जी-20 की उपलब्धियां और चुनौतियां

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G-20 Summit 2018

राज एक्सप्रेस, भोपाल। अर्जेटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित जी-20 देशों का 13वां शिखर सम्मेलन (G-20 Summit 2018) भारत के लिहाज से बेहतर रहा। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में ढांचागत सुधार और भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर सख्ती के प्रस्ताव पर सहमति बनी है। इन दोनों ही पहलुओं पर गंभीरता से अपना पक्ष रखता रहा है। कई ऐसे मुद्दे भी रहे, जिन पर एक राय नहीं बन पाई है।

जटिल वैश्विक कूटनीतिक दावपेचों के बीच अर्जेटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित जी-20 देशों का 13वां शिखर सम्मेलन वैश्विक व्यापार, डब्ल्यूटीओ में सुधार, रोजगार, निवेश, संरक्षणवाद, आतंकवाद और पर्यावरण जैसे मुदें पर विस्तृत चर्चा के साथ संपन्न हो गया। वैश्विक व्यापार को लेकर चल रही तनातनी के बीच राहत की बात रही कि जी-20 के देशों ने एकस्वर में विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में ढांचागत सुधार पर हामी भरी। संगठन के देशों ने बेहिचक स्वीकार भी किया कि विश्व व्यापार संगठन वृद्धि और रोजगार सृजन के अपने उद्देश्यों को हासिल करने में विफल रहा है। यह संभव है कि आने वाले वक्त में विश्व व्यापार संगठन को रोजगारोन्मुख बनाने की पहल तेज हो। जी-20 शिखर सम्मेलन भारत के लिए इस अर्थ में ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आर्थिक अपराधियों के खिलाफ पेश नौ-सूत्रीय एजेंडा को संगठन के सभी देशों ने गंभीरता से लिया और माना कि भगोड़े आर्थिक अपराधियों को प्रवेश देने और सुरक्षित पनाहगाह पाने से रोकने के लिए एक पूरा तंत्र विकसित करने की जरूरत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नौ सूत्रीय एजेंडे में संगठन के सभी देशों से आग्रह भी किया कि भगोड़े आर्थिक अपराधियों से निपटने के लिए कानूनी प्रक्रिया में सहयोग के साथ यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन अगेंस्ट करप्शन और यूनाइटेड नेशंस अगेंस्ट ट्रांसनेशनल आर्गनाइज्ड क्राइम के सिद्धांतों खासकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग से संबंधित को पूर्णत: एवं प्रभावी तरीके से क्रियान्वित करने की जरूरत है। गौरतलब है कि भारत के कई रसूखदार आर्थिक अपराध को अंजाम देकर दूसरे देशों में शरण लिए हुए हैं। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा कि अगर संगठन के सभी इस दिशा में ठोस पहल करते हैं तो सूचना के बेहतर आदान-प्रदान के जरिए भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर शिकंजा कसा जा सकेगा। गौर करें तो प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 शिखर सम्मेलन में वैश्विक चिंताओं को साझा करते हुए इस मंच का भारत के हित में शानदार सदुपयोग किया है।

पीएम मोदी ने जहां एक ओर जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से साझा मसलों पर गंभीर विमर्श कर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझा आर्थिक वृद्धि वाला क्षेत्र बनाने की अपनी वचनबद्धता पर प्रतिबद्धता जताई वहीं चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग एवं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से भारत के इस मत का समर्थन कराने में सफल रहे कि संयुक्त राष्ट्र व डब्ल्यूटीओ जैसे अन्य संस्थानों में ढांचागत सुधार की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी की पहल से भारत, चीन और रूस के बीच 12 साल बाद दूसरी बार त्रिपक्षीय वार्ता हुई जो कि इन देशों के बीच संबंधों के पुनमरूल्यांकन, विश्वास बहाली और क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि इससे पहले इन तीनों देशों के नेताओं के बीच 2006 में त्रिपक्षीय वार्ता हुई थी। आने वाले वक्त में इस वार्ता के शानदार आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। गौर करें तो वुहान बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच यह चौथी मुलाकात है। बार-बार मुलाकात और संवाद ने दोनों देशों के रिश्तों में मिठास घोली है। उसी का परिणाम है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग दोनों ने एकस्वर में स्वीकार किया कि नियमित संवाद से दोनों देशों के रिश्तों को मजबूती मिली है। उम्मीद है कि आने वाले वक्त में दोनों देश जटिल सीमा-विवाद को भी सुलझाने में सफल रहेंगे।

भारत के लिए चीन और रूस से बेहतर संबंध रक्षा, सुरक्षा, क्षेत्रीय शांति और आर्थिक सुधार को गति देने के लिए बेहद आवश्यक है। शिखर सम्मेलन से इतर प्रधानमंत्री मोदी और संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियों गुतेरस के बीच पर्यावरण को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हुआ और पेरिस पर्यावरण समझौते पर एंटोनियों गुतेरस ने भारत के रुख की प्रशंसा की। उल्लेखनीय है कि पेरिस समझौते के तहत भारत ने 2030 तक पर्यावरण के लिए घातक गैसों का उत्सर्जन 35 प्रतिशत तक घटाने की घोषणा की है। इसके अलावा पर्यावरण की सुरक्षा के निमित्त भारत व फ्रांस ने मिलकर इंटरनेशनल सोलर एलायंस बनाया है जिसमें 121 अन्य देशों को भी जोड़े जाने की तैयारी है। इन देशों में पहुंचने वाली सूर्य की किरणों का लाभ लेते हुए उनसे ऊर्जा पैदा की जाएगी। यहां जानना आवश्यक है कि गत वर्ष जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में आयोजित जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन व दक्षिण अफ्रीका) ने जी-20 के सदस्य देशों से अमेरिका के अलग होने के बावजूद भी पेरिस जलवायु करार को कड़ाई से लागू करने की अपील की और कहा कि पेरिस समझौता अपरिवर्तनीय है और उससे पलटा नहीं जा सकता।

भारत आज भी अपनी पुरानी प्रतिबद्धता पर कायम है। प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोपियन संघ के साथ भारत के रिश्ते मजबूत करने की पहल के साथ आतंकवाद से निपटने के संयुक्त प्रयास पर भी चर्चा की। अच्छी बात है कि दोनों पक्षों ने आतंकवाद और कट्टरवाद के साथ-साथ रासायनिक, जैविक, रेडियालॉजिकल व परमाणु खतरों से निपटने के लिए सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर सहमति जताई है। भारत के लिए यह उपलब्धि है कि वह 2022 में अगले जी-20 शिखर सम्मेलन का मेजबानी करेगा। यह सम्मेलन भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि 2022 में भारत अपनी आजादी की 75 वीं सालगिरह मनाएगा। जी-20 के 13वें शिखर सम्मेलन का मूल्यांकन करें तो यह विचार-विमर्श तक सीमित रहा। उसके द्वारा मौद्रिक, वित्तीय और संरचनात्मक नीतियों पर तालमेल बिठाने और कर चोरी रोकने के संदर्भ कोई रोडमैप नहीं खींचा गया। सम्मेलन में उम्मीद थी कि जी-20 के देश आर्थिक मुद्दों विशेष रूप से असंतुलित विकास, वैश्विक मांग में कमी और ढांचागत समस्याओं से निपटने की चुनौती को सामने रख किसी ठोस समझौते को आकार देंगे। लेकिन सिर्फ चर्चा तक ही सीमित रहे। इसके अलावा काला धन से निपटने, टैक्स मामले में पारदर्शिता लाने, निवेश प्रवाह बढ़ाने, अर्थव्यवस्था के लिए मुक्त आवाजाही पर जोर, विकास के लिए ऊर्जा की आवश्यकता और कॉरपोरेट टैक्स की चोरी रोकने के लिए नीतिगत उपाय पर भी गौर नहीं फरमाया गया।

सदस्य देशों द्वारा नीतिगत समन्वय और सहयोग की दिशा में आगे बढ़कर वैश्विक वित्तीय बाजार की स्थिरता के लिए मुद्रानीति को और प्रभावी बनाने पर भी गंभीरता नहीं दिखाई गई। उम्मीद थी कि सदस्य देश मौजूदा आर्थिक ठहराव से उबरने व विश्व में रोजगारोन्मुख माहौल निर्मित करने के लिए सरकारी खर्च और वित्तीय अनुशासन के मध्य संतुलन स्थापित करने की दिशा में ठोस नीति बनाएंगे। लेकिन वे शुतुर्गमुर्गी रवैया अपनाते दिखे। सम्मेलन में संरक्षणवादी उपायों को वापस लेने के साथ कर नियमों को बेहतर बनाने की दिशा में किसी तरह की ठोस पहल नहीं हुई। अगर इस पर चर्चा हुई होती तो नि:संदेह विकासशील देशों का भला होता। मौजूदा समय में जी-20 की बड़ी चुनौती उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में रोजगार का संकट खत्म करना, धीमी वृद्धि के अलावा यूरोप में वित्तीय बाजार के बिखराव को रोकना है। अच्छी बात यह है कि भारत हर सम्मेलन में समस्याओं पर चिंता जाहिर कर जी-20 को उसका लक्ष्य याद दिला रहा है।
अरविंद जयतिलक (वरिष्ठ पत्रकार)

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