घाटी के नागरिकों की भूमिका उम्दा

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Valley Citizen Against Terrorism

राजएक्सप्रेस, भोपाल। कश्मीर में सेना को आतंकियों को मार गिराने में सेना को जो सफलता मिल रही है, उसमें सुरक्षा एजेंसियों, और वहां के नागरिकों की भी बड़ी भूमिका है (Valley Citizen Against Terrorism)। घाटी के नागरिकों की जिस भूमिका पर सेना काम कर रही है, वह उम्दा है। इसी एक रास्ते से आतंक मिटेगा।

सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स के डायरेक्टर जनरल राजीव राय भटनागर ने कहा है कि कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों के एक के बाद एक कई अभियानों से आतंकवादियों की अपनी उम्र घटी है और पिछले दो साल से भी कम वक्त में 360 से ज्यादा आतंकी ढेर किए गए हैं। वैसे, इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि घाटी में आतंकी संगठनों में शामिल होने वाले युवाओं की तादाद बढ़ रही है। इसलिए आतंकियों को ढेर करने के साथ ही सेना को युवाओं तक आतंकियों की पहुंच रोकना भी जरूरी है। हाल के दिनों में जिस तरह से घाटी के युवाओं का आतंकी संगठनों की तरफ झुकाव बढ़ा है, वह गंभीर चिंता प्रकट करता है। अब कई ऐसे युवा हैं, जो आतंक के रास्ते से अलग नहीं हुए हैं। इन भटके युवाओं को आतंकवाद के ‘ग्लैमर’ की सच्चई बतानी होगी और उन्हें समझना होगा कि इससे उन्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला। कश्मीर घाटी के युवाओं का आतंक के रास्ते पर जाना कई कारणों को जन्म देता है, जिनमें एक है बेरोजगारी। इसी बेरोजगारी का फायदा आतंकी संगठन और अलगाववादी उठाते रहे हैं।

दरअसल, कश्मीर में रोजगार के नए अवसर उपलब्ध न होने की वजह से बहुत सारे युवा बेकार हैं और वे बड़ी आसानी से कट्टरपंथियों की तकरीरों और अलगाववादियों के बहकावे में आ जाते हैं। फिर बहुत सारे युवाओं के मन में अपने किसी परिजन के साथ सुरक्षाबलों की ज्यादतियों की कसक है, जिसे आतंकी संगठन उकसाने और उन यादों के जरिए उनमें आक्रोश भरने में कामयाब हो जाते हैं। परिजनों के साथ हुई ज्यादतियां ही वहां के सामान्य नागरिकों को भी विद्रोह पर उतरने को बाध्य करती हैं। आतंकवाद पर काबू पाने के लिए सुरक्षाबलों की सख्ती से इंकार नहीं किया जा सकता। सीमा पार से मिलने वाली इमदाद और घुसपैठ पर पूरी तरह रोक लगाना भी जरूरी है। घाटी के आम नागरिकों में व्याप्त आक्रोश को शांत करने और युवाओं के गुमराह होने से बचाने के लिए वही तरीके नहीं काम आ सकते, जो सीमा पर आतंकवादियों से निपटने में काम आते हैं।

सीमा पर सुरक्षा उपाय कड़े हों, पर अपने नागरिकों के साथ बातचीत के जरिए अमन की सूरत बहाल करने की कोशिशें भी चलती रहनी चाहिए। बातचीत का सिलसिला बंद हो जाने से नागरिकों के आतंकी संगठनों के प्रति हमदर्दी या उनके प्रति झुकाव बढ़ने की आशंका बनी रहती है। आतंकवाद पर काबू पाने के मकसद से की जा रही तमाम कवायदों के बावजूद आज भी कई बार आतंकी गिरोह सुरक्षा बलों पर हमले कर मौजूदगी का अहसास कराते रहते हैं। लेकिन कुछ समय से खुफिया सूचनाओं के लेन-देन के मोर्चे पर एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर हुआ है और इसमें स्थानीय आबादी को भी सहयोग की भूमिका में लाने की कोशिश की गई है। अब हमलों से निपटने के लिए की जाने वाली पूर्व रणनीति बनाने में काफी मदद मिली है। इस रणनीति पर चलते रहना होगा।

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