राजीव के हत्यारों पर दया गलत

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Rajiv Gandhi Assassination Case

राजएक्सप्रेस, भोपाल। तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक सरकार ने राजीव गांधी की हत्या (Rajiv Gandhi Assassination Case)में शामिल दोषियों को रिहा करने का फैसला किया है। सरकार का फैसला उचित नहीं है। जब केंद्र सरकार दोषियों को रिहा न करने को लेकर अपना मत स्पष्ट कर चुकी है, तो राज्य भी अपनी सीमा समझे।

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सभी हत्यारों की रिहाई का राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक सरकार ने राजीव गांधी की हत्या में शामिल सात दोषियों को रिहा करने का फैसला किया है और इसकी सिफारिश राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित को भेजी है। सरकार के मंत्री डी. जयकुमार ने कहा कि पिछले 27 साल से जेल में बंद सभी दोषियों, श्रीहरन उर्फ मुरुगन, संथान, पेरारीवलन उर्फ अरीवु, नलिनी, रॉबर्ट प्यास, रविचंद्रन और जयकुमार की रिहाई को लेकर राज्यपाल से सिफारिश करने का फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक किया गया है। उन्होंने कहा-राज्यपाल को इसे नकारने का कोई औचित्य नहीं है। वे इसे स्वीकार करेंगे क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक है। तमिलनाडु सरकार का यह फैसला तब आया है, जब उसे केंद्र सरकार की तरफ से दो टूक रिहाई न करने को कहा जा चुका है। केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में भी यह कह चुकी है कि दोषियों को रिहा किया गया, तो खतरनाक परंपरा जन्म लेगी व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा।

इस बात को तमिलनाडु सरकार भी जानती है, फिर क्या वजह है कि उसे दोषियों की रिहाई की सूझी। जयललिता से लेकर करुणानिधि तक अपने जीवनकाल में इस मुद्दे को समय-समय उठाते रहे थे। अब जबकि अन्नाद्रमुक सरकार ने फैसला किया है, तो द्रमुक की तरफ से किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है। जाहिर है दोनों ही दल इस मुद्दे को भुनाने की ताक में हैं। पर राजनीति का यह स्वरूप किसी भी लहजे में ठीक नहीं कहा जा सकता। आज तमिलनाडु सरकार जिन दोषियों को रिहा करने की बात कर रही है, वे देश के प्रधानमंत्री की हत्या में शामिल रहे हैं। इस मसले की गंभीरता जब भाजपा की मोदी सरकार भी समझ रही है, तो दक्षिण में बैठी पार्टियां क्यों नहीं समझना चाह रहीं? सिर्फ वोट बैंक के लिए कोई भी फैसला, जिसमें जनता की भावना सम्मिलित न हो, नहीं लिया जाना चाहिए। उत्तर क्या दक्षिण भारत की जनता भी राजीव गांधी के हत्यारों को रिहा न करने के पक्ष में है। अब तक कोई जनभावना इस मसले पर नहीं दिखी है और शायद कभी दिखे भी न।

इस मुद्दे का समाधान एक ही है। केंद्र सरकार मौत की सजा पाए सभी दोषियों की दया याचिकाओं का तत्काल निस्तारण करे और उन्हें सजा दे। यह उचित नहीं कि कोई हत्यारा दशकों तक कारावास का दंड भोगे और फिर उसे मौत की सजा दी जाए। यह न्याय सिद्धांत और मानवता दोनों के विरुद्ध है। इसी को आधार बनाकर पहले भी याकूब मेमन जैसे आतंकी को बचाने कुछ लोग आधी रात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं। सरकार को इस वाकये से सबक लेते हुए राजीव गांधी मामले में देर नहीं करनी चाहिए। वैसे देर काफी हो चुकी है। इसीलिए तमिलनाडु की सरकारों को अपना हित साधने का मौका मिल जाता है और वे अपना मतलब साधने लगते हैं।

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