जानियें क्यों किया जाता है महिलाओं द्वारा हरतालिका तीज व्रत और क्या हैं इसका महत्व

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Hartalika Teej

हमारें देश में वैसे तो कई व्रत महिलाओं द्वारा किए जातें है। लेकिन हरतालिका तीज (Hartalika Teej) व्रत की बात ही अलग हैं। यह व्रत सबसे कठिन माना जाता हैं। अखंड सौभाग्य के लिए किया जाने वाला व्रत हरितालिका तीज इस वर्ष 12 सितंबर को है। यह व्रत हर साल भाद्र शुक्ल तृतीया बुधा के चित्रा नक्षत्र को रखा जाता है, जिसमें महिलाएं पतियों के सुख-समृद्धि, सौभाग्य, निरोग्यता के लिए और कुंवारी लड़कियाँ मनोवांछित वर प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की आराधना करती हैं। इस व्रत का महिलाएं साल भर से इंतजार करती हैं। हरतालिका व्रत का शुभ मुहूर्त सूर्योदय के बाद से शाम के 6:46 मिनट तक महिलाएं पूजा कर सकती है। हरतालिका तीज की पूजन प्रदोष काल में शाम के समय प्रारंभ करना चाहिए।

हरतालिका व्रत का इतिहास और महत्व

हरतालिका व्रत को हरतालिका तीज या तीजा भी कहा जाता हैं। ऐसी मान्यता हैं कि, सबसे पहले यह व्रत माता पर्वती ने भगवान शंकर को प्राप्त करने के लिए किया था। माता पर्वती ने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए अन्न और जल आदि का त्याग कर घोर तपस्या की थी। उन्होंने बालू की शिवलिंग बनाकर वन में जाकर शिव जी की आराधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर माता पर्वती के सामने प्रकट हुए और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।

माता पार्वती ने भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन हस्त नक्षत्र रेत से शिवलिंग का निर्माण किया था। तभी से अच्छे पति की कामना और पति की दीर्घायु के लिए सौभाग्यवती स्त्रियां इस व्रत को रखने लगी। कहा जाता हैं कि, यह व्रत करने से मनोवांछित वर की प्राप्ति और पति की लम्बी आयु रहती है। यह व्रत करवाचौथ से भी कठिन है, क्योंकि करवाचौथ में चांद देखने के बाद व्रत तोड़ दिया जाता है। लेकिन इस व्रत में पुरे दिन और पूरी रात निर्जल व्रत किया जाता है, अगले दिन पूजन और सूर्योदय के बाद ही व्रत तोड़ा जाता है।

Hartalika Teejकैसे किया जाता हैं हरतालिका तीज

इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और स्नान आदि कर नए वस्त्र पहनती हैं। फिर नदी, तालाब या घर पर ही मिट्टी या बालू रेत से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश की प्रतिमा बनाकर फुलहरा के नीचे स्थापित करती हैं। फुलहरा को कुछ प्राकृतिक फूलो-पत्तियों से बनाया जाता है। फिर शिव-पार्वती और गणेश जी की पूजा की जाती है। इस फुलहरा का इस पूजा में विशेष महत्व होता है। इस दिन महिलायें सोलह श्रृंगार कर रात भर जागकर पूजा, आराधना, भजन- कीर्तन और नृत्य आदि करती हैं।

सुबह स्नान करने के बाद श्रद्धा पूर्वक सभी सुहागिन महिलाओं को श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, खाद्य सामग्री, फल, मिस्ठान और शक्ति आभूषण का दान किया जाता हैं। अंत में पूजा, हवन, आरती और भोग लगाकर प्रसाद सभी लोगों में बाँट दिया जाता हैं और फिर भगवान शिव, माँ पार्वती, गणेश की मूर्ति और अन्य पूजन सामग्री को नदी, तालाब में विसर्जित कर दिया जाता हैं। एक बार प्रारम्भ करने के बाद जीवन पर्यन्त तक इस व्रत को रखना पड़ता है। यदि किसी कारण वश कोई महिला इस व्रत को न कर सकें, तो उसके बदले में दूसरी महिला या उसका पति भी इस व्रत को रख सकता है। यह व्रत काफी पुण्यदायी माना जाता हैं।

हरतालिका व्रत कथा की मान्यता

हरतालिका व्रत की कथा में कहा गया है कि, जो महिला व्रत के दौरान सोती है वह अगले जन्म में अजगर बनती है। जो दूध पीती है वह सर्पिनी बनती है। जो व्रत नहीं करती वह विधवा बनती है। जो शक्कर खाती है वह मक्खी बनती है। जो मांस आदि खाती है वह शेरनी बनती है। जो जल का सेवन करती है वह मछली बनती है। अन्न खाती है वह सूअर बनती है। जो फलों आदि का सेवन करती है वह बकरी बनती है।

ऐसी मान्यता हैं, लेकिन वास्तविक जीवन पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। इस पूजा के लिए विशेष सामग्री की जरूरत होती है जैसे- सभी प्रकार के फल और फूल के पत्ते, बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल, फूल, अकांव का फूल, मंजरी, जनैव, नाडा, वस्त्र, माता गौरी के लिए सुहाग का पूरा सामान, घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, श्री फल, कलश, पंचामृत-घी, दही, शक्कर, दूध, शहद, हवन सामग्री आदि।

Hartalika Teejहरतालिका तीज व्रत पूजा विधि और नियम
  • इस व्रत को निर्जला और निराहार किया जाता है। सूर्योदय से लेकर अगले दिन के सूर्योदय तक जल ग्रहण नहीं किया जाता।
  • हरतालिका तीज में माँ पार्वती, शिव जी और गणेश जी की बालू रेत की प्रतिमा बनाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है।
  • हरतालिका तीज प्रदोषकाल में किया जाता है। सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है। यह दिन और रात के मिलन का समय होता है।
  • पूजा स्थल को फूलों और रंगोली से सजाकर एक चौकी रखते और फिर उसपर बनाई गई प्रतिमा स्थापित करते हैं।
  • फिर पूजन और सुहाग सामग्री माता पार्वती और शिव जी को अर्पित करने की परम्परा है।
  • इस प्रकार पूजन के बाद हरतालिका तीज की कथा पढ़कर हवन और आरती की जाती हैं।
  • इस प्रकार की पूजा रात भर में पांच बार की जाती हैं।
  • सुबह आरती के बाद सुहाग सामग्री महिलाओं को बाँट दी जाती हैं।
  • हरतालिका तीज व्रत को शिव मंदिरों में भी किया जा सकता है।
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