आज हम बात करते है, कुछ नए और पुराने बड़े घोटालो की

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आज हम बात करते है, कुछ नए और पुराने बड़े घोटालो (Scandals) से जुड़े लोगों कीवैसे तो भारत में बहुत से बैंकिंग घोटाले (Banking Scam India) हुए हैं। जिनके खुलासे एक एक कर हुए । आइये इनमे से उन घोटालो पर पर बात करते है। जिनका फैसला हो गया है या जिनकी कोर्ट में सुनवाई होना अभी बाकि है या यूँ कहे कि जिनका अभी कोई उचित फैसला नहीं हुआ है। आज हम कुछ ऐसे घोटालों की बात करने जा रहे है जिनका जिक्र आपने कही न कही सुना ही होगा। यह ऐसे लोग है जो करोड़ो रुपये का घोटाला करके बैठे है। आइये इनके बारे में विस्तार से जाने, कौन है यह लोग, साथ ही यह भी जानेंगे कि, कैसे इन्होने इतनी बड़ी रकम का घोटाला किया।

  • चारा घोटाला -1992
  • हर्षद मेहता घोटाला – 1992
  • रोटोमैक घोटाला – 2018  

आज हम बात करते है, कुछ नए और पुराने बड़े घोटालो (Scandals) से जुड़े लोगों की

  • चारा घोटाला -1992

चारा घोटाला भारत के बड़े घोटालो में से एक घोटाला है, जो बिहार से जुड़ा हुआ है। बिहार में इस घोटाले में लालू प्रसाद यादव जैसे बड़े नेताओं का नाम जुड़ा है। चारे घोटाले में पशुओं के चारे और दवाओं के नाम पर लगभग 950 करोड़ रुपये का घोटाला किया गया था। यह घोटाला सरकारी खजाने में से गलत तरीके से पैसा निकालने का है। इसमें जितना बजट था, उससे कही गुना ज्यादा निकासी हो रही थी।

क्या था मामला:

1985 में महालेखाकार टी.एन. चतुर्वेदी ने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्र शेखर सिंह को ट्रेज़री और पशु पालन विभाग की ओर से हिसाब में हो रही देरी के चलते गड़बड़ी की आशंका जताई। इसके बाद 1992 में निगरानी विभाग के एक इंस्पेक्टर बिंदु भूषण दिवेदी ने एक रिपोर्ट निगरानी विभाग के एक डायरेक्टर को सौंपी। इस रिपोर्ट के संकेत चारा घोटाला की तरफ जा रहे थे। इतना ही नहीं इसकी जड़े मुख्यमंत्री तक जा रही थी। इस रिपोर्ट के बाद उस डायरेक्टर का तबादला कर उसे सस्पेंड कर दिया गया।

कई घोटालें आये सामने:

1994 में बिहार पुलिस ने गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा से कही कोषागारों से फर्जी बिलों के द्वारा करोड़ो रूपये की अवैध निकासी के मामले दर्ज किये। उसी रात कोषागार और पशुपालन विभाग के कई सौ कर्मचारी के साथ ठेकेदार और सप्लायर को भी गिरफ्तार किया गया। 27 जनवरी1996 में पश्चिमी सिंगभुंग के उपायुक्त अमित खरे ने जयबासा पशुपालन विभाग पर छापा मारा। वहां से जो कागजात मिले, उसमे साफ़ संकेत हुए की वहाँ अधिकारियों, सप्लायरों, बिजनेसमैनों और राजनेताओं की मिलीभगत से लूट चल रही है। इसके बाद जांच के लिए लालूप्रसाद यादव ने विधान सभा की एक समिति गठित की। जिसके कुछ सदस्य खुद शक के घेरे में थे। उसके बाद एक PIL दर्ज की गई फिर पटना सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पटना हाईकोर्ट ने मार्च 1996 में इस मामले को CBI के हवाले कर दिया।

CBI ने हाईकोर्ट को बताया:

जांच के कुछ दिन में ही CBI ने हाईकोर्ट को बताया कि कुछ राजनेता और अधिकारी उन कागजातों तक पहुंचने ही नहीं दे रहे है, जिनके द्वारा कुछ खुलासा हो सके। उस समय कुछ लोगो ने तो यह तक कह दिया था कि CBI ने कोर्ट को गलत जानकारी दी है। इसके बाद 10 मई 1997 में सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ केस चलाने की अनुमति मांगी। जिस दिन यह निवेदन सौंपा गया। दूसरी तरफ उसी दिन इसी मामले से जुड़े एक बिजनेसमैन हरीश खंडेलवाल का शव रेलवे ट्रेक पर पड़ा मिला। जिसमे एक नोट पाया गया। जिस पर लिखा था कि, CBI ने उसे गवाह बनाने की कोशिश की। इससे CBI पर कोई असर नहीं पड़ा। रायपाल ने CBI से लालू के खिलाफ पुख्ता सबूत की मांग की।

केस चलाने की अनुमति:

17 जून 1997 में राज्यपाल ने लालू प्रसाद यादव और अन्य बड़े लोगो पर केस चलाने की अनुमति दे दी। इसी दिन CBI ने IAS अधिकारी, साइंस टेक्नोलॉजी सचिव महेश प्रसाद, श्रम सचिव के. अरुमृगम, पशुपालन विभाग के सचिव जुलिअस और पूर्व वित् सचिव राम राज राम के साथ ही पूर्व डायरेक्टर को गिरफ्तार कर लिया। CBI अब लालू को गिरफ्तार करने की तैयारी में थी। इसके बाद 21 जून को कुछ सबूत और कागजातों को मिटाने की आशंका के चलते लालू और उसने कुछ रिश्तेदारों के घरों पर छापा मारा। इससे लालू के साथ 55 लोगों के नाम सामने आये। जिनमे बिहार के पूर्व CM जगन्नाथ मिश्रा, पूर्व केंद्रीय मंत्री चंदरसेप प्रसाद वर्मा, लालू के मंत्री भोला राम तूफानी, विद्यासागर निषाद, RJD के 3 विधायक आर. के. राणा, कांग्रेस के जगदीश शर्मा, BJP के ध्रुव भगत भी शामिल है।

लालू प्रसाद यादव की जमानत ख़ारिज:

इस मामले में 29 जुलाई 1997 में लालू प्रसाद यादव की जमानत की अर्जी को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ख़ारिज कर दिया गया। इसके बाद 30 जुलाई 1997 को लालू प्रसाद यादव को गिरफ्तार कर लिया गया।

क्या हुआ असर:

इस चारे घोटाले के चलते मुख्यमन्त्री लालू प्रसाद यादव को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। अपना इस्तीफा देकर उन्होंने अपने स्थान पर अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को कुर्सी पर बिठा दिया। भारतीय जनता पार्टी द्वारा इस घोटाले पर जम कर जांच पड़ताल की मांग की गई और जांच भी हुई। इस जांच के खुलासे से सत्तारुढ़ पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस व उसकी सहयोगी जनता दल जैसी 2 बड़ी पार्टियों के नाम सामने आये।आज हम बात करते है, कुछ नए और पुराने बड़े घोटालो (Scandals) से जुड़े लोगों की

  • हर्षद मेहता घोटाला – 1992

हर्षद मेहता एक ब्रोकर था वह बैंकों के बीच दलाल (Mediator) का काम करता था। उसका काम ऐसे बैंक, जो गवर्नमेंट सिक्योरिटीज बेचना चाहते है, उनके लिए बायर्स ढूँढना और जिनको गवर्नमेंट सिक्योरिटीज खरीदना है उनके लिए सेलर्स ढूँढना था। RF (रेडी फॉरवर्ड) डील में कुछ लूपहोल्स थे, जिनके द्वारा अवैध तरीको से पैसा कमाया जा सकता था। इसकी जानकारी हर्षद मेहता को बहुत ही अच्छी तरह से थी। इसी लूपहोल्स का फायदा हर्षद मेहता ने उठाया और घोटाला किया।

RBI के नियम:

  • इस घोटाले के बारे में जानने से पहले ही हम आपको RBI के कुछ नियम बताते है। RBI के नियम के अनुसार कोई भी बैंक सीधे ब्रोकर के नाम पर चेक ईशु नहीं कर सकता। उसे कोई गवर्नमेंट सिक्योरिटीज बेचने के लिए वो चेक सीधे सिक्योरिटीज खरीदने वाले बैंक के नाम पर ईशु करना होता है।
  • जब भी कोई एक बैंक, दूसरे बैंक को गवर्नमेंट सिक्योरिटीज बेचता है तब वह उसे कोई गवर्नमेंट सिक्योरिटीज नहीं देता है, वह उसे एक बैंक रिसिप्ट देता है। जो यह बताता है कि गवर्नमेंट सिक्योरिटीज बेचीं और खरीदी गई है। साथ ही बेचने के पैसे मिल गए है।

हर्षद मेहता ने कैसे उठाया फायदा:

हर्षद मेहता बैंकों के लिए काम करता था। जब कोई बैंक गवर्नमेंट सिक्योरिटीज बेचना चाहता । तब हर्षद मेहता उसके लिए बायर्स ढूंढ़ने का काम करता था। हर्षद मेहता एक बैंक से सिक्योरिटीज लेकर बायर्स ढूंढ़ने के लिए कुछ समय मांग लेता था, और दूसरे बैंक, जिसे सिक्योरिटीज खरीदना होता था उनके पास जाकर सिक्योरिटीज के पैसे लेता था और उस बैंक से भी कुछ समय मांग लेता था। वह बैंक के पैसे और सिक्योरिटीज को कुछ समय के लिए अपने पास रख लेता था। हर्षद मेहता बैंक से चेक अपने नाम पर ईशु करवाता था। बैंक आसानी से हर्षद मेहता मेहता के नाम चेक ईशु भी कर देता था, इसका कारण उसका मार्केट में चलने वाला नाम था।

क्या इस्तेमाल करता था पैसो का :

हर्षद मेहता ने उन पैसो का इस्तेमाल स्टॉक मार्केट में शेयर्स के प्राइस बढ़ाने के लिए ( स्टॉक मार्केट मैनिपुलेट) किया। जब पहला बैंक बेचीं हुई सिक्योरिटी का पैसा मांगता था । तब वह कोई तीसरा बैंक ढूंढ लेता था। हर्षद उस तीसरे बैंक के साथ भी यही करता था। उससे भी पैसे मांग कर समय मांग लेता था, और उस पैसे को जाकर पहले बैंक को दे देता था। फिर दूसरे और तीसरे बैंक की डील्स पूरी करने के लिए वह अन्य बैंको के साथ इसी तरह की डील्स करता वह पैसा मांग कर समय मांग लेता । हर्षद इस काम को एक चेन सिस्टम की तरह करता था और वह हमेशा पैसे को स्टॉक मार्केट में शेयर मैनिपुलेट करने में लगाता था। जिससे उसके पास हमेशा एक मोटी रकम रहती थी।

कैसे किया घोटाला:

हर्षद मेहता को जब शेयर्स के प्राइस और ज्यादा बढ़ाने के लिए और अधिक पैसो की जरूरत पड़ी, तब हर्षद ने अपने काम में गड़बड़ी करना शुरू कर दिया। उसने गवर्नमेंट सिक्योरिटीज बेचने और खरीदने के लिए जो बैंक रिसीप्ट बैंक द्वारा दी जाती है। वह बैंकों की मदद से फर्जी बनवा कर उनका गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। जिन बैंको को सिक्योरिटीज खरीदना रहता था, हर्षद उन्हें वो फर्जी बैंक रिसीप्ट देता था। बदले में बैंक पैसा देता था। हर्षद उन सभी पैसे को स्टॉक मार्केट में लगाता गया। जिससे उसने ACC का स्टॉक कुछ ही समय में 200 रुपए से 9000 तक पंहुचा दिया। हर्षद अपने शेयर्स बेच कर अच्छा पैसा कमाता था। बैंको को पैसे देकर अपनी रिसीप्ट वापस ले लेता था। यह सिलसिला तब तक ही चल सका जब तक शेयर्स के प्राइस बढ़ते रहे। जैसे ही प्राइस गिरे हर्षद को काफी नुकसान हुआ।

कब हुआ खुलासा:

हर्षद मेहता के घोटाले का पता तब चला जब, 23 अप्रैल 1992 में सुचेता दलाल ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के आर्टिकल में हर्षद मेहता के कारनामों का पर्दाफाश कर दिया। जब यह घोटाला सामने आया तब ही बैंको को पता चला की सारी रिसीप्ट झूठी है। इस तरह बैंको को कुल 2 से 4 करोड़ का नुकसान हुआ। इतना ही नहीं विजया बैंक के चैयरमेन जिन्होंने हर्षद मेहता के नाम चेक ईशु किये थे, उन्होंने भी आत्महत्या कर ली। CBI ने 9 नवंबर 1992 को हर्षद मेहता को गिरफ्तार किया। इसके अलावा SEBI ने उसे स्टॉक मार्केट में इन्वेस्ट करने से बेन कर दिया। एक दिन हर्षद को जेल में छाती में दर्द उठा और उसे अस्पताल ले जाया गया। 31 दिसम्बर 2001 को रात 12:30 बजे हर्षद मेहता की मृत्यु हो गई। जब उसकी मृत्यु हुई तब भी उसके खिलाफ 27 केस चल रहे थे।आज हम बात करते है, कुछ नए और पुराने बड़े घोटालो (Scandals) से जुड़े लोगों की

रोटोमैक घोटाला – 2018

हाल फिलहाल हुए घोटालो में एक नाम रोटोमैक ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड पेन कंपनी के घोटाले का भी है। इस घोटाले में रोटोमैक पेन कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी का नाम सामने आया है, इसके अलावा यह बात सामने आई है कि रोटोमैक पेन कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी ने 2,919 करोड़ रुपये का लोन लिया था, जिसे ब्याज समेत 3695 करोड़ रूपये चुकाना था, लेकिन जिसे उन्होंने अभी तक चुकता नहीं किया। इस मामले में विक्रम कोठारी के अलावा उनकी पत्नी साधना कोठारी और उनके बेटे राहुल कोठारी पर भी मामला दर्ज किया गया है।

कैसे हुआ खुलासा:

रोटोमैक पेन कंपनी के घोटाले की खबर तब सामने आई, जब बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने CBI से शिकायत की। उसके बाद हुई जांच-पड़ताल में सामने आया पूरा मामला। इस मामले में कोठरी के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। साथ ही CBI के कहने पर ही ED ने भी विक्रम कोठारी के खिलाफ FIR दर्ज की है। इस मामले में CBI को 17 फाइलें मिली है। इस मामले में बैंक ने चुकाने वाली राशि से जुड़ी पूरी जानकारी दी है। विक्रम कोठारी पर बैंक ऑफ़ बड़ौदा (456.53 करोड़ रुपये), बैंक ऑफ़ इंडिया (754.77 करोड़ रुपये), बैंक ऑफ़ महाराष्ट्र (49.82 करोड़ रुपये), इलाहबाद बैंक (330.68 करोड़ रुपये), ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कामर्स (97.47 करोड़ रुपये), इंडियन ओवरसीज बैंक (771.07 करोड़ रुपये) तथा यूनियन बैंक ऑफ़ इंडिया (458.95 करोड़ रुपये) जैसे बैंको से लोन लेकर न चुकाने के मामले दर्ज किये गए है।

यूनियन बैंक का मामला:

अगर हम इस घोटाले में सिर्फ यूनियन बैंक की बात करे तो, जब विक्रम कोठारी यूनियन बैंक को 484 करोड़ रूपये का पेमेंट नहीं दे पाए, तब यूनियन बैंक ने उनकी उत्तराखंड और देहरादून की प्रॉपर्टी को सीज कर दिया। तब उनका 1 करोड़ 9 लाख रूपये पेंडेंसी में ही जा रहा था। उसके लिए बैंक ने उन्हें नोटिस भी भेजा था।

विक्रम कोठारी का स्टेटमेंट:

विक्रम कोठारी से पूछताछ करने पर उन्होंने अपने स्टेटमेंट में कहा कि ” मेने बैंक से लोन जरूर लिया है। यह गलत है कि, मैंने उसे चुकता नहीं किया है। मेरा बैंक के अंदर एक NCLT (National Company Law Tribunal) के अंदर केस भी चल रहा है। उसमे जो भी विवाद है उस पर निष्कर्ष निकलेगा। ऐसा कुछ भी नहीं है जो लोगों द्वारा कहा जा रहा है। मैं कानपूर का निवासी हूँ और कानपूर में रहता हूँ और कानपूर में ही रहूँगा।” इसके अलावा उन्होंने यह कहा की मेरे ऊपर लगाए इल्जाम बेबुनियाद है।

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