दक्षिण में खुला भाजपा का द्वार

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Karnataka Results

राजएक्सप्रेस,भोपाल। Karnataka Results: कर्नाटक के नतीजों का विश्लेषण करें, तो भाजपा के लिए दक्षिण में संभावनाओं का द्वार खुल गया है। भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बाद एक बार फिर से यह साफ हो गया है कि चार साल बाद भी मोदी लहर कम नहीं हुई है। नरेंद्र मोदी की लहर भाजपा को 2014 में केंद्र की सत्ता सौंपने के बाद भी कायम है। वहीं कांग्रेस के लिए यह बड़े झटके से कम नहीं है। अगर उसने कर्नाटक के परिणाम को गंभीरता से नहीं लिया, तो दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

Karnataka Results: कर्नाटक में 12 मई को मतदान खत्म होने के बाद आए एक्जिट पोल के पूर्वानुमानों पर जनता ने मुहर लगाते हुए किसी एक पार्टी को सत्ता सौंपने से परहेज किया है। राज्य में भाजपा भले ही सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो पर बहुमत को लेकर पेच फंस गया है। भाजपा सरकार बनाने का दावा कर रही है, तो कांग्रेस और जेडीएस अपने विधायकों को टूट से बचाने की जुगत में भिड़ गए हैं। कुल मिलाकर, कर्नाटक की सियासत अगर-मगर के भंवर में उलझ चुकी है। उम्मीद है कि गुरुवार तक तस्वीर स्पष्ट हो जाएगी और भाजपा या दूसरे खेमे से किसी एक की सरकार बनती नजर आएगी। वैसे यह इतना भी आसान नहीं है, क्योंकि दोनों ही पक्षों को अपना बहुमत साबित करना होगा, इसलिए कर्नाटक राज्य की जंग आने वाले दिनों में कई रंग दिखाएगी। इतना तो तय है।

बहरहाल, अगर नतीजों का विश्लेषण करें, तो भाजपा के लिए दक्षिण में संभावनाओं का द्वार खुल गया है। भाजपा के शानदार प्रदर्शन के बाद एक बार फिर से यह साफ हो गया है कि चार साल बाद भी मोदी लहर कम नहीं हुई है। नरेंद्र मोदी की लहर भाजपा को 2014 में केंद्र की सत्ता सौंपने के बाद भी कायम है। देश के 29 राज्यों में से 20 राज्यों पर भाजपा सत्ता पर काबिज है। अगर कर्नाटक में समीकरण सही बैठे, तो 21वां राज्य भी भाजपा के पास आ जाएगा। कर्नाटक चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल बताया जा रहा था और कहा जा रहा है कि भाजपा को यहां मिली कामयाबी ने नरेंद्र मोदी के दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने की राह आसान कर दी है।

भाजपा की इस जीत का मतलब यह है कि देश में मोदी लहर कायम है। बीते कुछ महीनों में विभिन्न राज्यों के उपचुनावों में मिली भाजपा की हार को हथियार बनाकर विपक्षी दल निशाना साध रहे थे कि अब जनता मोदी से नाखुश है, लेकिन ये सारे आरोप निराधार साबित हुए। फिर कांग्रेस का कमजोर होना साल 2019 में भाजपा के खिलाफ क्षेत्रीय दलों के साथ होने वाले गठबंधन को भी कमजोर करेगा। दरअसल, एक मजबूत राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस इस गठबंधन की अगुवाई करती है, लेकिन एक के बाद एक हार से कांग्रेस कमजोर हो रही है। ऐसे में क्षेत्रीय दल कांग्रेस नेतृत्व और उनकी नीतियों पर सवाल उठा सकते हैं। कोई दूसरा दल भाजपा विरोधी गठबंधन की अगुवाई करता है तो पीएम पद के लिए नेताओं की आपसी खींचतान असर खत्म कर देगी।

देखा जाए, तो इस जीत का फायदा भाजपा को इस साल होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिलेगा। इनमें शामिल हैं- मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भाजपा की सरकारें हैं। राजस्थान को लेकर कहा जा रहा था कि वहां भाजपा के खिलाफ माहौल है, लेकिन कर्नाटक में भाजपा की जीत वहां भी असर डालेगी। कर्नाटक में कांग्रेस भले ही जेडीएस को समर्थन देकर भाजपा को सरकार बनाने से रोक रही हो, मगर नतीजे राहुल गांधी के लिए भी बड़ा झटका हैं। उनकी रणनीति एक बार फिर फेल हो गई है। हालांकि, कांग्रेस बड़ी पार्टी न बनने की दशा में सरकार में शामिल होने की नई रणनीति पर काम कर रही है। अगर ऐसा नहीं होता है तो वह मात्र पंजाब, पुडुचेरी और मिजोरम में सिकुड़ कर रह जाएगी। कुल मिलाकर, कर्नाटक के परिणाम आने वाले दिनों में पूरे देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किए रहेंगे। राज्य की राजनीति में अभी कई ट्विस्ट आने बाकी हैं। देखते हैं कि सत्ता का ऊंट किस करवट बैठता है? कर्नाटक के परिणाम के बाद कांग्रेस को आत्मविश्लेषण करना होगा।

गुजरात चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर देते हुए कांग्रेस हार गई तो वहीं उत्तर-पूर्व के रिजल्ट भी निराशाजनक रहे। ऐसे कर्नाटक चुनाव में उतरने से पहले अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए जरूरी था कि वे सभी राज्यों में हार पर मंथन करते और टीम में जरूरी बदलाव करते। मगर कांग्रेस इस चुनाव में बिना किसी रणनीति के उतरी थी और जिन मुद्दों को उसने उठाया, वे सब खुद ही पर भारी पड़ गए। फिर प्रचार सभाओं में राहुल के भाषण और तेवर दोनों ही आक्रामक दिखाई दिए। उन्होंने केंद्र की योजनाओं को जमकर कोसा, लेकिन मतदाताओं को यह नहीं बता पाए कि उनके पास क्या योजना है। कर्नाटक मॉडल के जरिए पूरे देश को विकास दिखाने वाले राहुल यह भी साबित नहीं कर पाए कि अगर वे सत्ता में आए, तो क्या करेंगे। वहीं प्रधानमंत्री मोदी अपनी सभाओं के जरिए अब तक किए गए काम और आने वाले दिनों में किए जाने वाले कामों का खाका पेश करते रहे। यह ऐसी गलतियां हैं, जो कांग्रेस पिछले कई चुनाव से करती आ रही है, लेकिन उसने एक भी हार से सबक नहीं सीखा। यही वजह है कि कर्नाटक चुनाव के दौरान जेडीएस समेत अन्य क्षेत्रीय दलों को भाव न देने वाली कांग्रेस आज समर्थन पत्र लेकर कुमारस्वामी के आगे-पीछे घूम रही है।

विश्लेषकों के मुताबिक, यह पहले से ही कहा जा रहा था कि ब्रांड मोदी के मुकाबले ब्रांड राहुल को खड़ा करने की कांग्रेस की रणनीति के लिहाज से कर्नाटक के नतीजे काफी अहम साबित होने जा रहे हैं। अब जबकि परिणाम कांग्रेस के अनुकूल नहीं आए हैं, तो इससे विपक्ष में फूट की संभावना बढ़ सकती है। तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट भी तेजी होगी और इससे सीधा फायदा भाजपा को पहुंचेगा। सत्ता न मिलने के बाद 2019 के लिए जिन दलों के साथ कांग्रेस की बातचीत चल रही है वहां स्थिति कमजोर होगी। वैसे भी सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, डीएमके और आरजेडी ये सब ऐसे दल हैं जिनकी अपने-अपने राज्यों में जबरदस्त पकड़ है। कर्नाटक हारने से कांग्रेस की बार्गेनिंग कैपेसिटी कम होगी। मोदी मैजिक के दम पर भाजपा ज्यादातर हिंदी भाषी राज्यों की सत्ता पर काबिज है लेकिन गैर हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस की स्थिति अब भी मजबूत है। 2014 के चुनाव में जब कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गई थी तब भी कांग्रेस को 33 सीटें दक्षिण भारत और बाकी गैर हिंदी भाषी राज्यों से ही मिली थीं।

अब सोनिया गांधी ने एक समय जिस तरह से पूरे देश की कांग्रेस को एक किया वैसा ही कुछ प्रयोग राहुल कांग्रेस के लिए करना होगा। कर्नाटक चुनाव में पूरी कांग्रेस एकजुट नहीं दिखाई दी। ऐसे ही गुजरात, नॉर्थ ईस्ट में एक उत्साह की कमी दिखाई दी। मुद्दों को ठीक समय पर उठाना और विपक्ष की आवाज बनाने में कांग्रेस असफल रही। कर्नाटक में कांग्रेस ने जो गलती की है, उससे उसे जल्द से जल्द उबरना होगा और संगठन की दृष्टि से उन सभी खामियों को दुरुस्त करना होगा, जो आने वाले राज्यों और अगले साल लोकसभा चुनाव में मुसीबत का सबब बन सकती हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी से निपटने के लिए कांग्रेस और राहलु गांधी को बेहद परिपक्व रणनीति बनानी होगी। कर्नाटक में मिली हार के बाद कार्यकर्ताओं में उत्साह भरना भी अहम कदम होगा। लोकसभा चुनाव के बाद से ही पूरी कांग्रेस निराश है।
करुणाकर उपाध्याय (राजनीतिक विश्लेषक)

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