कड़वी हो सकती है चीनी की मिठास

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Sugar Mills

राजएक्सप्रेस, भोपाल। चालू पेराई सत्र में चीनी मिलों (Sugar Mills) ने 92 हजार करोड़ रुपए के गन्ने की खरीद की है, जिसमें किसानों को 13 हजार करोड़ रुपए का भुगतान करना है। अगर सरकार चीनी मिल मालिकों की मदद नहीं करती है तो अप्रैल-2019 अंत तक किसानों पर बकाया 50 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। यह स्थिति मिल मालिकों और किसानों के लिए ठीक नहीं रहेगी।

चालू पेराई सत्र में चीनी मिलों ने 92 हजार करोड़ रुपए के गन्ने की खरीद की है, जिसमें किसानों को 13 हजार करोड़ रुपए का भुगतान किया जाना शेष है। नए विपणन वर्ष के आरंभ में गन्ना का बकाया नौ हजार करोड़ रुपए होने का अनुमान है। अगर केंद्र सरकार चीनी मिल मालिकों की मदद नहीं करती है तो अप्रैल-2019 अंत तक किसानों पर बकाया 50 हजार करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन होने एवं उसकी कम कीमत होने के कारण चीनी मिल मालिक गन्ना किसानों को उनके गन्ने की कीमत का भुगतान नहीं कर पा रहे हैं। चीनी मिल मालिक कह रहे हैं कि जब तक केंद्र सरकार चीनी की न्यूनतम बिक्री की कीमत को मौजूदा 29 से बढ़ाकर 36 रुपए प्रति किलोग्राम नहीं करती, तक तक उनके लिए किसानों के बकाये का भुगतान करना मुमकिन नहीं होगा। चीनी मिल मालिकों ने अक्टूबर से शुरू होने वाले गन्ना पेराई सत्र 2018-19 के लिए 70 लाख टन चीनी का अनिवार्य निर्यात का कोटा तय करने की मांग सरकार से की है।

हालांकि, वैश्विक बाजार में चीनी की कमजोर कीमत होने के कारण इसका निर्यात करना लाभप्रद नहीं है। फिर भी चीनी मिल मालिकों को उम्मीद है कि चीनी का निर्यात करने से उनकी दयनीय आर्थिक हालात में कुछ सुधार हो सकता है। चीनी कारोबारी यह भी चाहते हैं कि सरकार चीनी के मासिक कोटा की व्यवस्था बंद कर दे, ताकि उन्हें नुकसान कुछ कम हो सके। चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत में सात रुपए प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी करने से इसकी खुदरा कीमत चार से पांच रुपए प्रति किलो बढ़ जाएगी, लेकिन चीनी मिल मालिक अपनी मांग के समर्थन में कह रहे हैं कि यह कीमत पिछले साल खुले बाजार में बिक रही चीनी की कीमत से कम होगी। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा के अनुसार चीनी की कीमत बढ़ाने से ही किसानों के बकाया का भुगतान हो सकता है। ऐसा नहीं करने पर 31 मार्च 2019 तक किसानों का बकाया बहुत ज्यादा हो जाएगा। ऐसी हालात में गन्ना किसानों द्वारा आत्महत्या करने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

देश में अतिरिक्त चीनी भंडार लगातार बढ़ रहा है। अगर तत्काल प्रभाव से चीनी का निर्यात नहीं किया जाता है तो वित्त वर्ष 2018-19 के अंत तक अधिशेष चीनी बढ़कर 190 लाख टन हो जाएगा। कारोबारी चाहते हैं कि केंद्र सरकार अनिवार्य निर्यात नीति को तत्काल प्रभाव से लागू करे। वे यह भी चाहते हैं कि सरकार चीनी मिलें, जो अपने आवंटित कोटे का निर्यात नहीं करती हैं उन पर जुर्माना लगाने का प्रावधान करे। चीनी मिल मालिकों का कहना है कि अगर भारत दिसंबर-2018 तक 70 से 80 लाख टन चीनी का निर्यात नहीं करता है तो फिर मिलों पर किसानों की बकाया राशि अप्रैल-2019 तक बढ़कर 400-500 अरब रुपए तक पहुंच जाएगी, जो वर्तमान में 120 अरब रुपए है। कारोबारियों के अनुसार भारत के पास मार्च-2019 तक ही निर्यात करने का मौका है। उसके बाद वैश्विक बाजारों में ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया एवं अन्य देशों से चीनी आने लगेगी। चीनी कारोबारी निर्यात में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए यह भी अपेक्षा करते हैं कि सरकार चीनी की न्यूनतम बिक्री कीमत में तार्किक बढ़ोतरी करे।

सरकार ने चीनी मिल मालिकों एवं गन्ना किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए नई एथनॉल मिश्रण नीति की घोषणा की है, जिसमें पहली बार गन्ने के रस और हैवी शीरे से उत्पादित एथनॉल की खरीद कीमत तय की गई है। चीनी कारोबारी इसे सरकार द्वारा उठाया गया एक अच्छा कदम मान रहे हैं। यहां अब भी एथनॉल का पर्याप्त इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, जबकि ब्राजील अधिशेष सीधे का इस्तेमाल एथनॉल उत्पादन में बहुत अच्छी तरह से कर रहा है। ब्राजील की चीनी मिलें गन्ने का प्रयोग एथनॉल बनाने में कर रही हैं। वहां एथनॉल का इस्तेमाल वाहनों को चलाने में वैकल्पिक ईंधन के रूप में किया जाता है। ब्राजील में गन्ने का उपयोग लाभ के हिसाब से किया जाता है। वहां ज्यादा चीनी का उत्पादन होने पर उसका पूरी तरह से इस्तेमाल किया जाता है, ताकि किसानों को नुकसान नहीं हो। भारत में ऐसा नहीं हो पा रहा है। यहां सीधे या चीनी भंडार के प्रबंधन में सरकार फिसड्डी साबित हुई है।

भारत चीनी का सबसे बड़ा उपभोक्ता तो है ही, अब वह ब्राजील को पीछे छोड़कर सबसे बड़ा उत्पादक बनने की स्थिति में आ गया है, लेकिन ऐसा तमगा भारत के चीनी उद्योग के लिए परेशानी का सबब बन जाएगा, क्योंकि चीनी के भंडार का प्रबंधन नहीं होने से सीधे किसानों, चीनी मिल मालिकों और आम उपभोक्ताओं को नुकसान होगा। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सरकार के पास ऐसी कोई योजना नहीं है कि आगे आने वाले दिनों में वह इसका कोई ठोस प्रबंधन कर पाए। भारत में चीनी उद्योग का कच्चे माल की कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है। हां, सरकार चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर कदम उठाती रही है, लेकिन वे कारगर साबित नहीं हो पा रहे हैं। ब्राजील में चीनी उद्योग काफी हद तक नियंत्रण मुक्त है। वहां, वित्तीय वर्ष 2018-19 के चीनी सीजन में लगभग 310 लाख टन चीनी उत्पादित होने का अनुमान है, जो पिछले साल की तुलना में करीब 22 प्रतिशत कम है। दूसरी तरफ भारत में वित्त वर्ष 2018.19 के अक्टूबर से सितंबर महीने में जो चीनी के उत्पादन का समय है उस दौरान 355 लाख टन चीनी का उत्पादन होने का अनुमान है। इस अनुमानित उत्पादन से वित्त वर्ष 2017-18 के 320 लाख टन के चीनी उत्पादन का रिकॉर्ड टूट जाएगा। देश में चीनी का सालाना घरेलू खपत करीब 250 लाख टन का है। इससे अधिशेष चीनी 100 लाख टन से ज्यादा हो जाएगी। अब अगर अधिशेष चीनी का समुचित प्रबंधन नहीं किया जाता है तो सितंबर 2019 तक कुल अधिशेष चीनी 200 लाख टन से अधिक हो जाएगी।

सच कहा जाए तो आज रिकॉर्ड चीनी उत्पादन का होना भारत के लिए श्राप बन गया है। राष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल में पांच प्रतिशत एथनॉल के मिश्रण का लक्ष्य भारत अब तक हासिल नहीं कर पाया है, जबकि इसके उपयोग में वृद्धि के लिए विगत 12 सालों से प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि देश में डिस्टिलरी क्षमता के विस्तार पर पर्याप्त निवेश नहीं किया गया है। सरकार ने हाल में नए पैकेज की घोषणा की है, जिसमें गन्ने के रस और हैवी शीरे से सीधे एथनॉल के उत्पादन को मंजूरी दी गई है, लेकिन इसके बरक्स शिद्दत से काम करना बाकी है। चीनी कारोबारी चाहते हैं कि एथनॉल की आवाजाही पर लगने वाले करों को भी केंद्र सरकार खत्म करे। नई डिस्टिलरी इकाइयां लगाने के लिए 44 अरब के रियायती ऋण उपलब्ध करने की पेशकश सरकार ने की है, लेकिन कारोबारी इसे नाकाफी बता रहे हैं।

कहा जा सकता है कि जब तक देश में चीनी के खपत की ठोस पहल नहीं की जाती है तब तक न तो चीनी किसानों का भला होगा और न ही चीनी मिल मालिकों का। ऐसे हालात में चीनी उत्पादन को कम करने की जरूरत है, लेकिन आने वाले दिनों में इसमें इजाफा होने के आसार हैं। ऐसी स्थिति उपभोक्ताओं के लिए भी मुफीद नहीं है। चीनी और चीनी के तार्किक प्रबंधन के अभाव में चीनी के कड़वी होने की प्रबल संभावना है। चीनी के मूल्य को लेकर सरकार ने हाल ही में कुछ ऐसे फैसले लिए हैं, जिनसे आने वाले समय में गन्ना किसानों और चीनी मिल मालिकों की उन समस्याओं का समाधान हो जाएगा, जिनकी वजह से वे खुश नहीं हैं। अब देखना है कि सरकार के प्रयास कितने रंग लाते हैं और परिणाम क्या आता है।
सतीश सिंह (आर्थिक मामलों के जानकार)

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