न्यायिक कार्यवाही में पारदर्शिता जरूरी

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Constitutional Importance Cases Live Streaming

राज एक्सप्रेस, भोपाल। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में जनहित एवं संवैधानिक महत्व वाले मामलों की सुनवाई का सीधा प्रसारण करने का आदेश दिया है (Constitutional Importance Cases Live Streaming)। अब ऐसे मामलों को सभी लोग सीधा प्रसारण देख सकेंगे और उनमें किसी तरह का कोई संशय भी नहीं होगा। इस फैसले की सबसे बड़ी बात यह कि अब देश की जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति और भी ज्यादा विश्वास पैदा होगा और सवाल बंद होंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में जनहित एवं संवैधानिक महत्व वाले मामलों की सुनवाई का सीधा प्रसारण करने का आदेश दिया है। अब ऐसे मामलों को सभी लोग सीधा प्रसारण देख सकेंगे और उनमें किसी तरह का कोई संशय भी नहीं होगा। मुख्य न्यायाधीश रहे दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने कहा था कि इस प्रक्रिया की शुरुआत उच्चतम न्यायालय से खास तौर पर मुख्य न्यायाधीश की पीठ से होगी। अदालत का इस बारे में कहना था कि अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण से कार्यवाही में पारदर्शिता आएगी और यह लोकहित में होगा। इस संबंध में उसने बहुत अच्छी टिप्पणी करते हुए कहा था कि कीटाणुओं के नाश के लिए सूरज की रोशनी बेहतरीन है। अदालत, जनता के अधिकारों में संतुलन बनाने और वादकारियों की गरिमा की रक्षा के लिए शीघ्र ही आवश्यक नियम तैयार करेगी। इसके लिए कायदे-कानून भी बनाए जाएंगे। अलबत्ता संवेदनशील मामलों का सीधा प्रसारण नहीं किया जाएगा। इसके तहत वैवाहिक विवाद या फिर यौन उत्पीड़न आदि का निपटारा करने वाले मामले आएंगे। जाहिर है इस फैसले के पीछे अदालत की मंशा, आने वाले दिनों में देश के अंदर खुली अदालत की अवधारणा को लागू करना है। फैसले के बाद निश्चित तौर पर न्यायिक कार्यवाही में पहले से और भी ज्यादा पारदर्शिता आएगी। लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर विधिक साक्षर होंगे। देश की जनता को अदालत और उसके इंसाफ पर यकीन बढ़ेगा और विवाद की गुंजाइश भी नहीं रहेगी।

अदालत ने यह आदेश कानून के एक छात्र स्वप्निल त्रिपाठी, वकील इंदिरा जयसिंह एवं गैर सरकारी संगठन ‘सेंटर फॉर अकाउंटेबिलिटी एंड सिस्टेमिक चेंज’की याचिकाओं पर दिया है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका में मांग की थी कि संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई का सीधा प्रसारण किया जाए, क्योंकि सभी नागरिकों के लिए यह सूचना पाने का अधिकार है। पश्चिमी देशों में भी ऐसा होता है। बहरहाल अदालत में जब सुनवाई शुरू हुई, तो केंद्र सरकार ने भी इस मामले में कोई विरोध नहीं किया, बल्कि सकारात्मक रुख दिखाया। अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल ने कहा कि पायलट परियोजना के तौर पर मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष आने वाले संवैधानिक मामलों की सुनवाई की वीडियो रिकॉडिर्ंग और सीधा प्रसारण किया जा सकता है। सीधे प्रसारण को एक प्रयोग के तौर पर पहले एक से तीन महीने के लिए शुरू किया जा सकता है, जिससे यह समझा जा सके कि तकनीकी तौर पर यह कैसे काम करता है। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने दलील दी थी कि आगे चलकर पायलट परियोजना की कार्य पद्धति का विश्लेषण किया जाएगा और उसे ज्यादा प्रभावी बनाने की कोशिश की जाएगी। सरकार का पक्ष जानने के बाद अदालत ने कहा कि एक पायलट परियोजना के रूप में संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के सिर्फ कुछ खास तरह के मामलों और संविधान पीठ के समक्ष दी जाने वाली दलीलों का सीधा प्रसारण किया जाना चाहिए।

पीठ ने यह भी कहा कि सीधा प्रसारण के लिए संबद्ध अदालत की इजाजत लिखित रूप से लेनी होगी। इसके साथ ही कोर्ट ने अदालत कक्ष में कैमरों के फोकस के बारे में भी निर्देश जारी किए। जहां तक प्रसारित विषयवस्तु के कॉपीराइट का सवाल है, तो यह अदालत के पास ही होगा, जो कवरेज सामग्री के इस्तेमाल के बारे में अंतिम अधिकार रखेगी। इस मामले में किसी का हस्तक्षेप भी नहीं होगा। न्यायिक मामलों की सुनवाई का सीधा प्रसारण भले ही हमारे देश में अब जाकर शुरू हो रहा हो, लेकिन पश्चिम के कई विकसित देशों में इस तरह का प्रसारण बीते एक-डेढ़ दशक से जारी है। कुछ देशों में सर्वोच्च न्यायालयों की न्यायिक कार्यवाहियों का सीधा प्रसारण होता है, तो कुछ देशों में इन कार्यवाही की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिग होती है, जिसे न्यायपालिका की वेबसाइट पर बॉडकास्ट या अपलोड कर दिया जाता है, ताकि जो लोग इन मामलों में दिलचस्पी रखते हैं या इसके बारे में आखिरी निर्णय जानना चाहते हैं, उन्हें इसके बारे में समस्त जानकारी मिल सके। मसलन ब्रिटेन में सुप्रीम कोर्ट की सारी कार्यवाही सीधे प्रसारित होती है, तो कनाडा में सुप्रीम कोर्ट के साथ ट्रायल कोर्ट का भी सीधा प्रसारण होता है। वहीं दक्षिण अफ्रीका में न्यायाधीशों की इजाजत से कई मामलों का सीधा प्रसारण होता है। आस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिग होती है, जिसे बाद में वेबसाइट पर अपलोड भी कर दिया जाता है।

इसके अलावा यूरोपीय अदालत के सभी मामलों का सीधा प्रसारण होता है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की न्यायिक कार्यवाही के वीडियो भी यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध हैं। इन्हें कोई भी जब चाहे देख सकता है और विधिक रूप से साक्षर हो सकता है। अदालत की कार्यवाही का सीधा प्रसारण करने की इजाजत देकर, सर्वोच्च न्यायालय ने सचमुच बड़ा कदम उठाया है। अब संसद के दोनों सदनों की तरह अदालतों की कार्यवाही का भी सीधा प्रसारण संभव होगा। न्यायिक कार्यवाही का सीधा प्रसारण होने से अदालत की पूरी प्रक्रिया को जनता अपने घर बैठे देख सकेगी। मसलन जज कैसे सुनवाई करते हैं। वादी-प्रतिवादी पक्ष से कैसे सवाल-जवाब होते हैं, वकील अदालत में कैसे अपनी दलीलें रखते हैं और अदालत किन कानूनी नुकतों से सहमत या असहमत होते हुए अपना फैसला सुनाती है। शीर्ष अदालत का यह फैसला, निश्चित तौर पर आने वाले दिनों में न्यायपालिका के अंदर पारदर्शिता की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। कल तक शीर्ष अदालतों में न्यायिक कार्यवाही की जो गोपनीयता होती थी, सीधे प्रसारण और वीडियो रिकॉर्डिग से यह गोपनीयता एक झटके में खत्म हो जाएगी, न्यायाधीशों के फैसलों में पहले से ज्यादा और जिम्मेदारी, पारदर्शिता आएगी। गुप्त नजर जब अदालत में सभी के कार्यकलापों पर निगाह रखेगी, तो वे अपना काम ईमानदारी और पूरी निष्ठा से करने की कोशिश करेंगे।

सबसे बड़ी बात यह कि देश की जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति और भी ज्यादा विश्वास पैदा होगा। एक ऐसे दौर में जब लोकतंत्र के तमाम स्तंभों में लगातार गिरावट आ रही है और उनमें नागरिकों का यकीन कम हुआ है, तब न्यायपालिका का खुद आगे आकर अपनी संस्था में पारदर्शिता एवं जवाबदेही के लिए पहल करना, वाकई काबिले तारीफ कदम है। और इस कदम की सभी को सराहना करनी चाहिए। कई बार देखा गया है कि कोर्ट का फैसला आने के बाद समाज का एक वर्ग उसकी आलोचना करने लगता है। यह जाने बिना कि कोर्ट ने किन परिस्थितियों और दलीलों के आधार पर वह फैसला दिया है। इससे कोर्ट की अवमानना तो होती ही है, लोगों का भरोसा भी कम होता है। अब कोर्ट ने मामलों के सीधा प्रसारण करने की बात कही है तो अब विवाद की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। यह देर से आए पर दुरुस्त आए जैसा है। सरकार को भी इस दिशा में सोचना चाहिए था। खैर, अब जबकि कोर्ट ने पारदर्शिता की शुरुआत खुद से की है, तो यह सभी का दायित्व बनता है कि वे भी अपने काम में पारदर्शिता लाएं।
जाहिद खान (वरिष्ठ पत्रकार)

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