स्कूली बस्तों का बोझ घटाना जरूरी

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NCERT Syllabus

राजएक्सप्रेस, भोपाल। केंद्र सरकार ने यह मान लिया है कि स्कूली बच्चों का मौजूदा पाठ्यक्रम (NCERT Syllabus)जटिल है और इसमें बदलाव की जरूरत है। मगर पाठ्यक्रम बदलते समय इस बात को याद रखना जरूरी है कि केंद्र सरकार के स्तर पर जो भी बदलाव हो, उसे सभी राज्य स्वीकार कर लें।

केंद्र सरकार ने स्कूली बच्चों के पाठ्यक्रम का बोझ कम करने का जो फैसला किया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम जटिल है और सरकार इसे घटाकर आधा करने वाली है। उन्होंने यह भी कहा कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे को कैबिनेट के सामने इस माह के अंत में पेश किया जाएगा, साथ ही जुलाई में शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) में संशोधन के आशय वाला बिल भी संसद के समक्ष रखा जाएगा। इस संशोधन में बच्चों को 5वीं और 8वीं में फेल न करने का फैसला पलटने की बात है। इसके तहत राज्यों को इन कक्षाओं की परीक्षा अपने तरीके से लेने का अधिकार दिया जाएगा। जावड़ेकर के अनुसार, सरकार छोटे बच्चों के बस्ते का बोझ कम करने के लिए भी एक विधेयक ला रही है, जिसमें स्कूलों द्वारा बच्चों को होमवर्क न देने का प्रावधान भी होगा। मद्रास हाईकोर्ट ने 30 मई को एक अंतरिम आदेश में केंद्र से कहा था कि वह राज्य सरकारों को निर्देश जारी करे कि वे स्कूली बच्चों के बस्ते का भार घटाएं और पहली-दूसरी कक्षा के बच्चों को होमवर्क से छुटकारा दिलाएं।

सरकार ने संभवत: पहली बार यह स्वीकार किया है कि एनसीआरटीई का पाठ्यक्रम जटिल है। देश के ज्यादातर स्कूलों में यही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है। पिछले कुछ समय से विभिन्न सरकारों की यह प्रवृत्ति हो चली है कि वे शिक्षा में बदलाव के नाम पर सिलेबस में कुछ नया जोड़ देती हैं। इस तरह पाठ्यक्रम बढ़ता चला गया। कई शिक्षाविदों ने इस पर सवाल उठाया और कहा कि कम उम्र में बहुत ज्यादा चीजों की जानकारी देने की कोशिश में बच्चे कुछ नया नहीं सीख पा रहे। उलटे सिलेबस का बोझ उन्हें रट्टू बना रहा है। यही नहीं, इस दबाव ने बच्चों में कई तरह की मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा की हैं। एकदम छोटे बच्चों को होमवर्क के झंझटों से मुक्त करना जरूरी है। आमतौर पर वे स्कूल से आने के बाद थक जाते हैं और उनका मस्तिष्क एक सीमा के बाद पढ़ाई में संलग्न नहीं रह पाता। नतीजा यह होता है कि उनका होमवर्क उनके अभिभावक करते हैं। इस तरह होमवर्क कुल मिलाकर एक कर्मकांड का रूप ले चुका है, जिसका विकल्प ढूंढना जरूरी है। वर्तमान सरकार 5वीं और 8वीं में फेल करने के सिस्टम को फिर से लाने के पक्ष में है, लेकिन इस पर राय बंटी हुई है।

मनोवैज्ञानिक लंबे समय से कह रहे हैं कि कच्ची उम्र में पढ़ाई का दबाव औसत मेधा और भिन्न रुचियों वाले बच्चों को कुंठित बनाता है। उन्हें फेल करने की व्यवस्था वापस लानी है, तो उनको दबाव से बचाने के रास्ते भी ढूंढने होंगे। जैसे, 14 साल से ज्यादा उम्र के बच्चों को कामकाजी कौशल सिखाने के प्रस्ताव को ज्यादा गंभीरता से लिया जाए। तोतारटंत के बजाय बच्चों में कुछ सीखने की प्रवृत्ति पैदा हो, इसी में उनके साथ-साथ देश की भी भलाई है।

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