व्याधियों की वजह बनता सोशल मीडिया

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Social Media

राजएक्सप्रेस,भोपाल। मौजूदा समय में हर उम्र के लोगों का काफी समय ऑनलाइन बीत रहा है। नतीजतन न तो हम कुछ नया सीख रहे हैं और न ही अपने परंपरागत परिवेश और संबंधों को संभाल पा रहे हैं। ऐसे में आभासी दुनिया में अपनी मौजूदगी के मायनों के संदर्भ में जरूरत और लत का अंतर समझना जरूरी है, ताकि सोशल मीडिया (Social Media) बीमारियों का नहीं बल्कि बदलाव का माध्यम बने। डिजिटल माध्यमों की लत जैविक प्रतिक्रियाओं पर भी गहरा असर डाल रही है।

शोध पत्रिका न्यूरो रेगूलेशन में छपा ताजा अध्ययन चेताने वाला है। इस हालिया शोध के मुताबिक, सोशल मीडिया से बहुत ज्यादा जुड़ाव रखना इंसान के व्यवहार में बदलाव की वजह बना रहा है। डिजिटल माध्यमों की लत हमारी जैविक प्रतिक्रियाओं पर भी गहरा असर डाल रही है। समाज और परिवेश से अलग-थलग कर देने वाली यह लत कई मानसिक और दैहिक बीमारियों की वजह बन रही है। गौरतलब है कि कुछ समय पहले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भी सोशल मीडिया से किशोरों का जीवन गहराई से प्रभावित होने की आशंका जताई थी। इस रिसर्च के परिणामों में भी सामने आया था कि सोशल मीडिया का प्रभाव वास्तविक जीवन में इस कदर बढ़ रहा है कि ऑफलाइन होने पर घरों में झगड़े होते हैं। स्कूलों में समस्याएं सामने आती हैं।

पूर्वी यूरोपीय देश हंगरी में सोशल मीडिया एडिक्शन स्केल नाम का पैमाना भी इजाद किया गया है, जिसके माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि यूजर को सोशल मीडिया की कितनी लत है। इस स्केल के मुताबिक हंगरी के 4.5 फीसद लोगों को सोशल मीडिया की लत पड़ गई है, जिसके चलते ऐसे लोगों में खुद पर भरोसे की कमी साफ नजर आती है। ये अवसाद के शिकार हो चुके हैं। जज्बाती जरूरतों के फेर में इन प्लेटफॉर्म्स पर हद से ज्यादा निर्भर हो गए हैं। आत्ममुग्धता से घिर चुके हैं। नतीजतन, ऐसे लोगों को बाकायदा सलाह दी गई कि वे स्कूल-कॉलेज में सोशल मीडिया डिएडिक्सन क्लास में जाएं और खुद का इलाज कराएं। सामान्य जीवन जीने की ओर लौटें। हालिया समय में वैश्विक स्तर पर तकरीबन हर अध्ययन का खुलासा यही कहता है कि विचार और व्यवहार पर गहरा असर डाल रहे वचरुअल संसार में बढ़ी उपस्थिति आमजीवन में असामान्य व्यवहार और जीवनशैली संबंधी बदलावों के लिए जिम्मेदार है। बस उम्र और वर्ग के अनुसार इसका प्रभाव अलग-अलग है।

युवाओं में इस मायावी संसार में मौजूदगी के कारण शिक्षा और व्यक्तिगत संबंधों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है तो पारिवारिक जीवन में रिश्तों में दरार आ रही है। बच्चे आत्मकेंद्रित और आक्रामक बन कम उम्र में ही दिशाहीन हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षो में दुनियाभर में करोड़ों लोग सोशल मीडिया के लती हो गए हैं। हालात ऐसे हो चले हैं कि किसी भी तरह की ऑफलाइन गतिविधियों में लोगों की रुचि ही नहीं दिखती। न तो घरेलू और आपसी संबंधों में संवाद बचा है और न ही कार्यस्थल पर सार्थक वार्तालाप। इसकी वजह भी साफ है कि फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर, स्नैपचेट, इंस्टाग्राम जैसे वचरुअल प्लेटफॉर्म्स से लगातार जुड़े रहने पर इंसानी दिमाग कुछ खास दिशाओं में सोच ही नहीं पाता। अब तो बच्चे हो या बड़े खेल भी स्क्रीन के मैदान में ही खेले जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीजेज के मसौदे के 11वें संशोधन में ‘गेमिंग डिसआर्डर’ को भी शामिल किया है। इतना ही नहीं सोशल मीडिया की लत को सिगरेट या शराब के नशे की तरह भी माना जा रहा है। नोटिफिकेशन न देख पाने, लाइक-कमेंट न मिलने या कम मिलने और स्मार्ट गैजेट की बैटरी खत्म होने की स्थितियां मन में बेचैनी पैदा करने लगी हैं। ऐसे लती लोगों के व्यवहार में भय और आत्ममुग्धता का अजीबोगरीब मेल दिखता है जो कहीं न कहीं औरों से पीछे छूट जाने की चिंता लिए है। कहना जरूरी हो जाता है कि यह चिंता आधारहीन और यह बेचैनी गैर-जरूरी है। यह भावनात्मक जिक्र और डर उन बातों के लिए है जिनके असल में कोई मायने ही नहीं। कुछ ही समय पहले मुंबई में एनजीओ द्वारा 223 लोगों पर हुए सर्वे में लोगों से की गई बातचीत का नतीजा बताता है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला जुड़ाव असली नहीं बल्कि केवल दिखावा मात्र है। इसमें न तो अपनापन है और न ही किसी से कोई भावनात्मक लगाव।

इतना ही नहीं ट्रोलिंग, गाली-गलौज, बदसलूकी वाला बर्ताव भी इन मंचों से जुड़े लोगों के लिए तनाव और अवसाद का कारण बन रहा है। बावजूद इसके लोग इन माध्यमों के लती बन रहे हैं सोशल मीडिया लोगों का नींद और सुकून छीनने में कामयाब है। दरअसल, सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण इस्तेमाल न हो तो यह माध्यम न केवल समय और ऊर्जा खपाने वाला बल्कि सोच समझ की दिशा खो देने वाला मंच भी है। तभी तो सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर सलाहियत और सजगता दोनों जरूरी हैं। गौर करने वाली बात है कि भारत में फेसबुक चलाने वाले 24.1 करोड़ लोग हैं और वॉट्सएप का इस्तेमाल 20 करोड़ लोग करते हैं। देश में स्मार्ट फोन यूजर्स की बढ़ती संख्या और इंटरनेट के विस्तार से अब सोशल मीडिया की पहुंच गांवों-कस्बों तक हो गई है। आंकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर फोन से मौजूदगी रखने वालों की संख्या 56 फीसदी की दर से बढ़ रही है। हमारे यहां सोशल मीडिया के इन प्लेटफॉर्म्स के जरिये भ्रमित करने वाली खबरें साझा करने से लेकर धार्मिक-राजनीतिक उन्माद तक फैलाया जा रहा है। अब खबरें आमजन तक पहुंचने से पहले ही कुटिल सोच और राजनीति का शिकार हो रही हैं। इसमें फर्जी फोटो शेयर करना एक बड़ी समस्या बना गया है। यहां जिम्मेदार अभिव्यक्ति के बजाय असामाजिक और अविश्वसनीय सामग्री को साझा किए जाने का चलन चल पड़ा है।

नतीजतन, आभासी दुनिया के इस गैर जिम्मेदार व्यवहार का असर अब आम जीवन पर भी दिखने लगा है। विचारणीय यह है कि यह सोशल मीडिया की लत ही है जो सब कुछ जानते समझते हुए भी लोग इस चक्रव्यूह से नहीं निकल पा रहे हैं। बावजूद इसके कि घर से दफ्तर तक उनकी जिंदगी इससे प्रभावित हो रही है। कम्प्यूटर्स इन ह्यूमन बिहेवियर नामक पत्रिका के एक अध्ययन के मुताबिक, फेसबुक यूजर्स की संख्या में 20 फीसदी की वार्षिक बढ़ोतरी के साथ तलाक दर में 2.18 से 4.32 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया है। यह कुछ वैसा ही है, जैसे किसी परेशानी के समय लोगों को शराब या ड्रग्स की लत लग जाती है। यानी संबंधों के टूटने की वजह तो सोशल मीडिया है ही, बिखरते रिश्तों को संभालने के समय भी लोग वचरुअल दुनिया में ज्यादा वक्त बिताने लगते हैं। सोशल मीडिया की लत के शिकार लोग चिड़चिड़े, गुस्सैल और आलसी हो जाते हैं। उनकी निजी व सामाजिक जिंदगी इन प्लेटफॉर्म्स पर बेवजह बिताए वक्त से प्रभावित होती है। इस आभासी दुनिया को लोगों ने व्यक्तिगत परेशानियां साझा करने का माध्यम भी बना लिया है, जबकि असली रिश्तों की जगह वचरुअल दुनिया के अनजाने चेहरे नहीं ले सकते।

मानवीय व्यवहार में कई तरह के विरोधाभासी बदलाव लाने वाले सोशल मीडिया की लत इस कदर हावी हो गई है कि दुनियाभर में लोग मनोवैज्ञानिकों और चिकित्सकों की सलाह लेने लगे हैं। विशेषज्ञ भी इस मानसिक व्याधि से जूझ रहे लोगों को अपनों परायों से घुलने-मिलने और वास्तविक जीवन से जुड़ने की सलाह दे रहे हैं। स्क्रीन में झांकने के बजाय अपने परिवेश को जीने की राह सुझा रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में तो बाकायदा डिजिटल डिटॉक्स की सुविधाएं देने वाले स्टार्टअप्स शुरू हो चुके हैं। मोटी फीस वसूलकर लोगों को सोशल मीडिया की लत से छुटकारा दिलाया जा रहा है।
डॉ. मोनिका शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

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