जलसंकट के निदान की बात करें

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Water Crisis

राजएक्सप्रेस,भोपाल। जल संकट (Water Crisis) से आज पूरी ही दुनिया जूझ रही है। कई देशों ने तो ऐसी खेती ही बंद कर दी, जिसमें पानी की खपत अधिक होती थी। हम पानी का प्रत्यक्ष कम, तो अप्रत्यक्ष इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। हम एक किलो गेहूं पैदा करने में 17 सौ लीटर पानी का इस्तेमाल करते हैं। पानी के इस अप्रत्यक्ष इस्तेमाल पर वाटर फुटप्रिंट के जरिए नजर रखी जाती है।

दो आंकड़े हैं- एक वर्ष-1951 का और दूसरा वर्ष-2001 का। हमारे देश में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता जहां वर्ष-1951 में 14 हजार 180 लीटर थी, वह अब पांच हजार 120 लीटर हो गई है। 2025 तक यह उपलब्धता घटकर करीब तीन हजार लीटर रह जाएगी। तब सवाल है कि फिर क्या होगा? दुनियाभर में कार्बन की खपत की मात्र कितनी है, इसकी जानकारी के लिए दुनियाभर में कार्बन फुटप्रिंट का इस्तेमाल किया जाता है। इसी तरह, मानवीय हस्तक्षेप के कारण पानी की खपत कहां और कितनी हो रही है, इसे जानने के लिए आजकल एक नई अवधारणा प्रचलन में है, जिसका नाम है, वाटर फुटप्रिंट। यह बताता है कि हम अपनी जिंदगी में रोज किन स्रोतों से कितने पानी की खपत करते हैं।

मिनरल वाटर, कोल्ड ड्रिंक और पानी:-सबसे पहले हम बात करते हैं, बोतलबंद पानी की। पिछले 20 सालों में भारत में बोतलबंद पानी के व्यापार में जो तेजी आई व तरक्की हुई है, वह आश्चर्यजनक है। क्या आपको पता है कि जब आप एक बोतल पानी खरीदकर पीते हैं, तब आप उस पानी को कितनी कीमत पर खरीदते हैं व इसके साथ ही आप कितने लीटर पानी बर्बाद कर देते हैं। शायद, आपको यह डाटा देखकर भरोसा न हो। लेकिन यही सच है और यह सच ऐसा है, जो हमें दिनोंदिन पानी के संकट की ओर धकेल रहा है। एक लीटर बोतलबंद पानी तैयार करने में पांच लीटर पानी खर्च होता है।

एक आंकड़े के मुताबिक दुनिया में साल-2004 में 154 अरब लीटर बोतलबंद पानी के लिए 770 अरब लीटर पानी का उपयोग किया गया था। भारत में भी इसी प्रक्रिया के लिए 25.5 अरब लीटर पानी बहाया गया। यह अकारण नहीं है कि बनारस से लेकर केरल तक के गांव वाले इन बोतलबंद कंपनियों व कोला कंपनियों के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए हैं। कैलिफोर्निया के पेसिफिक इंस्टीट्यूट का कहना है कि 2004 में अमेरिका में 26 अरब लीटर पानी की पैकिंग के लिए प्लास्टिक की बोतलें बनाने के लिए दो करोड़ बैरल तेल का उपयोग किया गया। प्लास्टिक से बनी बोतलें भी भूजल को प्रदूषित करती हैं और ग्लोबल वार्मिग की भी कारण बनती हैं।

कृषि और पानी:-अब हम कुछ दिलचस्प लेकिन खतरनाक डाटा पर नजर डालते हैं। कृषि एक ऐसा क्षेत्र है, जहां पूरे पानी का 90 फीसदी से भी ज्यादा इस्तेमाल होता है। घरेलू उपयोग में पानी का सिर्फ पांच फीसदी ही खर्च होता है। इसके अलावा, भारत में एक किलो गेहूं उगाने के लिए लगभग 17 सौ लीटर पानी खर्च करना होता है। यानी, अगर हमारे परिवार में एक दिन एक किलो गेहूं की खपत होती है, तो हम उसके साथ लगभग 17 सौ लीटर पानी की भी खपत करते हैं। यहां तक कि जींस की जो पैंट हम पहनते हैं, उसमें भी हजारों लीटर पानी की खपत हुई होती है या फिर एक कप कॉफी के साथ हम असल में 140 लीटर पानी भी पीते हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर। इसे आप आभासी खपत कह सकते हैं, लेकिन यह खपत असली है।

आज मिस्र दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, जो गेहूं आयात करता है और चीन भी अब खाद्य उत्पादों का बड़ा आयातक बन गया है, जबकि दुनियाभर में उसके सामान बिकते हैं। सवाल है कि चीन या मिस्र ऐसा क्यों कर रहे हैं। जवाब बहुत ही साधारण है। इन दोनों ही देशों ने ऐसी सभी फसलों का उत्पादन बहुत कम कर दिया है, जिनमें पानी की खपत सबसे ज्यादा होती है। ये दोनों देश इस तथ्य के बावजूद ऐसा कर रहे हैं कि इनके पास पानी की फिलहाल कोई भारी कमी नहीं है और इनके पास नील और व्हांगहो जैसी नदियां भी हैं। दरअसल, ऐसा सिर्फ और सिर्फ पानी बचाने के लिए हो रहा है। कोई देश पानी बचाने के लिए फसल ही न उगाए और उसकी जगह खाद्यान्न दूसरे देशों से आयात करे, तो इससे समझा जा सकता है कि जल संकट को लेकर दुनिया में क्या चल रहा है?

भारत के संदर्भ में देखें, तो इसका क्या मतलब है? इसे ऐसे समझ सकते हैं कि साल-2014-15 में भारत ने लगभग 37 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया था, जबकि इतना बासमती चावल उगाने में 10 ट्रिलियन लीटर पानी खर्च हुआ था। इसे हम इस तरह भी बोल सकते हैं कि भारत ने 37 लाख टन बासमती के साथ 10 ट्रिलियन लीटर पानी भी दूसरे देशों में भेज दिया, जबकि पैसा सिर्फ चावल का ही मिला। यानी, जिस देश ने हमसे चावल खरीदा, उसे चावल के साथ दस ट्रिलियन लीटर पानी मुफ्त में मिल गया या यूं कहें कि उसका इतना पानी बच गया। भारत प्रत्येक वर्ष विदेशों में लाखों टन अनाज बेचकर भारी मात्र में पानी का आभासी निर्यात करता रहता है।

क्या है वाटर फुटप्रिंट:-यह शब्द सुनते ही सबसे पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि आखिर वाटर फुटप्रिंट है क्या? हमारे प्रतिदिन के बहुत से उत्पादों में आभासी अथवा छिपा हुआ जल शामिल होता है। उदाहरण के लिए, एक कप कॉफी के उत्पादन के लिए आभासी पानी की मात्र 140 लीटर तक होती है। आपका वाटर फुटप्रिंट केवल आपके ही द्वारा प्रयोग किए गए प्रत्यक्ष पानी (उदाहरण के लिए धुलाई में) को ही नहीं दिखाता है, बल्कि उपभोग किए गए आभासी पानी की मात्रा को भी दर्शाता है। वाटर फुटप्रिंट इसी तरह हर उत्पाद और सेवा, जिसका हम सभी लोग उपभोग करते हैं, उसमें इस्तेमाल किए गए पानी की गणना करता है।

वाटर फुटप्रिंट हमारे सामने कई सारे सवाल उठाता है। जैसे-किसी कंपनी में इस्तेमाल किए जाने वाले पानी का स्रोत क्या है? इन स्रोतों की रक्षा के लिए क्या उपाय किए गए हैं? क्या हम वाटर फुटप्रिंट घटाने के लिए कुछ कर सकते हैं? वाटर फुटप्रिंट के तीन घटक हैं-ग्रीन, ब्लू और ग्रे। एक साथ मिलकर यही घटक पानी के इस्तेमाल की असल तस्वीर दिखाते हैं। जैसे-इस्तेमाल हुआ पानी बारिश का है, सतह का पानी है या भू-जल है। वाटर फुटप्रिंट किसी प्रक्रिया, कंपनी या क्षेत्र द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पानी की खपत व जल प्रदूषण को बताता है। ग्रीन वाटर फुटप्रिंट मिट्टी की परत में छिपा जल है, जिसका उपयोग कृषि, हार्टीकल्चर या जंगल द्वारा होता है।

ब्लू वाटर फुटप्रिंट ग्राउंड वाटर है। इसका इस्तेमाल कृषि, उद्योग और घरेलू काम में होता है। ग्रे वाटर फुटप्रिंट ताजा जल (फ्रेश वाटर) की वह मात्रा है, जिसकी आवश्यकता प्रदूषण हटाकर जल की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए होती है। वाटर फुटप्रिंट का संबंध फ्रेश वाटर पर मानवीय प्रभाव और मानवीय इस्तेमाल से है। फुटप्रिंट के जरिए पानी की कमी और जल प्रदूषण जैसे मुद्दों को भी समझा जा सकता है। कई देशों ने तो अब अपने वाटर फुटप्रिंट को कम करने के लिए ऐसे उत्पादों को दूसरे देशों से मंगाना शुरू कर दिया है, जिसके उत्पादन में पानी का ज्यादा खर्च होता है। तो क्या अब यह जांचने का वक्त नहीं आ गया है कि हमारा वाटर फुटप्रिंट क्या है? क्या हम भी अपना वाटर फुटप्रिंट नहीं घटाएंगे? जलसंकट खत्म करने को लेकर देश में अब तक जितने प्रयास हुए हैं, उन्हें काफी नहीं कहा जा सकता है। जल की उपलब्धता कम होती जा रही है और आबादी बढ़ती जा रही है। ऐसे में तब तक कोई भी प्रयास रंग नहीं ला सकता जब तक उपाय दीर्घकालीन न किए जाएं। जलसंकट को लेकर अब हमें गंभीर होना ही पड़ेगा।
राजेंद्र मिश्रा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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