गोहत्या के नाम पर फिर गुंडागर्दी

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Bulandshahr Violence

राजएक्सप्रेस,भोपाल। बुलंदशहर (Bulandshahr Violence) में गोवंश मिलने के नाम पर जो कुछ हुआ, वह कानून की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी है। अब सवाल यह है कि यह सब कब तक चलेगा? गोहत्या के नाम पर जो कुछ हुआ है, वह अब बंद होना चाहिए। यह तभी होगा, जब सरकारें जिम्मेदारी को समझेंगी।

गोहत्या के नाम पर तथाकथित हिंदूवादी लोगों का आराजक रवैया फिर सामने आया है। बुलंदशहर में गोवंश के अवशेष मिलने पर सोमवार को बवाल हो गया। इस दौरान लोगों ने पुलिस पर जमकर पथराव किया। बवाल के दौरान एक इंस्पेक्टर की मौत हो गई। बुलंदशहर में सोमवार को गोकशी की अफवाह पर हुई हिंसा में इंसानियत, ईमान और अमन सब खाक हो गए। तीन गांवों के तकरीबन 400 लोग एक साथ आए और पुलिस चौकी पर हमला कर दिया। जिले में हालात इस कदर भयावह हो गए कि किसी को कुछ समझ में नहीं आया और जब तक कुछ समझा जाए, तब तक भीड़ ने एक पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को मार डाला। हालात की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक अफवाह फैलाई जाती है, लोगों को उकसाया जाता है, दंगा भड़काया जाता है। भीड़ मरने-मारने पर उतारू हो जाती है और अफसर, सरकार सोती रहती है। यह सब सिर्फ गोवंश की अफवाह पर हुआ। अब तक पुलिस या जांच एजेंसी को गोहत्या के सबूत तक नहीं मिले हैं। फिर भीड़ को क्या सूझा कि वह बवाल पैदा कर दे।

यकीनन, बुलंदशहर में जो कुछ हुआ, वह लचर कानून-व्यवस्था का ही परिणाम है। अब प्रशासनिक अफसरों से लेकर सरकार तक अपनी नाकामी पर पर्दा डालने में जुटी है। पुलिस ने इस मामले में बजरंग दल के जिला संयोजक योगेश राज को मुख्य आरोपी बनाया है। एक के बाद एक लोगों की धरपकड़ हो रही है। पुलिस से जितना बन पड़ रहा है, वह गंभीर प्रतीत हो रही है, मगर सवाल यह है कि क्या यह सब पहली बार हो रहा है। समाज के प्रबुद्धजन के अलावा प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी के बाद गोहत्या के आरोप में भीड़ का बार-बार उत्पात मचाना कब बंद होगा। क्या भीड़ अब खुद को कानून से बड़ा मानने लगी है या फिर उनमें कानून का जरा भी डर नहीं रह गया है।

इस घटना ने एक बार फिर से सिद्ध कर दिया है कि स्थानीय खुफिया एजेंसियां और पुलिस का तंत्र फेल साबित हो रहा है। यह हालात तब हैं जब सुरक्षा एजेंसियों के द्वारा अनेक बार इनपुट दिया जा चुका है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने की बड़ी साजिश हो रही है और मुजफ्फरनगर दंगे की तरह ही एक बार फिर से चुनाव से पहले माहौल बिगाड़ने की साजिश रची जा रही है। बुलंदशहर में हुए इज्तिमा से पहले भी इसी तरह का अलर्ट जारी किया गया था, लेकिन प्रशासन ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। इस पूरे मामले में पुलिस की भूमिका भी कम संदिग्ध नहीं है। बुलंदशहर में जब इंस्पेक्टर सुबोध सिंह भीड़ से अकेले लड़ रहे थे, तब पूरा पुलिस अमला उन्हें छोड़ अपनी जान बचाने में लगा था। पुलिस का अचानक वहां से गायब होना कई सवालों को जन्म दे रहा है। खैर, गोहत्या के नाम पर जो कुछ हुआ है, वह अब बंद होना चाहिए। यह तभी होगा, जब सरकारें अपनी जिम्मेदारी समझेंगी।

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