योगी सरकार की गोवंश नीति

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Cow Welfare Cess

राज एक्सप्रेस, भोपाल। उत्तरप्रदेश सरकार ने पूरे राज्य में गोशालाएं बनाने के लिए गो कल्याण उपकर (सेस) (Cow Welfare Cess) लगाने का फैसला किया है। इसके तहत 0.5 प्रतिशत सेस शराब के अलावा उन सभी वस्तुओं पर लगेगा जो उत्पाद कर के दायरे में आती हैं। गायों को बचाने का यह तरीका अब तक किसी राज्य ने नहीं अपनाया है, लेकिन इस अकेले फैसले से गोवंश का कल्याण भी संभव नहीं है। गोवंश की सुरक्षा के उपाय हम विदेशों से भी सीख सकते हैं।

उत्तरप्रदेश में नए साल की पहली कैबिनेट बैठक में कई महत्वपूर्ण फैसलों को मंजूरी दी गई। इनमें एक महत्वपूर्ण फैसला गोवंश संरक्षण से भी संबंधित है। कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी राज्य द्वारा अब तक गोवंश संरक्षण हेतु इतने बड़े पैमाने पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। इस निर्णय के तहत उत्तर प्रदेश के समस्त निकायों, गांवों, क्षेत्र, जिला पंचायत, नगरपालिका, नगर पंचायत व नगर निगमों में अस्थायी गोशालाएं खोली जाएंगी। योगी सरकार ने यह कदम लगभग पूरे प्रदेश से आवारा पशुओं के संबंध में आने वाली परेशानियों के मद्देनजर उठाया है। फैसला धरातल पर कितना कारगर साबित होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा परंतु इतना तो जरूर है कि इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि योगी सरकार गोहत्या के सख्त खिलाफ है तथा आवारा पशुओं के सड़कों और खेतों में खुलेआम घूमने से होने वाले नुकसान के प्रति चिंतित भी है।

इस संबंध में लिए गए निर्णय के अनुसार प्रदेश के अब आवारा पशुओं का नियमन किया जाएगा एवं ग्राम पंचायत स्तर पर सरकारी जमीन उपलब्ध कराई जाएगी तथा इनमें गोसंरक्षण सदन बनाए जाने का भी प्रस्ताव है। इस योजना में मनरेगा के माध्यम से ग्राम पंचायत स्तर पर निर्माण कराया जाएगा। यह निर्माण विधायक एवं सांसद निधि कोष से होगा। प्रत्येक स्थानीय निकाय को सरकार द्वारा इस कार्य के लिए सौ करोड़ रुपए दिए गए है। प्रत्येक जिले में कम से कम एक हजार आवारा पशुओं के लिए इस प्रकार के आश्रय स्थलों का निर्माण कराया जाएगा। परंतु इसी तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि गोवंश संरक्षण हेतु किए जाने वाले इन उपायों पर आने वाले खर्च को पूरा करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने गोकल्याण उपकर लगाने का भी निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत् 0.5 प्रतिशत गो कल्याण उपकर उत्पाद कर के दायरे में आने वाली सभी वस्तुओं पर लगेगा। शराब पर यह टैक्स नहीं लगाया जाएगा। टोल टैक्स, मंडी परिषद् के साथ विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा भी इस टैक्स का भुगतान किया जाएगा।

गोया कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि योगी सरकार आम जनता से ही इन निराश्रित पशुओं के संरक्षण पर आने वाले खर्च की भरपाई करेगी। इतना ही नहीं बल्कि सांसद तथा विधायक निधि कोष का जो पैसा जनकल्याण में खर्च होना चाहिए था वह भी गोवंश संरक्षण पर खर्च किया जाएगा। इन उपायों से कम से कम एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि सरकार द्वारा जनकल्याण तथा क्षेत्रीय विकास से कहीं अधिक गोवंश संरक्षण की जरूरत महसूस की जा रही है। इस योजना पर कुल मिलाकर हजारों करोड़ रुपए सिर्फ प्रदेश सरकार को ही खर्च करने पड़ेंगे। इस संबंध में एक बात और भी विचारणीय है कि देश में पहले से बनी हजारों की संख्या में बड़ी व छोटी गोशालाएं जिन्हें सरकार गोसंरक्षण के लिए धन भी देती है, क्या वे अपनी गोशालाओं की सभी गायों का समान रूप से पालन-पोषण कर रही हैं? क्या बीमार पशुओं का समुचित इलाज हो पाता है? क्या गोवंश के नाम पर एकत्र किए जाने वाला सरकारी और गैर सरकारी सहायता कोष अथवा दान इन बेजुबान पशुओं पर पूरी ईमानदार से खर्च किया जाता है? क्या वजह है कि देश की सैकड़ों गौशालाओं से संबंधित अनेक नकारात्मक समाचार प्राप्त होते रहे हैं। चोरी-छिपे बीमार व कमजोर गायों पर गोशाला संचालकों द्वारा ध्यान न दिए जाने तथा इस कारण मरने वाली गायों को गोशालाओं से दूर फेंके जाने की भी अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं।

आमतौर पर तो यही देखा जाता है कि गो संरक्षण गृहों में दान-पुण्य पर पलने वाले गोवंश को वहां रहने का उतना लाभ नहीं मिलता है जितना कि गोशाला संचालकों को प्राप्त होता है। उधर, जब से गोरक्षा के नाम पर गाय का व्यापार करने वाले कई लोगों के साथ हिंसक वारदातों का सिलसिला शुरू हुआ तब से भयवश गायों का इधर से उधर आना-जाना तथा व्यापार आदि ठप हो गया है। बड़े पैमाने पर मांस निर्यात करने वाले बूचड़खानों में होने वाली पशुओं की आपूर्ति को छोड़कर एक-दो पशु ले जाने वालों पर ज्यादा निगाह रखी जाती है। वजह बिल्कुल साफ है कि मांस निर्यातकों की सत्ता के गलियारों में घुसपैठ है। दूसरी ओर यही पशु चाहे किसानों की फसल बरबाद करें, सड़कों पर दुर्घटनाओं का कारण बनें, गलियों व रास्तों में लोगों को सींग मारते फिरें या रास्ते में बैठकर आवागमन को बाधित करें परंतु जनता की सुनने वाला कोई भी नहीं है।

पहले ही किसान नील गाय और बंदरों के आतंक से अपनी फसल से पूरी पैदावार हासिल नहीं कर पा रहा। कई राज्यों में विशेषकर नदियों के किनारे के क्षेत्रों में नील गायों के झुंडों का आतंक इतना फैल गया है कि हजारों किसान खेती-बाड़ी का काम ही छोड़ चुके हैं। हिमाचल प्रदेश में भी बंदरों के चलते तमाम किसानों ने खेती व बागवानी के काम छोड़ दिए हैं। परंतु आज तक देश की किसी भी सरकार ने किसानों को इन निराश्रित पशुओं से बचाने के विषय में कभी नहीं सोचा। न ही इस संबंध में कोई योजना बनाई गई। लेकिन अब इन समस्याओं पर भी ध्यान देना होगा। ऐसा न हो कि गायों को बचाने के चक्कर में हम दूसरी समस्याओं को भूल जाएं। किसानों और आम लोगों की परेशानी को देखते हुए इन गाय-बछड़ों को किसी निश्चित जगह सुरक्षित रखने की राज्य सरकार की मंशा तो ठीक है, मगर यह काम उतना आसान नहीं है, जितना लगता है। भटकने वाले मवेशियों में काफी बड़ी संख्या सांड़ों की है, जो स्वभावत: किसी दायरे में बंधकर रहने वाले जीव नहीं हैं। उन्हें पकड़ने और बंद करने में अभी जितनी चुस्ती दिखाई जा रही है, वह न सिर्फ सरकारी कर्मचारियों और दूसरे पशुओं के लिए, बल्कि खुद सांड़ों के लिए भी जानलेवा हो सकती है।

दरअसल, गोवंश का विषय अब लगभग पूरी तरह से आम लोगों की भावनाओं से जोड़ दिया गया है, जबकि इस विषय पर गहन शोध भी नहीं किया गया। आज देश में हल, बैल और बैल गाड़ियों की जरूरत लगभग खत्म सी हो गई है। इन्हीं जरूरतों को पूरा करने में बैलों का प्रयोग हुआ करता था। परंतु बछड़े की पैदावार तो प्राकृतिक रूप से उसी अनुपात में होती आ रही है जैसी पहले हुआ करती थी। ऐसे में जब एक गोपालक अपनी कम दूध देने वाली गाय को चारा खिलाने से कतराता है और उसे बेचकर दूसरी अधिक दूध देने वाली गाय लाना उचित समझता है फिर आखिर उस गोपालक से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह एक ऐसे बछड़े की परवरिश करे जिससे भविष्य में न तो कोई लाभ है न ही उसका कोई उपयोग? ऐसे में उस गोपालक के समक्ष इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं कि वह उस बछड़े को अपने घर से बाहर धकेल दे और वह बछड़ा अनाश्रित होकर सड़कों पर आवारा फिरता रहे और राहगीरों या किसानों के लिए समस्या का कारण बने।

गौ संरक्षण निश्चित रूप से होना चाहिए परंतु इसके लिए दूरगामी व दीर्घकालीन नीति भी बनाई जानी चाहिए। गोवंश संरक्षण को केवल भावनात्मक या चुनावी अथवा इसकी आड़ में धन कमाने का जरिया कतई नहीं बनाना चाहिए। याद रखना जरूरी है कि पशुओं को रखे जाने की एक सीमा है। गोवंश की संख्या नियंत्रित किए बगैर उन्हें बाड़ों में रखने की योजना ज्यादा सफल नहीं हो सकती। लिहाजा बेहतर यही होगा कि पशु चिकित्सकों और कृषि विज्ञानियों के पैनल से इस बारे में दीर्घकालिक योजना बनाने व इस पर अमल के ठोस, व्यावहारिक सुझाव देने को कहा जाए।
निर्मल रानी (स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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