पस्त नवाज का मुंबई कबूलनामा

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Mumbai Attacks

राजएक्सप्रेस,भोपाल। नवाज शरीफ की मुंबई हमले (Mumbai Attacks) में पाकिस्तान के शामिल होने की स्वीकारोक्ति से भारत के इस दावे की एक बार फिर पुष्टि हुई है कि मुंबई हमला पाकिस्तान के द्वारा ही प्रायोजित था, वहीं आतंक से गठजोड़ के लिए बदनाम पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मुश्किलें बढ़ने की संभावना है। अब देखना यह है कि पाकिस्तानी सरकार मुंबई हमले को लेकर जारी सुनवाई में सेना के रुख के इतर जाकर पीड़ित लोगों को न्याय दिलाएगा या नहीं।

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो मार्टिन लूथर किंग के इन शब्दों को सामने रखती थीं कि ‘जिस दिन हम अहम मसलों पर चुप रह जाते है, उसी दिन से हमारी जिंदगी खत्म होना शुरू हो जाती है।’ साल 2007 में उनकी हत्या के बाद पाकिस्तान के सियासतदान खामोशी से सेना की सियासत को झेल रहे है और इसे इस देश की नियति भी समझ लिया गया है। लगभग 11 साल बाद एक बार फिर देश के सर्वोच्च नेता नवाज शरीफ ने अहम मसलों पर अपनी चुप्पी तोड़ी है। दरअसल, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाकिस्तान के एक अखबार को दिए साक्षात्कार में मुंबई हमले में पाकिस्तान की भूमिका को स्वीकार कर अपनी उस लाचारी का इजहार किया है, जो उनके देश में लोकतंत्र को कमजोर किए हुए है। उन्होंने लोकतांत्रिक सरकार के सामने समानांतर शक्तियों को बड़ी चुनौती बताया है। जाहिर है सत्ता पर सेना और आईएसआई का गहरा प्रभाव है। पाकिस्तानी सेना देश में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए आतंकियों को प्रश्रय देकर वैधानिक व्यवस्था को प्रभावित करती रही है।

इंटरव्यू में पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने पाकिस्तान में चल रहे 26/11 केस का ट्रायल पूरा न होने पर भी सवाल उठाए। साल 2008 में मुंबई आतंकी हमले में 166 लोग मारे गए थे। इस हमले में पाकिस्तानी सेना, आईएसआई और आतंकियों के शामिल होने के पुख्ता प्रमाण भारत द्वारा देने के बाद भी पाकिस्तान की रावलपिंडी एंटी-टेररिस्ट कोर्ट में यह मुकदमा सबूतों का अभाव बताकर खत्म घोषित कर दिया गया। मुंबई हमले पर सुनवाई को भी पाकिस्तान में बड़े शातिराना ढंग से अंजाम दिया गया। मुंबई हमले के गुनाहगार और मास्टर माइंड को कड़ी सजा दिलाने के लिए भारत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोशिशें की थी। भारत के लगातार दबाव बनाने व पर्याप्त सबूत पाक सरकार को सौंपने के कारण सेना, सत्ता, न्यायपालिका और आईएसआई ने दुनिया को दिखाने के लिए बकायदा इस केस की सुनवाई की। इसके आरोपी आतंकी हाफिज सईद को नजरबंद रखा।

सुनवाई प्रक्रिया के तहत न्यायालय ने गृह मंत्रालय के उन आरोपों को खारिज कर दिया, जिसके अनुसार हाफिज सईद पर जिहाद के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा देने और साल 2008 में मुंबई पर आतंकी हमला करने का आरोप लगाया था। पाक अदालत ने साफ किया कि हाफिज सईद के खिलाफ ऐसे कोई भी साक्ष्य पाकिस्तान सरकार उपलब्ध नहीं करवा पाई है, जिससे यह साबित हो सके कि वह आतंकी है या आतंकी हमलों में शामिल रहा है। यह भी बेहद दिलचस्प है कि 26/11 के आतंकी हमले के पकड़ में आए एक मात्र जिंदा आतंकी अजमल कसाब ने खुद पर हाफिज सईद के प्रभाव को स्वीकार किया था। वहीं अबु जुंदाल ने भी हाफिज सईद का नाम लिया था। डेनमार्क और मुंबई हमले का कुख्यात आतंकवादी डेविड कोलमैन हेडली अब भले ही अमेरिका की जेल में हो, लेकिन उसने पाक की कुख्यात खुफिया एजेंसी आईएसआई और हाफिज सईद के रिश्तों के बारे में जो बताया, उससे अमेरिका भी सकते में आ गया था। हेडली ने बताया था कि सितंबर 2006 में जब वह मुंबई आया तो उसके पास बिल्कुल नया अमेरिकी पासपोर्ट और 25 हजार डॉलर थे जो उसे मुंबई में निशाना बना सकने लायक जगहों का पता लगाने के लिए आईएसआई के मेजर इकबाल ने दिए थे।

हेडली ने स्वीकार किया कि वह कई बार हाफिज सईद से पाक में मिल चुका है और हाफिज चाहता था कि मुंबई पर आतंकी हमला हो। हाफिज के कहने पर ही हेडली ने शिवसेना भवन, मातोश्री और सिद्धि विनायक मंदिर की रेकी की थी। हालांकि, भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की सजगता से इन इलाकों पर आतंकी हमला नहीं किया जा सका। भारत के लगातार दबाव बनाने और पर्याप्त सबूत पाक सरकार को सौंपने के बाद भी हाफिज का अदालत से बेदाग निकल जाना यह साफ करता है कि इस आतंकी का पाक की सत्ता, न्यायपालिका, सेना, मुल्लाओं और आईएसआई पर गहरा प्रभाव है।

दुनिया के सबसे कुख्यात आतंकियों में शुमार जमात उद दावा का मुखिया कश्मीर और दुनिया के अन्य हिस्सों में मुसलमानों पर अत्याचार की कपोल कल्पित कथाओं से जुनूनी युवाओं को उद्वेलित कर भारत के कश्मीर और अन्य देशों में भेजने का काम करता है। वह भारत से अंतरराष्ट्रीय रेड कार्नर नोटिस प्राप्त सर्वाधिक वांछित आतंकी है, जिसे मुंबई हमले का मुख्य साजिशकर्ता माना जाता है। अमेरिका ने दस लाख डॉलर का इनाम उसे पकड़ने पर घोषित कर रखा है और संयुक्त राष्ट्र ने भी प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन हाफिज पाकिस्तान में बे-रोक टोक घूमता है और बैखौफ सार्वजनिक सभाएं भी करता है। हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने आतंकी समूहों और पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिकों के संबंधों पर चिंता जताई है। अमेरिकी सीनेट सदस्यों के सामने सीआईए की एक शीर्ष अधिकारी जीना हास्पेल ने कहा कि ओसामा बिन लादेन के संपर्क में परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अधिकारी थे और यह खतरा अब भी बना हुआ है। इसके साथ ही पाकिस्तान में आतंकी संगठनों को सेना और आईएसआई का समर्थन दुनिया भर के लिए चुनौती बना हुआ है।

अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान की दोहरी भूमिका की अमेरिका लगातार आलोचना करता रहा है। अल कायदा, तालिबान, हक्कानी नेटवर्क से संबंध हो या इस सदी में दुनियाभर में हुए भीषण आतंकी हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़ने के पुख्ता सबूत हों या पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की सुरक्षा, दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसके साथ ही ऐसे पुख्ता प्रमाण सामने आ रहे हैं, जिसके अंतर्गत पाकिस्तान के परमाणु जखीरे का विस्तार हो रहा है और यह गैर सामरिक परमाणु हथियारों की ओर रुख कर रहा है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने लंबे समय तक पाकिस्तान की कुख्यात एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर काम किया है, जाहिर है अमेरिका पाकिस्तान के आतंकियों से गठजोड़ को लेकर आशंकित है। 2011 में भी अमेरिका ने गोपनीय दस्तावेजों में ग्वांतनामो-बे के कोई 700 कैदियों के बैकग्राउंड का हवाले देते हुए कई संदर्भो का जिक्र किया था और साफ किया था कि आईएसआई अफगानिस्तान में अमेरिकी गठबंधन सेनाओं से लड़ रहे विद्रोहियों, यहां तक कि अल कायदा को समर्थन देती है। उनकी गतिविधियों का समन्वय करती है और उन्हें संरक्षण प्रदान करती है। यही नहीं इन दस्तावेजों में आईएसआई को आतंकी संगठन करार देते हुए माना है कि यह भी अल कायदा और तालिबान के समान ही एक चुनौती है।

बेनजीर भुट्टो ने अपनी आत्मकथा में कहा था कि सैन्य ताकतें पाक की सरजमी पर लोकतंत्र को स्थापित होते देखना ही नहीं चाहती है। नवाज शरीफ ने भी मुंबई हमले में शामिल होने की स्वीकारोक्ति के बहाने अपने देश की उस व्यवस्था पर बेबसी जाहिर की है, जो सेना की सर्वोच्चता से शुरू होकर लोकतंत्र पर प्रहार करती है।
डॉ. ब्रहमदीप अलूने (विदेश मामलों के जानकार)

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