नक्सलियों का आतंकी चेहरा

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Naxal Problem

राजएक्सप्रेस,भोपाल। सुरक्षा बलों के लगातार ऑपरेशन और सरकार की सख्ती के बाद भी नक्सली (Naxal Problem) चुनौती बने हुए हैं। अक्सर नक्सली समर्थक कुछ बुद्धिजीवियों द्वारा दलील गढ़ी जाती है कि नक्सलियों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई को रोककर नक्सल समस्या का अंत किया जा सकता है, लेकिन उनके पास इसका जवाब नहीं है कि जब सरकार नक्सलियों को बातचीत के लिए आमंत्रित करती है तो वे हिंसा का रास्ता अख्तियार क्यों करते हैं?

छत्तीसगढ़ में पहले चरण के मतदान से ठीक पहले नक्सलियों ने एक साथ छह धमाके किए, जिसमें एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई। इस ताजा घटना और नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में नक्सलियों द्वारा सुरक्षा बलों और उनके साथ चल रही दूरदर्शन की टीम पर हमला रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि नक्सलियों से निपटने की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। नक्सलियों ने इस हमले में पुलिस के दो जवान समेत दूरदर्शन के समाचार चैनल डीडी न्यूज के कैमरामैन की जान ले ली। इसके ठीक तीन दिन पहले नक्सलियों ने बीजापुर जिले में आईडी विस्फोट कर सीआरपीएफ के चार जवानों की जान ली थी। गत माह पहले भी नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में बारूदी सुरंग बिछाकर सात जवानों की जान ली थी। इन घटनाओं से साफ है कि अभी नक्सलियों की कमर पूरी तरह टूटी नहीं है। हालांकि राहत की बात यह है कि विगत वर्षो में सुरक्षा बलों के तीव्र प्रहार से नक्सली हिंसा में कमी आई है।

दस राज्यों के 106 जिलों में सक्रिय नक्सलियों ने खुद स्वीकारा है कि विगत दो वर्षो में सुरक्षा बलों के आक्रमण में उन्होंने दो सैकड़ा से अधिक साथियों को खोया है। उन्होंने यह भी माना है कि नक्सली प्रभावित क्षेत्रों में चलाए जा रहे अभियान ‘प्रहार’ और ‘समाधान’ (2017-2022) से उनके मिशन को गहरा झटका लगा है। याद होगा अभी पिछले साल पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के स्थापना दिवस से पहले नक्सलियों के केंद्रीय सैन्य आयोग की तरफ से कहा गया था कि उन्हें सबसे अधिक नुकसान दंडकारण्य यानी छत्तीसगढ़ में उठाना पड़ रहा है। गौरतलब है कि विगत डेढ़ वर्ष के दरम्यान सुरक्षा बलों ने राज्य में 100 से अधिक हार्डकोर नक्सलियों को मार गिराया है। इसके अलावा केंद्र और छत्तीसगढ़ की सरकार द्वारा नक्सलियों के सफाए के लिए संयुक्त रूप से ऑपरेशन ‘प्रहार’ भी चलाया जा रहा है जिससे नक्सली भन्नाए हुए हैं।

सुरक्षा बलों की सख्ती का ही नतीजा है कि पिछले तीन-चार सालों में देश भर में हजारों की संख्या में नक्सलियों ने हथियार डाला है। अकेले छत्तीसगढ़ में 13 सौ से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। सुरक्षा बलों द्वारा नक्सलियों से बड़ी संख्या में हथियार और कारतूस भी जब्त किए गए हैं। संभवत: इसी सख्ती का नतीजा है कि नक्सली बौखलाए हुए हैं और वे बार-बार हिंसक घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। उनके नृशंसतापूर्ण कृत्यों से साफ है कि वे सही रास्ते पर आने को तैयार नहीं है। चूंकि वे पहले कह चुके हैं कि उनका संविधान व शासन में विश्वास नहीं है लिहाजा सरकार को भी समझना चाहिए कि नक्सलियों को शांति का पाठ पढ़ाकर नहीं बल्कि ताकत से ही कुचला जा सकता है। ऐसे में आवश्यक हो जाता है नक्सलियों से कड़ाई से निपटा जाए। इसलिए और भी कि विगत वर्षो में नक्सली हिंसा की 6000 से अधिक घटनाएं हुई हैं जिसमें 1300 नागरिक और 500 से अधिक सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। नक्सली सिर्फ हिंसक घटनाओं को ही अंजाम नहीं दे रहे हैं बल्कि अपहरण, फिरौती और राष्ट्र विरोधी कृत्यों में भी लिप्त हैं। वे फिरौती और अपहरण के पैसे से घातक हथियार खरीद रहे हैं। वे झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे प्राकृतिक संसाधनों वाले राज्यों में काम करने वाली कंपनियों से रंगदारी वसूल रहे हैं। वे इन क्षेत्रों में चलने वाली सरकार की कल्याणकारी योजनाओं में बाधा डाल स्थानीय लोगों को गुमराह कर रहे हैं।

दरअसल वे यह नहीं चाहते हैं कि स्थानीय युवाओं का रोजगारपरक सरकारी कार्यक्रमों पर भरोसा बढ़े। उन्हें डर है कि अगर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सरकारी योजनाएं फलीभूत हुईं तो फिर आदिवासी नौजवानों को अपने संगठन से जोड़ना मुश्किल होगा। किसी से छिपा नहीं है कि नक्सली जमात अपने संगठन से जुड़ने के लिए आदिवासी युवकों और युवतियों को सरकारी नौकरी की तरह नाना प्रकार की सुविधाएं मुहैया कराने का लालच परोस रहे है। नक्सलियों के खतरनाक मंसूबे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब वे कम्प्यूटर शिक्षा प्राप्त ऐसे नवयुवकों की तलाश कर रहे हैं, जो आतंकियों की तरह हाईटेक होकर उनके विध्वंसक कारनामों को अंजाम दे। यह भी देखा जा रहा है कि नक्सली जमात अब अपनी परंपरागत लड़ाई को छोड़ आतंकी संगठनों की राह पकड़ रहे हैं। अगर केंद्र सरकार उनकी खतरनाक विध्वंसक प्रवृत्तियों पर अंकुश नहीं लगाती है तो उनके कम्प्यूटराइज्ड और शिक्षित गिरोहबंद लोग जंगल से निकलकर शहर की ओर रुख करेंगे और ऐसी स्थिति में उनसे निपटना कठिन होगा। जो सबसे अधिक खतरनाक बात है वह यह कि अब नक्सलियों का संबंध आतंकी संगठनों से भी जुड़ने लगा है।

गत वर्ष पहले पूवरेत्तर के आतंकियों से उनके रिश्ते-नाते उजागर हुए थे। पूवरेत्तर के आतंकी संगठन पीएलए द्वारा नक्सलियों के प्रशिक्षण की बात भी सामने आई थी। गौरतलब है कि पीएलए पूवरेत्तर का एक हथियार बंद आतंकी संगठन है जिसका उद्देश्य संघर्ष के माध्यम से मणिपुर को स्वतंत्र कराना है। यह संगठन अरसे से नक्सलियों पर डोरे डाल रहा है। दरअसल उसका मकसद मणिपुर की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है बल्कि वे नक्सलियों से हाथ मिलाकर क्षेत्र में अराजकता कायम करना चाहते हैं। दूसरा महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि नक्सलियों के कृत्यों में नेपाली माओवादियों से लेकर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन भी रुचि ले रहे हैं। गत वर्ष पहले आईएसआई और नक्सलियों का नागपुर कनेक्शन देश के सामने उजागर हो चुका है। नक्सलियों के पास मौजूद विदेशी हथियारों और गोला बारूदों से साफ है कि उनका संबंध भारत विरोधी शक्तियों से है। आज की तारीख में नक्सलियों के पास रूस-चीन निर्मित अत्याधुनिक घातक हथियार उपलब्ध है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर नक्सलियों को खतरनाक देशी-विदेशी हथियारों की आपूर्ति कौन कर रहा है? उचित होगा कि सरकार गहनता से इसकी जांच कराए और नक्सलियों को समर्थन देने वाले संगठनों और तथाकथित बुद्धिजीवियों के विरुद्ध सख्ती से पेश आए। यह इसलिए भी जरूरी है कि देश में नक्सलियों के ऐसे अनगिनत समर्थक हैं जो अपने गले में बुद्धिजीवी होने का तमगा झुला रखे हैं। याद होगा ऐसे ही एक तथाकथित बुद्धिजीवी व नक्सलियों के मददगार दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर जेएन साईबाबा समेत छह लोगों को गढ़चिरौली की अदालत ने उम्रकैद की सजा दी। जानना जरूरी है कि प्रोफेसर साईबाबा का नक्सली नेताओं से संपर्क था। वे नक्सलियों को गुप्त सूचनाएं देने के अलावा देश-विदेश में नक्सलवाद की वकालत करते थे। वे सुरक्षा बलों के खिलाफ भी दुष्प्रचार करते थे। नि:संदेह ऐसे लोगों को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए जो देश विरोधी खतरनाक विचारधारा के फैलाव में जुटे हैं।

ऐसे लोग न सिर्फ लोकतंत्र व संविधान के विरोधी है बल्कि मानवता के भी दुश्मन हैं। देश में बहुतेरे ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी और भी हैं जो नक्सलियों के देशविरोधी कृत्यों को जायज ठहराते हैं। उनकी भी सोच नक्सलियों की तरह ही है कि हिंसा और छल-कपट के जरिए ही सामाजिक बदलाव संभव है। गौर करें तो उनकी हत्यारी सोच और हिंसक सिद्धांत दोनों देशविरोधी है। ऐसी विचारधारा किसी भी सभ्य समाज के अनुकूल नहीं कही जा सकती। और न ही इस विचारधारा के जरिए देश व समाज में बदलाव लाना संभव है। सवाल यह है कि जो व्यक्ति और संगठन मातृभूमि के साथ छल करता हो, जवानों की बलि लेता हो, निरंकुश हो वह भला राष्ट्रभक्त और गरीबों की नुमाइंदगी का दावा कैसे कर सकता है? सच तो यह है कि ऐसी विचारधारा के लोगों की सोच एक किस्म से देश के विरुद्ध खुला युद्ध जैसा है। अत: नक्सलियों पर सख्ती की जरूरत तत्काल है।
अरविंद जयतिलक (वरिष्ठ पत्रकार)

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