निष्क्रिय जीवनशैली से बढ़ती बीमारियां

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Passive Lifestyle Rising Diseases

राजएक्सप्रेस, भोपाल। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत की बड़ी आबादी पर आलस्य की वजह से कई बड़ी और गंभीर बीमारियों (Passive Lifestyle Rising Diseases) का खतरा मंडरा रहा है। संगठन के आंकड़े बताते हैं कि भारत की 125 करोड़ की जनसंख्या में करीब 42 करोड़ लोग आलस्य के कारण बीमार हो रहे हैं। यह रिपोर्ट हमारे लिए बड़ी चेतावनी की तरह है।

भारत में मौजूदा दौर की जीवनशैली कई शारीरिक व मानसिक व्याधियों को न्योता देने वाली साबित हो रही है। एक ओर कुपोषण व चिकित्सा सुविधाओं की तत्काल पहुंच न होना आमजन की सेहत के लिए खतरा है, तो वहीं सुविधा संपन्न जीवनशैली भी लोगों का स्वास्थ्य बिगाड़ रही है। गांवों से लेकर शहरों तक आम लोगों की जिंदगी में भागमभाग तो बहुत है पर शारीरिक श्रम कम हुआ है। साथ ही इंटरनेट व स्मार्ट गैजेट्स की दखल ने भी शारीरिक निष्क्रियता में इजाफा किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भारत की बड़ी आबादी पर आलस्य की वजह से कई बड़ी और गंभीर बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। संगठन के आंकड़े बताते हैं कि भारत की 125 करोड़ की जनसंख्या में करीब 42 करोड़ लोग आलस्य के कारण बीमार हो रहे हैं। आलस्य की चपेट में आने वाली आबादी कुल आबादी का 34 फीसदी है। जिसका सीधा सा अर्थ है कि भारत में ऐसे लोग बड़ी संख्या में हैं जो शारीरिक श्रम करने में सुस्ती अपनाते हैं और काम से भागते हैं।

डब्ल्यूएचओ के सर्वेक्षण नतीजे बताते हैं कि शारीरिक गतिविधियों में सक्रियता की कमी के कारण ऐसे लोगों का हृदयघात, मोटापा, उच्च रक्तचाप, कैंसर और मधुमेह जैसी बीमारियों के साथ ही मानसिक रोगों के चपेट में आने का भी खतरा है। द लांसेट ग्लोबल हेल्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए इस सर्वेक्षण के नतीजे चौंकाने वाले ही नहीं डराने वाले भी हैं क्योंकि शोधकर्ताओं का मानना है कि दुनियाभर में दूसरे अहम स्वास्थ्य के खतरों की तरह शारीरिक क्रियाकलाप कम करने वालों की संख्या में भी कमी नहीं हो रही है। ऐसे लोग बड़ी तदाद में हैं, जिनके बीमार रहने का कारण कसरत ना करना ही है। इस सर्वे के मुताबिक उच्च आय वाले देशों में शारीरिक श्रम कम करने वालों का आंकड़ा 37 फीसदी है, मध्यम आय वाले देशों में 26 फीसदी और निम्न आय वाले देशों में 16 फीसदी है। पहले ही सामुदायिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर कई परेशानियों से जूझ रहे भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए यह वाकई चिंतनीय है कि शारीरिक श्रम की कमी भी बीमारियों को बढ़ावा दे रही है।

बीते कुछ सालों में इंसानी शरीर की सक्रियता तेजी से कम हुई है। सुस्त और निष्क्रिय जीवनशैली लोगों की आदत बन रही है। महानगरीय जीवनशैली में तो मशीनों की दस्तक ने रोजमर्रा के कामकाज से जुड़ी क्रियाशीलता को और भी कम कर दिया है। हालिया बरसों में लोगों की जीवनशैली व आर्थिक स्थिति में भी बड़ा बदलाव आया है, जिसके चलते हर सुख-सुविधा जुटा लेना लोगों की प्राथमिकता बन गई है। नतीजतन, सुविधासंपन्न जीवनशैली, कसरत से दूरी और बढ़ते प्रदूषण के चलते अब सेहत से जड़े अनगिनत दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। बदलते सामजिक और पारिवारिक ढांचे में महिलाओं की शारीरिक सक्रियता तो और भी कम हो गई है। इस सर्वे के मुताबिक भारतीय महिलाओं में शारीरिक श्रम न करने की समस्या पुरुषों की तुलना में दोगुनी है। देश की करीब 47.7 प्रतिशत महिलाएं पर्याप्त कसरत नहीं करती हैं। 2001 से 2016 के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में तीन में से एक महिला पर्याप्त व्यायाम नहीं करती है, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा चार में से एक है। पहले महिलाएं घरेलू कामकाज में काफी सक्रिय रहती थीं, लेकिन अब एकल परिवारों की बढ़ती संख्या के चलते न केवल घर के काम कम हुए हैं बल्कि घरेलू नौकर व मशीनों पर भी हद दर्जे की निर्भरता बढ़ी है। ऐसे में महिलाओं में भी कई शारीरिक और मानसिक व्याधियां बढ़ रही हैं।

देश की आधी आबादी में मोटापा और स्तन कैंसर जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि महिलाएं हों या फिर पुरुष निष्क्रिय जीवनशैली, काम का भारी दबाव, देर तक काम करना और खान-पान की खराब आदतों के साथ ही व्यायाम के लिए वक्त नहीं निकाल पाने के कारण गंभीर बीमारियां तेजी से दस्तक दे रही हैं। आज के समय में शहरों में ही नहीं गांवों-कस्बों में शारीरिक सक्रियता में कमी आई है। यही वजह है कि बीमारियां ही नहीं मानसिक और मनोवैज्ञानिक उलझनें भी कई गुना बढ़ी हैं। जीवनशैली जनित बीमारियां हर आयु वर्ग को घेर रही हैं। छोटे बच्चे भी बड़ी संख्या में मोटापे के शिकार बन रहे हैं। गौरतलब है मोटापा दूसरी बीमारियों की भी बड़ी वजह है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 2025 तक 1.7 करोड़ बच्चों में मोटापे का खतरा बढ़ जाएगा। चिंतनीय है कि हर उम्र, हर वर्ग के लोगों में बढ़ रही आरामतलब जीवनशैली की आदत और आलस्य सिर्फ शारीरिक सक्रियता ही कम नहीं कर रहे बल्कि अब ऐसी लाइफस्टाइल की वजह से पैदा हो रहीं व्याधियां जन-धन के बड़े नुकसान के लिए भी जिम्मेदार हैं।

गौरतलब है कि वर्ष 2007 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत के भविष्य के लिए एक चेतावनी जारी की थी, जिसके मुताबिक 2020 में 70 लाख भारतीयों की मौत जीवनशैली आधारित बीमारियों से होगी। देखने में यह भी आ रहा है कि भारत में असामयिक मौत मरने वाले अधिकतर लोग मोटापा, हृदय रोग व डायबिटीज के चलते ही अपनी जान गंवा रहे हैं। नि:संदेह, ऐसी बीमारियां अस्वस्थ जीवनशैली के कारण उपजती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कुछ पहले भी अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि आधुनिक जीवनशैली की वजह से लोग बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। साथ ही कैंसर, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियां सही खान-पान न होने और बेतरतीब रहन-सहन के कारण ही तेजी से फैल रही हैं। कुछ सालों में डिजिटल जीवनशैली ने भी आलस्य को बढ़ाया है, जो स्मार्ट गैजेट्स ने बेवजह ही व्यस्तता को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है, जो कई मानसिक व्याधियों को भी जन्म दे रही है। महानगरों में तो ऑनलाइन जिंदगी का हाल यह है कि सामाजिक-पारिवारिक संबंध भी बिगड़ रहे हैं। स्मार्ट गैजेट्स में खोये रहने के कारण अब हर उम्र के लोगों के शारीरिक और मानसिक संवेदनात्मक स्थितियों पर इनका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर बीत रहा समय व्यावहारिक जिंदगी की जरूरतों और जिम्मेदारियों से ही चुराया जा रहा है। व्यायाम के लिए समय न निकला पाने वाले लोग भी ऐसे मंचों पर काफी ज्यादा समय बिता रहे हैं। ऐसे में यह आवश्यक है कि आभासी दुनिया से बाहर निकलकर व्यावहारिक धरातल पर जिंदगी से जुड़ी समस्याओं को लेकर सोचा जाए और शारीरिक व्यायाम को प्राथमिकता दी जाए। साथ ही श्रमशील जीवनशैली को अपनाने की ओर फिर लौटने की कोशिश भी जरूरी है, ताकि आलस्य व सहूलियतों का मेल स्वास्थ्य पर भारी न पड़े। नागरिकों का अपनी सेहत से जुड़ी गतिविधियों को लेकर सजग और सक्रिय होना अच्छे स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि देश की बेहतरी के लिए भी बेहद जरूरी है क्योंकि आमजन के स्वास्थ्य का सीधा असर उनकी कार्य-शक्ति पर पड़ता है। जिस तरह सरकार का बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहना आवश्यक है, उसी तरह तो आम नागरिकों का भी अपनी जीवनशैली का चुनाव करते हुए चिंतनशील रहना जरूरी है।

देश में आम या खास सभी के लिए बेहतर स्वास्थ्य बेहद जरूरी है। आज की जो भागदौड़ भरी जिंदगी है, अगर उसमें हम स्वस्थ नहीं रहेंगे, तो आगे नहीं चल पाएंगे। स्वास्थ्य वह पूंजी है, जिसे हम जब जितना चाहें, जैसा चाहें कमा सकते हैं। इसमें न तो पैसा खर्च होगा और न ही कोई तनाव होगा। फिर भी हम भारतीयों का बेहतर स्वास्थ्य के प्रति ध्यान नहीं है। इसीलिए युवा देश बीमार है।
डॉ. मोनिका शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

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