हुड़दंगियों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

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Kawad Yatra

राजएक्सप्रेस, भोपाल। श्रावण मास को भगवान भोलेनाथ की अराधना का पर्व माना जाता है, कांवड़ यात्रा  (Kawad Yatra) के माध्यम से लोग भगवान शिव को प्रसन्न करते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप बदला है। कुछ लोगों ने आस्था के इस पर्व को मौज-मस्ती का मौका मान लिया है। शराब पीना, महिलाओं पर छींटाकशी और गाली-गलौच आम हो गया है। यही वजह है कि कांवड़ यात्रा के दौरान विभिन्न धार्मिक स्थलों पर आपराधिक घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

कावड़ यात्रा (Kawad Yatra) में शामिल हुड़दंगियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने रुख सख्त किया है। कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए यहां तक कहा है कि हुड़दंग मचाने वाले अपना घर जलाकर दिखाएं। कोर्ट ने ऐसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए पुलिस को आदेश दिया है कि ऐसे असामाजिक तत्व जो दूसरों का नुकसान करके खुद को हीरो समझते है, ऐसे लोगों से पुलिस सख्ती से निपटे और रहम न करे। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में जस्टिस एएम खानविलकर व जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने कहा कि कोर्ट अब इससे संबंधित कानून में संशोधन के लिए सरकार की प्रतीक्षा नही करेगा व जल्द ही नए और सख्त कानून व नियमों का निर्माण होगा। दरअसल पिछले दिनों दिल्ली के मोती नगर मेट्रो स्टेशन पर एक गाड़ी से कावड़िए की टक्कर हो गई थी। जिसके बाद कांवड़ियों ने गाड़ी में तोड़फोड़ की। गाड़ी में बैठी लड़की को किस तरह वहां के लोगों ने बचाकर निकाला। इस घटना का वीडियो भी वायरल हुआ था। वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि पुलिस के सामने ही कांवडियों ने जमकर उत्पात मचाया। चूंकि कांवड़ियों की संख्या ज्यादा थी इसलिए पुलिस भी बेबस नजर आई।

कांवड़ियों ने अलग-अलग राज्यों व जगहों पर उत्पात मचाया है। इस तरह के मामलों में शीर्ष अदालत ने गंभीरता दिखाते हुए कहा कि यदि कोई तोड़फोड़ करता है या फिर कानून हाथ में लेता है तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाते हुए कड़ी कार्यवाही की जाए। इससे पहले पूर्व अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने खंडपीठ को बताया कि गुडांगर्दी, उपद्रव व दगों की घटनाओं पर संबंधित क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक की ही जबावदेही तय की जानी चाहिए। खंडपीठ ने यह भी कहा कि देश में रोजाना किसी न किसी जगह आंदोलन के रूप में दंगे व उपद्रव होते रहते है। चाहे फिर मराठा आंदोलन हो, अनुसूचित जाति और जनजाति के मामले में हुए हिंसक प्रदर्शन हों या हाल में कांवड़ियों की हिंसक घटनाएं हों। यदि हम आंदोलनों की बात करें तो आंदोलनकारी आंदोलन के नाम सरकारी व प्राइवेट संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। देश में आंदोलनों का मेला हर वक्त सजा रहता है, जिससे सालाना कई लाखों करोड़ों की बर्बादी होती है। हम हर माह कोई न कोई आंदोलन के बारे में सुन ही लेते हैं।

हमारे देश में आजादी से पहले आंदोलन का मतलब अलग होता था लेकिन आज आंदोलन का अर्थ पूरी तरह ही बदल चुका है। अब सिर्फ आंदोलन के नाम पर प्राइवेट और सरकारी संपत्तियों को क्षति पहुंचाकर इस तरह का माहौल बनाया जाता है जिससे सभी कार्य ठप हो जाएं और अपनी बात जबरन मनवाने के लिए सरकार को मजबूर किया जाए। तकनीकी युग में आगे बढ़ रहे भारत में इस तरह के मामले अभिशाप बनते जा रहे हैं। देश में दंगाइयों के हौसले इसलिए भी बुलंद हैं क्योंकि उन पर कार्रवाई नहीं हो पाती। राजनीतिक दबाव में सब बरी हो जाते हैं। इस बात का अंदाजा दंगाइयों को भली-भांति होता है। तभी तो देश में इन लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है बावजूद इसके इन्होंने पूरे देश की कानून व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है।

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को लेकर गंभीरता दिखाई है लेकिन सवाल यह है कि पुलिस इसको कितनी गंभीरता से लेगी। यदि पुलिस ऐसे लोगों पर कड़ी कार्यवाही करे और निष्पक्ष जांच करे तो उपद्रवियों की संख्या में कमी आ सकती है। आज के युग में एक अच्छी बात यह है कि अधिकतर बड़ी घटनाएं किसी न किसी के कैमरे में कैद हो जाती हैं। अब सारा खेल पुलिस पर निर्भर करता है क्योंकि जब तक पुलिस ऐसे मामलों में तत्परता नहीं दिखाएगी, तब तक कानून की सख्ती बेअसर रहेगी। कहा जाता है कि श्रावण मास को भगवान भोलेनाथ की अराधना का पर्व माना जाता है, कांवड़ यात्रा के माध्यम से लोग भगवान शिव को प्रसन्न करते हैं, लेकिन पिछले कुछ सालों में कांवड़ यात्रा का स्वरूप बदला है। कुछ लोगों ने आस्था के इस पर्व को मौज-मस्ती का मौका मान लिया है। शराब पीना, महिलाओं पर छींटकशी और गाली-गलौच आम हो गया है। यही वजह है कि कांवड़ यात्रा के दौरान विभिन्न धार्मिक स्थलों पर आपराधिक घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अभी कुछ दिन पहले ही हरिद्वार में कांवड़ियों द्वारा एक विदेशी पर्यटक के साथ छेड़छाड़ करने का मामला सामने आया। गंगा स्नान कर रही विदेशी युवती को कांवड़ यात्रा में आए युवकों ने पानी में ही घेर लिया और युवती के साथ छेड़छाड़ करने लगे। बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद विदेशी महिला को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया गया।

कांवड़ यात्रा के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा कांवड़ियों को बेहतर इंतजाम देने की कोशिश की जाती है। लेकिन इसके बावजूद कई बार शिवभक्तों का रवैया भी गैर जिम्मेदाराना हो जाता है। कई बार तो कांवड़ियों की गुंडागर्दी का शिकार प्रशासन को भी बनना पड़ता है। बहरहाल अब यात्रा खत्म हो गई है, लेकिन आस्था के नाम पर कांवड़ियों ने जिस तरह से कानून का मखौल बनाया। यह बेहद ही शर्म की बात है। आस्था की इस यात्रा पर गुंडागर्दी का प्रदर्शन बेहद ही गलत है। देश की जनता कांवड़ियों को सिर आंखों पर बिठाती रही है। कांवड़ यात्रा शुरू होने से महीनों पहले उनके आराम के लिए जगह-जगह पंडाल बनने शुरू हो जाते हैं। सावन के महीने में लगभग हर जगह कांवड़ यात्रियों के लिए विश्राम शिविर, भंडारे वगैरह के आयोजन होते रहते हैं। जितना मान-सम्मान इन कांवड यात्रियों को इन दिनों मिलता है, इनमें से अधिकांश पूरे जीवन उसके हकदार नहीं हो सकते। इसलिए ऐसे अवसरों का लाभ लुच्चे-लफंगे लोग खूब उठाते हैं। टोलियां बना बनाकर ये भी कांवड़ियों का चोला ओढ़कर निकल पड़ते हैं या कांवड़ियों की टोलियों में शामिल हो जाते हैं।

इस तरह होता यह है कि कुछ सज्जन श्रद्धालुओं की तुलना में उन्मादी और उत्पाती लोगों का एक बड़ा काफिला कांवड़ियों के लिबास में चल रहा होता है। इनमें से कई समूह न सिर्फ तमाम ट्रैफिक और सुरक्षा नियमों को ताक पर रख देते हैं, बल्कि छेड़खानी, मारपीट तोड़-फोड़ जैसे उपद्रवों का लाइसेंस लिए घूमते हैं। लोगों की असुविधा का ध्यान रखे बगैर लाउडस्पीकर और साउंड बॉक्स लगाकर विभिन्न पड़ावों पर और रास्ते भर भी इनका नाचना-गाना चलता रहता है। इनकी हरकतों से ट्रैफिक में भारी दिक्कत आती है और सामान्य लोग बेबस और सहमे हुए नजर आते हैं। सवाल यह है कि धर्म, संस्कृति और परंपरा के नाम पर इनकी गुंडागर्दी को क्यों चलने दिया जाना चाहिए? हर साल ऐसी घटनाएं क्यों दोहराने की इजाजत दी जाती है? इस तरह की अप्रिय व असुविधाजनक स्थिति से निपटने के लिए जरूरी गाइडलाइंस क्यों नहीं बनाई जाती या पालन की जाती? इस तरह की भीड़ को अनुशासित रखने के लिए दुरुस्त सुरक्षा प्रबंध क्यों नहीं किए जाते? उपद्रवी कांवड़ियों की पहचान कर उन्हें सलाखों के पीछे क्यों नहीं पहुंचाया जाता? धर्म की आड़ लेकर की जाने वाली ऐसी उदंडता को बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। अगले साल इसका ध्यान रखना होगा।
योगेश कुमार सोनी (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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