ग्रेविटेशनल लेंसिंग ( Gravitational Lensing ) के बारे में इतना ज्ञात हुआ कि, यह किसी भी ग्रह, नक्षत्र, तारे, सितारे, आकाशगंगाओं को ढूंढ़ने के लिए बहुत ही सहायक होते है एवं इनकी मुख्य भूमिका होती है। कुछ ग्रेविटेशनल लेंस बहुत प्रभावी होते है और कुछ ग्रेविटेशनल लेंस इतने प्रभावी नहीं होते। हम इनका यह दुर्लभ गुण भी मान सकते है या यूं कहे कि, यह भिन्न-भिन्न तरह से अथवा कुछ प्रकार से ब्रह्माण्ड में उपस्थित है।

जी हाँ ग्रेविटेशनल लेंसिंग के भी कुछ प्रकार होते है। जिनकी अपनी प्रकृति एवं कार्यशैली होती है। विभिन्न गुणों से परिपूर्ण होने के कारण ये खुद को बहुत ही महत्वपूर्ण बना लेते है। वैज्ञानिकों की दृष्टि से समझे तो, उन्होंने ग्रेविटेशनल लेंसिंग को तीन प्रकार से बांटा है।

ग्रेविटेशनल लेंसिंग ( Gravitational Lensing ) तीन प्रकार की होती है जो इस प्रकार है – ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -2

  1. स्ट्रांग लेंसिंग
  2. वीक लेंसिंग
  3. माइक्रो लेंसिंग

स्ट्रांग लेंसिंग – 

ग्रेविटेशनल लेंसिंग ( Gravitational Lensing ) में प्रमुख रूप से स्ट्रांग लेंसिंग को अधिक महत्व दिया जाता है। स्ट्रांग लेंसिंग को मैक्रो लेंसिंग भी कहा जाता है। स्ट्रांग लेंसिंग तब ही होता है जब ग्रेविटेशनल लेंस ( Gravitational Lensing ) बहुत ज़्यादा शक्तिशाली हो तथा इसके पीछे छिपा प्रकाश का स्रोत बहुत ज़्यादा समीप हो।

उदाहरण –

किसी गैलेक्सी क्लस्टर के नीचे कोई अन्य गैलेक्सी उपस्थित हो जो उससे बहुत ज़्यादा दूरी पर स्थित न हो तो सामने उपस्थित एक गैलेक्सी क्लस्टर एक स्ट्रांग लेंस की तरह काम करेगा। इसलिए पीछे छिपी गैलेक्सी अपने आकर से कई गुना बड़ी नज़र आएगी। ठीक वैसे ही जैसे मैग्नीफाइंग ग्लॉस चीज़ो को बड़ा करके हमे दिखाता है। जैसा की हमने आपको बताया था कोई भी वस्तु हमे तभी दिखाई देती है जब उस वस्तु पर प्रकाश पड़ता है एवं हमारी आँखों तक पहुँचता है। प्रकाश जब उस वस्तु पर पड़ के वापस लौटता है तो वो वस्तु हमारी आँखों को दिखाई देती है।

चूँकि, पीछे छिपे गैलेक्सी का प्रकाश स्ट्रांग लेंस की वजह से एक से ज़्यादा रास्ते से निकल सकता है हमे कई अलग अलग स्थानों पर एक ही गैलेक्सी के एक से ज़्यादा इमेजेस दिख सकते है। यदि गैलेक्सी का स्थान किसी कारण बदलता है तब विभिन्न इमेजेस के स्थान भी बदलेंगे। क्योंकि यह सारे के सारे फोटो एक ही गैलेक्सी के है। यह ज़रूर होता है इन सभी फोटो के स्थान एक साथ नहीं बदलते क्योंकि प्रकाश ने इन तक पहुंचने के लिए अलग अलग रास्ते तय किये है।

जो रास्ता सबसे छोटा होगा उससे बने इमेज में गैलेक्सी की स्थिति सबसे पहले बदलेगी और जो रास्ता सबसे लम्बा होगा उससे बने इमेज में गैलेक्सी की स्थिति सबसे बाद में बदलेगी। स्ट्रांग लेंसिंग के कारण हमे और दिलचस्प चीज़े देखने को मिलती है। जिसे हम आइंस्टीन रिंग भी कहते है।

आइंस्टीन रिंग –ऐसा Gravitational Lensing टेलिस्कोप जो प्रकृति ने बनाया है वैज्ञानिकों के लिए वरदान भाग -2

जब सोर्स ऑफ़ लाइट, ग्रेविटेशनल लेंस एवं आब्जर्वर एक ही लाइन में उपस्थित हो, सोर्स से आ रहे, लाइट को ग्रेविटेशनल लेंस यूनिफोर्मली बेंड करता है जिसके कारण हमे ब्राइट लाइट का एक रिंग नज़र आता है, जिसे हम आइंस्टीन रिंग कहते है।

वीक लेंसिंग –

वीक लेंसिंग उसे कहते है जब ग्रेविटेशनल लेंस ( Gravitational Lensing ) उतना पॉवरफुल नहीं होता जितना की वो स्ट्रांग लेंस में होता है इसी कारण वो सोर्स की विभिन्न तस्वीरें बनाने में असक्षम होता है एवं यह आइंस्टीन रिंग दिखाने के लिए सक्षम नहीं होता है। इस स्थिति में सोर्स हमे अपने ओरिजिनल आकर से ज़्यादा खींचा और मैग्निफाय दिखाई देता है। ऐसे में सोर्स का आकार और भार पता हो तो प्रकाश हम तक पहुंचने में जितना बेंड हुआ है उसे कैलकुलेट करके हम ग्रेविटेशनल लेंसिंग की प्रॉपर्टी के बारे में आसानी से पता लगा सकते है।

आमतौर पर हमे सोर्स के आकार और भार की ठोस जानकारी नहीं होती लेकिन हमे उसकी एवरेज प्रॉपर्टी ज़रूर पता होती है। जिसका इस्तेमाल हम करते है। जैसे की हम मान ले, हमारे पास एक हज़ार गैलेक्सी की तस्वीर हो, वो सब स्पाइरल फॉर्म में हो, सुदूर में मौजूद कोई नयी गैलेक्सी अगर हमे मिलती है तो, उसका आकार भी स्पाइरल फॉर्म में ही होगा। क्योंकि सभी हज़ार गैलेक्सी का शेप और फॉर्म एक जैसा है तो उसी दिशा में दूर मिलने वाली गैलेक्सी का फॉर्म भी वैसा ही होगा। इसका कारण है अधिकतर गैलेक्सी एक ही पैटर्न को फॉलो करती है। इस वीक ग्रेविटी लेंसिंग का इस्तेमाल कर गैलेक्सी और गैलेक्सी क्लस्टर की प्रॉपर्टी के बारे में पता लगते है, जो एक वीक ग्रेविटेशनल लेंस की तरह काम कर रहे होते है।

माइक्रो लेंसिंग –

माइक्रो लेंसिंग अन्य दो स्ट्रांग लेंसिंग और वीक लेंसिंग से एक दम अलग होती है। क्योंकि माइक्रो लेंसिंग में ग्रेविटेशनल लेंस ( Gravitational Lensing ) काफी छोटा होता है। स्ट्रांग एवं वीक लेंसिंग में देखा है कि, इनमे या तो गैलेक्सी क्लस्टर होते थे या गैलेक्सी जो की काफी शक्तिशाली होते थे। लेकिन माइक्रो गैलेक्सी में ग्रेविटेशनल लेंसिंग का काम स्टार या एक्सो प्लेनेट करते है जो कि इस तरह की लेंसिंग से सुदूर ग्रहों का पता लगाते है जिनसे आ रही वास्तविक लाइट हम तक पहुंचते पहुँचते काफी मंद हो जाती है। माइक्रो लेंसिंग के कारण यही मंद लाइट कुछ समय तक चमकदार दिखाई देती है।

ऐसा क्यों होता है आईये हम जानते है ? 

जैसा की आप जानते है ग्रेविटी के कारण लाइट की दिशा भी बदल जाती है जिसके कारण ये एक मैग्नीफाइंग ग्लॉस की तरह काम करता है। माइक्रो लेंसिंग तब होता है जब किसी तारे या माइक्रो ग्रेविटी दूर मौजूद किसी तारे से आ रही लाइट को इस तरह से फोकस कर देता है जैसे की यह हमे कुछ समय के लिए चमकीले दिखाई देने लगते है।

उदाहरण –

दूर स्थित एक तारे से आ रही लाइट की दिशा को एक एक्सो प्लेनेट इस तरह से बदल देता है कि जब यही तारा हमे दिखाई देगा तो यह और भी ज़्यादा चमकदार दिखाई देगा। दूर स्थित तारा यह बता रहा है कि, किस तरह से दूर स्थित तारे का ब्राइटनेस माइक्रो लेंसिंग की वजह से लगातार बढ़ रहा है।

लेकिन इसी में ब्राइटनेस का छोटा सा ऑब्जेक्ट भी उपस्थित होता है जो बीच में स्थित एक्सो प्लेनेट की लेंसिंग के कारण हुआ है जो ब्राइटनेस यहाँ कुछ समय तक पड़ी है वो एक्सो प्लेनेट के तारे और लेंसिंग इफ़ेक्ट के कारण है। जैसे ही इस एक्सो प्लेनेट और इस तारे का लेंसिंग इफ़ेक्ट खत्म हो जाता है तब पीछे स्थित तारे का भी चमकना बंद हो जाता है। एक एस्ट्रोनॉमर ऐसी चीज़ो को तब डिटेक्ट करता है जब किसी तारे की चमक कुछ दिनों के लिए जैसे कि, 15 से 30 दिनों के लिए अचानक से पहले से ज़्यादा बढ़ जाये फिर अचानक उसकी चमक पहले जैसे की तरह ही घट जाये अगर कोई ग्रह वहां स्थित हुआ तो थोड़ी देर के लिए वो भी हमे चमकता हुआ दिखाई देगा। इससे हमे पता चल जाता है कि, वहां पर कोई ग्रह स्थित है।

इसकी मदद से ग्रहों की स्थिति का पता लगा पाते है। हम आपको भाग -3 में बताएँगे कि, कैसे ग्रेविटेशनल लेंसिंग की मदद से डार्क मेटर की खोज की गयी। ग्रेविटेशनल लेंसिंग का भाग -1 पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे।
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