरक्षा मुकम्मल हो

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Witness Protection Program

राज एक्सप्रेस, भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों और उनके परिवार के सदस्यों को उनकी जान और साख के खिलाफ किसी भी खतरे से रक्षा करने की सरकार की योजना को मंजूरी दे दी है (Witness Protection Program)। गवाहों को सुरक्षा न मिलने से ही वे अदालतों में सच बताने से डरते हैं और अपराधी कानून से बच जाते हैं।

गवाहों को धमका कर या मारपीट कर गवाही से रोकना आम बात है। अधिकांश मामलों में ऐसे ही कारणों से गवाह भी मुकर जाते हैं। यही कारण है कि पुलिस अधिकांश मुकदमे हार जाती है और मुजरिम अदालत से बरी हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट भी सरकारों को हिदायत दे चुकी है कि वह गवाहों को सुरक्षा उपलब्ध कराए और किसी मामले में गवाह को कोई नुकसान न पहुंचे। पर अब तक इस दिशा में कोई गंभीर पहल होती नहीं दिखी है। अब सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों और उनके परिवार के सदस्यों को उनकी जान और साख के खिलाफ किसी भी खतरे से रक्षा करने की सरकार की योजना को मंजूरी दे दी है। न्यायालय ने सभी राज्यों से इसे अक्षरश: लागू करने के लिए कहा है। आसाराम से जुड़े बलात्कार मामले के गवाहों के संरक्षण के लिए दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट में गवाहों को सुरक्षा मुहैया कराने की योजना की बात सामने आई थी। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि 2019 के अंत तक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा सभी जिला अदालतों में संवेदनशील गवाहों के बयान दर्ज कराने के लिए परिसर बनाए जाएं।

इस आदेश से पहले दिल्ली सरकार ने गवाहों की सुरक्षा के लिए नीति बनाकर एक मिसाल कायम की थी। 2015 में इस पहल के बाद दूसरे राज्यों से अपेक्षा की गई थी कि वे भी इस योजना पर दिलचस्पी दिखाएंगे, मगर ऐसा हो नहीं सका। बता दें कि दिल्ली सरकार ने गवाहों की सुरक्षा के लिए जो विशेष नीति बनाई है, उसके तहत अलग-अलग मामलों के गवाहों का वर्गीकरण किया जाएगा। सुरक्षा के लिए फंड का इंतजाम किया जाएगा और यह व्यवस्था की जाएगी कि गवाहों की बात संबंधित अथॉरिटी व अधिकारी तक ठीक से पहुंच सके। दिल्ली सरकार ने भी यह कदम तब उठाया था, जब हाईकोर्ट ने उसे सुस्ती के लिए फटकार लगाई थी। गवाहों की सुरक्षा को लेकर पिछले कुछ वर्षो में बहस तेज हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार इस ओर ध्यान खींचा लेकिन किसी भी सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। इस बीच कई हाई प्रोफाइल केस सामने आए, जिनमें गवाहों को जोर-जबर्दस्ती के बल पर या पैसे का लालच देकर बयान बदलने के लिए बाध्य किया गया और वे तब भी इसके लिए राजी नहीं हुए तो उनकी हत्या कर दी गई।

जेसिका लाल हत्याकांड और यूपी के एनएचआरएम घोटाले को लोग भूले नहीं हैं, जिनमें एक मामले में कुछ गवाह काफी दूर तक जाकर पलट गए, जबकि दूसरे में गवाहों की अकाल मौतों की झड़ी सी लग गई। हमारे देश में न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी है कि एक गवाह का काफी समय अदालत के चक्कर काटने में ही खर्च हो जाता है। ऐसे में देर-सबेर उसकी नैतिक ऊर्जा का चुक जाना स्वाभाविक है। ज्यादातर लोग जान के भय से सब कुछ जानते हुए भी गवाही देने से बचते हैं। इसके विपरीत विकसित देशों में गवाहों के लिए काफी ठोस कानून बने हुए हैं। हमें भी ऐसी व्यवस्था बनानी होगी।

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