सियासत में ‘तल्खियों’ की इंतेहा

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Indian Politics

राज एक्सप्रेस, भोपाल। सियासत (Indian Politics) की तल्खियों का ही नतीजा है कि आज सत्ताधारियों को उनका प्रत्येक विरोधी अथवा आलोचक अपना दुश्मन दिखाई दे रहा है। राजनीतिक दलों द्वारा विरोधियों के प्रति इस्तेमाल की जाने वाली भाषा अमर्यादित हो रही हैं। लगता है कि सत्तापक्ष और विरोधी दल एक-दूसरे को लोकतंत्र का हिस्सा मान कर उनको स्वीकार करने के बजाए, उन्हें समाप्त करने की इच्छा रखते हैं, जो कि गलत है।

भारतवर्ष की सत्ता केंद्रित राजनीति संभवत: वर्तमान रूप में सबसे शर्मनाक दौर से गुजर रही है। पक्ष तथा विपक्ष एक-दूसरे से सहयोग करने के बजाए एक-दूसरे को नीचा दिखाने, अपमानित करने तथा पूरी तरह से परस्पर असहयोग का वातावरण पैदा करने में जुटे हुए हैं। चुनावी वादों को पूरा करने, देश को एक सूत्र में पिरोए रखने की कोशिशों और सामाजिक एकता बनाए रखने की आवश्यकताओं, महंगाई, बेरोजगारी जैसे विषयों को पूरी तरह से नजरंदाज करने की कोशिश की जा रही है और ठीक इसके विपरीत अपने विरोधी दल और उसके नेताओं पर लांछन लगाने, देश की विकास संबंधी परियोजनाओं में बाधा डालने, किसी की उपलब्धि का दूसरे पक्ष द्वारा झूठा श्रेय लेने, राजनीति को शत-प्रतिशत मर्किटिंग के माध्यम से चमकाने जैसी कोशिशें परवान चढ़ रही हैं। वैसे तो हर आने वाला चुनाव पिछले चुनावों से अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। परंतु 2019 का चुनाव तो गोया पक्ष-विपक्ष दोनों ही के लिए करो या मरो जैसी स्थिति पैदा करने वाला होने जा रहा है। ऐसे तल्ख राजनीतिक वातावरण का सीधा नुकसान देश की जनता को उठाना पड़ रहा है।

सवाल यह है कि राजनेताओं द्वारा आखिर ऐसे हालात क्यों पैदा किए जा रहे हैं? क्या इस विभाजनकारी राजनीति के अंजाम से नेता बेखबर हैं? क्या इन्हें इस बात का अहसास नहीं कि तल्ख सियासत का यह तरीका उन्हें छल-कपट, मक्कारी व मार्केटिंग तथा झूठे-सच्चे आरोपों व दावों-प्रतिदावों के माध्यम से शायद सत्ता तक तो पहुंचा दे परंतु इस तरीके से जनता के मध्य तथा राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय राजनीति की क्या छवि बन रही है उन्हें इसका भी अहसास है? जो भारतवर्ष अपनी शिष्टता, सौम्यता तथा नैतिकता के लिए जाना जाता था जिस देश में सैकड़ों ऐसे समर्पित राजनेता पैदा हुए जिन्होंने अपना पूरा जीवन सच्चई, ईमानदारी तथा सदाचार के साथ राजनीति में गुजारा, आज वही राजनीति गाली-गलौच, धक्का-मुक्की तथा अपने विरोधी दल को पूरी तरह से समाप्त करने जैसी घिनौनी कोशिशों का पर्याय बनकर रह गई है? और तल्ख सियासत की पराकाष्ठा तो यह है कि सांप्रदायिक व जातिगत दुर्भावना से पोषित इस अंधेरी सियासत के कई पैरोकार अब किसी निहत्थे, बेगुनाह, कमजोर व अकेले व्यक्ति के हत्यारे समूह के पक्ष में खुल कर खड़े होते नजर आने लगे हैं।

पिछले दिनों दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने दिल्ली में निर्मित सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन अवसर पर एक भाषण दिया जो वर्तमान तल्ख सियासत का जीता जागता सबूत था। मुझे नहीं लगता कि देश की किसी महत्वपूर्ण लोकहितकारी योजना के उद्घाटन के अवसर पर किसी जिम्मेदार नेता द्वारा ऐसा भाषण दिया गया होगा। कल्पना कीजिए कि यदि विदेशी मीडिया मनीष सिसोदिया के उस भाषण को जस का तस अपने-अपने देश में प्रसारित करे तो भारतीय राजनीति के लिए स्थिति कितनी शर्मनाक होगी। आमतौर पर उद्घाटन के समय योजना से संबंधित बातें की जाती हैं। उसके लाभ गिनाए जाते हैं या उसके तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डाला जाता है। यदि किसी राज्य की योजना में केंद्र सरकार का भी सहयोग अथवा योगदान होता है तो उसकी सराहना की जाती है तथा केंद्र व राज्य सरकारों के प्रतिनिधि वहां सम्मानपूर्वक उपस्थित भी रहते हैं। परंतु दिल्ली के 154 मीटर ऊंचे सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन अवसर पर उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा किया गया यह ट्वीट दिल्ली सरकार व केंद्र सरकार के रिश्तों की तल्खी को उजागर करने के लिए काफी था। सिसोदिया ने चार नवंबर को ट्वीट में लिखा कि ‘सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन के दौरान जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भाषण चल रहा था तब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी जी मंच पर बोतल से हमला करने और सरकारी संपत्ति की तोड़फोड़ के महान कार्य में व्यस्त थे।’ सिसोदिया का यह ट्वीट मनोज तिवारी के धक्का मुक्की व हाथापाई के उन प्रयासों के संदर्भ में आया जिसके द्वारा तिवारी उद्घाटन मंच पर आमंत्रित न होने के बावजूद मंच पर सम्मानपूर्ण स्थान चाह रहे थे। सिसोदिया ने तो अपने पूरे भाषण में इस महत्वपूर्ण पुल के निर्माण के प्रति केंद्र सरकार की न केवल उदासीनता बल्कि नकारात्मकता का भी जो रहस्योद्घाटन किया वह बेहद चिंताजनक था।

सिसोदिया ने सार्वजनिक रूप से यह बताया कि किस प्रकार उनके अधिकारीगण इस सिग्नेचर ब्रिज के पूरा होने से पूर्व होने वाली समीक्षा बैठकों में उन्हें यह बताया करते थे कि केंद्र सरकार किसी भी कीमत पर इस पुल को पूरा नहीं होने देना चाहती। उन्होंने यहां तक आरोप लगाया कि हमारे अधिकारियों को केंद्र द्वारा सीबीआई तक की धमकी दी गई। उन्होंने साफ तौर पर यह कहा कि प्रधानमंत्री ने इस पुल के निर्माण में एक इंच का सहयोग नहीं दिया। उनके भाषण में उस बात का भी जिक्र था किस प्रकार मेट्रो रेल के नोएडा सेक्शन के उद्घाटन के समय प्रधानमंत्री मोदी की ओर से दिल्ली के सीएम को आमंत्रित न किए जाने की परंपरा की शुरुआत की गई। और भी इस प्रकार के कई आरोप मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व उपमुख्यमंत्री सिसोदिया ने अपने भाषणों में लगाए। यदि आप इनके भाषणों को गौर से सुनंे व उनकी समीक्षा करें तो ऐसा महसूस होगा जैसे कि दो सरकारें नहीं बल्कि दो दुश्मन राज्य एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। केजरीवाल ने तो यह भी कहा कि ‘भाजपाई स्टेच्यू तथा मंदिर के निर्माण में व्यस्त हैं तो हम पुल, स्कूल और अस्पताल बनवा रहे हैं।

सियासत की इन्हीं तल्ख्यिों का ही नतीजा है कि आज सत्ताधारियों को उनका प्रत्येक विरोधी अथवा आलोचक अपना दुश्मन दिखाई दे रहा है। विरोधियों को सीबीआई, आईटी तथा ईडी जैसे विभागों का भय दिखाया जा रहा है। विरोध जब ज्यादा प्रखर हो जाए तो उसे देशद्रोही, राष्ट्रविरोधी, अराजक, राष्ट्रविभाजक, हिंदू शत्रु और यहां तक कि पाक परस्त तक बताया जा रहा है। इन परिस्थितियों में कोई भी महससू कर सकता है कि भारतवर्ष ने तल्ख सियासत का ऐसा घिनौना दौर पहले भी कभी देखा हो? राजनीति का यह निम्नतम स्तर आवाम को कहां ले जाएगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। देश की राजनीति में पिछले कुछ सालों से कर्कशता व आक्रामकता बढ़ती जा रही है। राजनीतिक दलों द्वारा विरोधियों के प्रति इस्तेमाल की जाने वाली भाषा, उपमाएं, तुलना आदि भी अमर्यादित हो रही हैं। ऐसा लगता है कि सत्तापक्ष और विरोधी दल एक दूसरे को लोकतंत्र का हिस्सा मान कर उनको स्वीकार करने के बजाए, उन्हें समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। लोकतंत्र में स्वस्थ और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका को सभी स्वीकार करते हैं, लेकिन राजनीतिक दल अपने अलावा किसी और दल की नीतियों को देश हित में नहीं मानता। यहां तक कि राजनीति के हाशिए पर पहुंच चुके वाम दल भी यही कहते हैं कि उनके अलावा कोई भी दल देश की समस्याओं को हल नहीं कर सकता।

राजनीतिक विचारधारा में विरोध के चलते आजकल लोगों के पारस्परिक संबंधों पर असर पड़ना शुरू हो गया है। एक ही परिवार के लोग, और कभी अच्छे दोस्त रहे लोग भी राजनीतिक विरोध की वजह से एक दूसरे से दूर हो रहे हैं। सोशल मीडिया पर इस तरह के तमाम संदेश साझा किए जा रहे हैं कि राजनीतिक विरोध को अपने आपसी संबंधों पर असर न डालने दें। बेहतर होगा कि इस तरह के संदेशों के निहितार्थ को राजनीतिक दलों के नेता भी समझें।
तनवीर जाफरी (वरिष्ठ पत्रकार)

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