अंतरिक्ष में भारत की बढ़ती धमक

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ISRO

राज एक्सप्रेस, भोपाल। इसरो (ISRO) ने भारत सहित नौ देशों के कुल 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचा है। इसरो की कम लागत में प्रक्षेपण की खूबी से दुनियाभर का ध्यान भारत की ओर आकर्षित किया है। हालांकि, अंतरिक्ष क्षेत्र में अब भी ढेरों चुनौतियां हैं, जिन पर इसरो को अपना एकाधिकार जमाना होगा और हर तरह से अपना वर्चस्व स्थापित करना होगा।

इसरो (ISRO) ने एक बार फिर अंतरिक्ष में इतिहास रचते हुए भारत सहित नौ देशों के कुल 31 उपग्रहों को पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) सी-43 के जरिए लॉन्च कर दिया। इस प्रक्षेपण की खास बात यह है कि इसरो ने दो साल में चौथी बार 30 से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च किए। जनवरी 2017 में 104 उपग्रह लॉन्च कर इसरो ने रिकॉर्ड बनाया था। ग्लोबल सैटेलाइट मार्केट में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है। अभी यह इंडस्ट्री 200 अरब डॉलर से ज्यादा की है। इसमें अमेरिका की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है जबकि भारत की हिस्सेदारी अब लगातार साल दर साल बढ़ रही है। सैटेलाइट ट्रांसपोंडर को लीज पर देने, भारतीय और विदेशी क्लाइंटस को रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट की सेवाओं को देने के बदले में हुई कमाई से इसरो का राजस्व लगातार बढ़ रहा है। एक साथ कई उपग्रहों के प्रक्षेपण के सफल होने से दुनिया भर में छोटी सैटेलाइट लॉन्च कराने के मामले में इसरो पहली पसंद बन जाएगा, जिससे देश को आर्थिक तौर पर फायदा होगा।
पीएसएलवी की यह अब तक की 45वीं उड़ान थी जिसमें एक माइक्रो व 29 नैनो सैटेलाइट शामिल हैं। पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी) की इस साल में यह छठीं उड़ान थी। इसमें भारत के सबसे ताकतवर इमेजिंग सैटेलाइट हाइसइस के अलावा अमेरिका (23 उपग्रह) और ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, कोलंबिया तथा फिनलैंड, मलयेशिया, नीदरलैंड और स्पेन (प्रत्येक का एक उपग्रह) के उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया। इसरो के अनुसार इन उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए उसकी वाणिज्यिक इकाई (एंट्रिक्स कारपोरेशन लिमिटेड) के साथ करार किया गया है। कुछ साल पहले एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को लांच करने से मना कर दिया था। आज स्थिति यह है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत से अपने उपग्रहों को प्रक्षेपित करवा रहे हैं।

कम लागत और बेहतरीन टेक्नोलॉजी की वजह से दुनिया के कई देश इसरो के साथ व्यावसायिक समझौता करने आगे आ रहे हैं। अब पूरी दुनिया में सैटेलाइट के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार का क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि यह सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं इसलिए उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं। कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की सबसे बड़ी ताकत है जिसकी वजह से स्पेस इंडस्ट्री में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा। हाल में ही प्रक्षेपित हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह (हाइसइस) को 44.4 मीटर लंबे और 230 टन वजनी पीएसएलवी सी-43 से रॉकेट से छोड़ा गया है। पृथ्वी की निगरानी के लिए इसरो ने हाइसइस को विशेष रूप से तैयार किया है। हाइसइस पृथ्वी की मैग्नेटिक फील्ड का भी अध्ययन करेगा, साथ ही सतह का भी अध्ययन करेगा। एक विशेष चिप की मदद से तैयार किया गया ऑप्टिकल इमेजिंग डिटेक्टर ऐरे रणनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। हाइसइस की मदद से पृथ्वी धरती के चप्पे-चप्पे पर नजर रखना आसान हो जाएगा। अब धरती से 630 किमी दूर अंतरिक्ष से पृथ्वी पर मौजूद वस्तुओं के 55 विभिन्न रंगों की पहचान आसानी से की जा सकेगी।

इस उपग्रह का मूल उद्देश्य पृथ्वी की सतह के साथ इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पैक्ट्रम में इंफ्रारेड और शॉर्ट वेव इंफ्रारेड फील्ड का शोध करना है। हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग या हाइस्पेक्स इमेजिंग की एक खूबी यह भी है कि डिजिटल इमेजिंग और स्पेक्ट्रोस्कोपी की शक्ति को जोड़ती है। हाइस्पेक्स इमेजिंग अंतरिक्ष से एक दृश्य के हर पिक्सल के स्पेक्ट्रम को पढ़ने के अलावा पृथ्वी पर वस्तुओं, सामग्री या फिर प्रक्रियाओं की अलग पहचान भी करती है। इससे पर्यावरण सर्वेक्षण, फसलों के लिए उपयोगी जमीन का आकलन, तेल व खनिज पदार्थो की खानों की खोज आसान होगी। असल में इतने सारे उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में छोड़ना आसान काम नहीं है। इन्हें कुछ वैसे ही अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया जाता है जैसे स्कूल बस बच्चों को क्रम से अलग-अलग ठिकानों पर छोड़ती जाती हैं। तेज गति से चलने वाले अंतरिक्ष रॉकेट के साथ एक-एक सैटेलाइट के प्रक्षेपण का तालमेल बिठाने के लिए बेहद काबिल तकनीशियनों और इंजीनियरों की जरूरत पड़ती है। अंतरिक्ष प्रक्षेपण के फायदेमंद बिजनेस में इसरो को नया खिलाड़ी माना जाता है। इस कीर्तिमान के साथ सस्ती और भरोसेमंद लॉन्चिंग में इसरो की ब्रांड वैल्यू में इजाफा होगा। लॉन्चिंग के कई और कॉन्ट्रेक्ट एजेंसी की झोली में गिरने की उम्मीद है।

कम लागत और लगातार सफल लांचिंग की वजह से दुनिया का हमारी स्पेस टेक्नोलॉजी पर भरोसा बढ़ा है तभी अमेरिका सहित कई विकसित देश अपने सैटेलाइट की लांचिंग भारत से कराने आ रहे हैं। फिलहाल हम अंतरिक्ष विज्ञान, संचार तकनीक, परमाणु ऊर्जा और चिकित्सा के मामलों में न सिर्फ विकसित देशों को टक्कर दे रहे हैं बल्कि कई मामलों में उनसे भी आगे निकल गए हैं। अंतरिक्ष बाजार में भारत के लिए संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं, इसने अमेरिका सहित कई बड़े देशों का एकाधिकार तोड़ा है। असल में, इन देशों को हमेशा यह लगता रहा है कि भारत यदि अंतरिक्ष के क्षेत्र में इसी तरह से सफलता हासिल करता रहा तो उनका न सिर्फ उपग्रह प्रक्षेपण के कारोबार से एकाधिकार छिन जाएगा बल्कि मिसाइलों की दुनिया में भी भारत इतनी मजबूत स्थिति में पहुंच सकता है कि बड़ी ताकतों को चुनौती देने लगे। पिछले दिनों दुश्मन मिसाइल को हवा में ही नष्ट करने की क्षमता वाली इंटरसेप्टर मिसाइल का सफल प्रक्षेपण इस बात का सबूत है कि भारत बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा तंत्र के विकास में भी बड़ी कामयाबी हासिल कर चुका है। दुश्मन के बैलिस्टिक मिसाइल को हवा में ही ध्वस्त करने के लिए ही भारत ने सुपरसोनिक इंटरसेप्टर मिसाइल बनाकर कई देशों की नींद उड़ा दी है।

अरबों डॉलर का मार्केट होने से भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। इसमें और ज्यादा प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग भी संभव है। ऐसे में भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। जो देश में गरीबी दूर करने और विकसित भारत के सपने को पूरा करने में इसरो काफी मददगार साबित हो सकता है। कुल मिलाकर एक साथ कई उपग्रहों के सफलतापूर्वक प्रक्षेपण से इसरो को बहुत ज्यादा व्यावसायिक फायदा होगा जो भविष्य में इसरो के लिए संभावनाओं के नए दरवाजे खोल देगा जिससे भारत को निश्चित रूप से बहुत फायदा पहुंचेगा। अब समय आ गया है कि जब इसरो व्यावसायिक सफलता के साथ अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तरह अंतरिक्ष अन्वेषण पर ज्यादा ध्यान दे।

इसरो को अब अंतरिक्ष अन्वेषण और शोध के लिए दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी क्योंकि जैसे जैसे अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी वैसे-वैसे अंतरिक्ष अन्वेषण बेहद महत्वपूर्ण होता जाएगा। इस काम इसके लिए सरकार को इसरो का सालाना बजट भी बढ़ाना पड़ेगा जो कि फिलहाल नासा के मुकाबले काफी कम है। भारी विदेशी उपग्रहों को अधिक संख्या में प्रक्षेपित करने के लिए हमें पीएसएलवी के साथ-साथ जीएसएलवी रॉकेट का भी उपयोग करना होगा। पीएसएलवी अपनी सटीकता के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है लेकिन ज्यादा भारी उपग्रहों के लिए जीएसएलवी का प्रयोग करना ही होगा। फिर मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान पर भी इसरो को जल्द काम शुरू करना होगा।
शशांक द्विवेदी (तकनीकी मामलों के जानकार)

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