अंबेडकर की महानता में मददगार ब्राह्मण

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Dr. B. R. Ambedkar

राजएक्सप्रेस,भोपाल। डॉ. अंबेडकर (Dr. B. R. Ambedkar) के जीवन दर्शन और विचारों को अक्सर उनके अनुयायी ब्राह्मण विरोध से जोड़कर देखते हैं जबकि बाबा साहेब की शिक्षा और उत्थान के सफर में ब्राह्मणों का खूब सहयोग और योगदान रहा। बाबा साहेब के कुछ अनुयायी ब्राह्मणों से घृणा भी करते दिखते हैं और वे इसे बाबा साहेब से जोड़ते भी हैं, लेकिन अंबेडकर के विचारों में ब्राह्मणों के प्रति घृणा का भाव कभी नहीं दिखता।

बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने जीवन का सबसे अहम चुनाव स्वतंत्र मजदूर पार्टी की ओर से 17 फरवरी 1937 को मध्य मुंबई निर्वाचन क्षेत्र से लड़ा था और उनका चिह्न् ‘आदमी’ था। यह भी बेहद दिलचस्प है कि जातीय व्यवस्था का दंश भोगते भीमराव के लिए ‘आदमी’ बनने का सफर पथरीला और कांटों भरा रहा। उनके सामने सहस्त्रों वर्षो से चली आ रही सामाजिक गुलामी को उखाड़ फेंकने की कड़ी चुनौती थी। सामंती ताकतों से प्रभावित व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष तो उन्हें करना ही पड़ रहा था,वहीं करोड़ों लोगों का भविष्य बचाने का दिवास्वप्न उन्हें सोने नहीं देता था। भीमराव की लड़ाई धार्मिक और जातीय नियरेग्यताओं के खिलाफ थी, इसके मूल में हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रंथ रहे। उसके वाहक और संरक्षक ब्राह्मणों को माना गया। जाहिर है अंबेडकर के तमाम संघर्षो के केंद्र में ब्राह्मण ही रहे। अंबेडकर मनुस्मृति से बंटे समाज और ब्राह्मणों को मिले अधिकारों के प्रति जीवन भर मुखर रहे। उन्होंने 25 जुलाई-1927 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाद में सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति को जलाया था। अंबेडकर अपनी किताब ‘फिलॉसफी ऑफ हिंदूइज्म’ में लिखते हैं कि मनु ने चार वर्ण व्यवस्था की वकालत की थी। मनु ने इन चार वर्णो को अलग-अलग रखने के बारे में बताकर जाति व्यवस्था की नींव रखी। उन्होंने इस व्यवस्था के बीज बोए थे।

‘हू वेयर द शुद्राज’ में बाबा अंबेडकर ने साफ कहा था कि मैं उन धर्म पुस्तकों की पोल खोलता रहूंगा जिनके कारण देश और समाज का पतन हुआ है। मुझे विश्वास है कि यदि वर्तमान पीढ़ी के हिंदू मेरे निष्कर्षो को न मानेंगे तो भविष्य की पीढ़ी वाले उन्हें अवश्य स्वीकार करेंगे। अंबेडकर के धार्मिक किताबों और जातीय नियरेग्यताओं के विरोध को अक्सर उनके अनुयायी ब्राह्मण विरोध से जोड़कर देखते हैं जबकि बाबा साहेब की शिक्षा और उत्थान के सफर में ब्राह्मणों का खूब सहयोग और योगदान रहा। मासूम और अभिशप्त भीमराव से डॉ. अंबेडकर के सफर में जिन लोगों के उल्लेखनीय योगदान को उन्होंने स्वीकार किया उसमें अधिकांश ब्राह्मण थी थे। दरअसल, एक गरीब जाति में जन्मे भीमराव के लिए अस्पृश्यता अभिशाप की तरह थी और इसे झेलते हुए शिक्षा दीक्षा अर्जित करना मुमकिन नहीं था। इन कठिन परिस्थितियों में उनके ब्राह्मण शिक्षक ही मार्गदर्शक और संरक्षक बने।

शिक्षा के प्रारंभिक दौर में भीमराव सकपाल के नाम से जाने जाते थे, जिन्हें वहीं के स्कूल के ब्राह्मण शिक्षक ने अपना नाम अंबेडकर दिया और इसके बाद उनका यह शिष्य भीमराव अंबेडकर के नाम से पहचाना गया। जब स्कूल भी जातीय भेदभाव के केंद्र थे और दलित बच्चों को दूर बिठाया जाता था, उन्हें स्कूल के मटके का पानी पीने की मनाही थी। वहीं ये ब्राह्मण शिक्षक अपना खाना तक भीमराव को खिलाया करते थे और यहीं से भीमराव का आत्मविश्वास बढ़ा जिसने उन्हें श्रेष्ठता तक पहुंचाया। आगे चलकर भीमराव के जीवन में एक और ब्राह्मण शिक्षक पेंडसे आए जिनके सतत मार्गदर्शन से भीमराव उच्च शिक्षा तक पहुंचे। जब देश का भाग्य लिखा जा रहा था तब संविधान सभा के प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाने का निर्णय देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ही था। नेहरू व अंबेडकर के राजनीतिक मतभेद के बाद भी डॉ. अंबेडकर को यह जिम्मेदारी मिलना एक कश्मीरी ब्राह्मण नेहरू का योग्यता के प्रति सम्मान का परिचायक रहा। आजादी के बाद पंडित नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में बनी देश की पहली अंतरिम सरकार में वे विधि और न्यायमंत्री करते थे। राजनीतिक विरोधाभास के बावजूद नेहरू अंबेडकर की योग्यता का सम्मान कर देश के पुनर्निर्माण में उन्हें आगे लाते रहे।

सामाजिक प्रतिरोध का लगातार सामना करने वाले अंबेडकर के लिए एक समय ऐसा आया जब वे शारीरिक अक्षमता की ओर बढ़ने लगे। इस कठिन दौर में उनका हाथ थामा सविता माई ने। 40 के दशक के अंतिम दौर में जब संविधान पर तेजी से काम हो रहा था, इस बीच अंबेडकर अपने पैरों के दर्द से इतने परेशान थे कि उन्हें नींद नहीं आती थी। इलाज के लिए वे मुंबई गए जहां उनकी देखभाल डॉ. सविता किया करती थीं, जो स्वयं भी ब्राह्मण थीं। एक बार फिर अंबेडकर के लिए डॉ. सविता वरदान बनी और अपने से उम्र में कही बड़ अंबेडकर से उन्होंने 15 अप्रैल 1948 को शादी कर ली। हालांकि दलित राजनीति और उनके अनुयायियों के लिए यह स्वीकार्य नहीं था। अब डॉ. सविता, सविता माई के नाम से पहचाने जाने लगीं और बाबा साहेब की जीवन भर सेवा करती रहीं। अंबेडकर ने किताब ‘द बुद्धा एंड हिज धर्मा’ में भी सविता माई के त्याग, समर्पण, सेवा और निष्ठा को सराहा है।

मानव विकास के अतीत में रहस्य है, वर्तमान में अंतर्द्वद्व है और भविष्य में संघर्ष की नियति। दुनिया भर के विभिन्न समाजों में संस्कृति और सभ्यता की भिन्नता ने रचनात्मक विकास तो किया है लेकिन उसमे जानलेवा विरोधाभास भी पैदा हुआ है। भारतीय समाज ने जातीय व्यवस्था के जानलेवा स्वरूप को आत्मसात किया और करोड़ों लोगों के लिए यह अभिशाप बन गया। अंबेडकर का संघर्ष इसी व्यवस्था के खिलाफ था। इन सबके बीच भारतीय सभ्यता और संस्कृति की सहिष्णुता के दर्शन बाबा साहेब के प्रति व्यवहार में भी होते है। जहां दुनिया भर में नस्लीय भेदभाव इतना की वे बड़ी क्रूरता से विरोधियों को कुचलते रहे है वहीं बाबा अंबेडकर की योग्यता का निरंतर सम्मान कर उनकी आवाज को बुलंद करने में उनके धुर विरोधी समझे जाने वाले ब्राह्मण भी सहयोग करते रहे।

समाज में वैदिक धर्म से हिंदू धर्म के सफर में जातीय भिन्नता ने परस्पर असमानता को पोषित किया और करोड़ों लोगों के लिए यह दुर्भाग्य की नियति भी बन गया। मानव जीवन ने इन अवस्थाओं में पहचान को सामाजिक और धार्मिक तौर पर उभारा है। इन सबके बीच भारतीय सभ्यता भी है जिसमें अपनी व्यक्तिगत पहचान को जातीय आधार पर विभाजित कर सामुदायिक द्वंद्व को स्थापित कर दिया। इस सामुदायिक द्वंद्व के बीच किसी दलित के शिखर तक पहुंचना उदार संस्कृति और आचरण से ही संभव हुआ। माना जाता है कि जब अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाकर विरोध जताया था तो उन पर अपने पहले शिक्षक अंबेडकर की शिक्षा का ही प्रभाव था जिन्होंने अपने शिष्य की योग्यताओं को सराहते हुए सत्य के लिए अडिग रहने और विरोध करने का मूलमंत्र दिया था। बाबा साहेब के कुछ अनुयायी ब्राह्मणों से घृणा भी करते दिखते हैं और वे इसे बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर से जोड़ते भी हैं जबकि अंबेडकर के विचारों में ब्राह्मणों के प्रति घृणा का भाव कभी नहीं दिखता। उन्होंने एक बार कहा था कि वर्ण व्यवस्था से ज्यादा पतनशील कोई और व्यवस्था नहीं हो सकती है, जो लोगों के बीच सहयोग को रोकती है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है। संविधान में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के मूलभूत आदर्श है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय हासिल करने की भरपूर संभावनाएं है। विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता भी है। इसमें अवसर की समानता भी है। बाबा साहेब के जीवन दर्शन को समझने के बाद इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारत के सबसे ज्यादा शिक्षा प्राप्त डॉ. भीमराव अंबेडकर को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में ब्राह्मण भी मददगार रहे।
डॉ. ब्रह्मदीप अलूने (वरिष्ठ पत्रकार)

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