बच्चे के लिए ‘नरक’ न बन जाए स्कूल

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Children

केस 1: नर्सरी से लेकर क्लास 5 तक स्कूल जाने में अभिनव बच्चे (Children) ने कभी टालमटोल नहीं की। बड़े आराम से, हंसी खुशी से वह स्कूल जाता था। शैलजा ने महसूस किया कि, इन दिनों उसका बेटा स्कूल जाने से कतराता है। कभी पेट दर्द, कभी होमवर्क न हो पाने का बहाना बनाता है और कई बार तो रोने लग जाता है। शैलजा को शक हुआए तो उसने अभिनव से पूछताछ की।

बुलीइंग का शिकार

पता चला कि अभिनव बुलीइंग का शिकार हुआ है। उसकी क्लास के कुछ दबंग बच्चे उससे छेड़छाड़ करते हैं और कभी कभी मारपीट भी करते हैं। यही कारण था जो, अभिनव स्कूल जाने से कतराता था।

केस 2 : निशा ने गौर किया कि, हमेशा चहकने, मुस्कुराने वाली 12 वर्षीय शाइना आजकल चुपचुप सी रहती है और बाथरूम भी दिन में कई बार जाती है। उसने पूछा तो, शाइना ने सिर्फ इतना ही बताया कि, आजकल उसे बार-बार पेशाब आती है। निशा ने अपनी फैमिली फिजिशियन को दिखाया, तो उन्होंने बताया कि शाइना को यूटीआई की समस्या है। फिर अलग से यह भी बताया कि, शाइना के प्राइवेट पार्ट्स में हल्की इंज्यूरी भी है, मामला संदेहजनक है। डॉक्टर की बात सुनकर निशा के होश उड़ गए।

बेटी के जवाब

बेटी से प्यार से पूछने पर, वह फूट-फूट रो पड़ी और बेटी ने बताया कि, हिंदी के नए टीचर उसे बार-बार गलत तरीके से छूते हैं और उसे किस वगैरा भी करते हैं। निशा की शंका सही निकली, आखिर हुआ वही जिसका डर था।

माता पिता को रहता है हमेशा डर

स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट, हिंसा, छेड़छाड़ और यौन अपराधों के ऐसे हजारों मामले सामने आ चुके हैं। कुछ मामले मीडिया में सुर्खियों बने, तो कुछ वहीं दफन होकर रह गए। गुड़गांव के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में छात्र द्वारा छात्र के मर्डर और कोलकाता के नामी गिरामी जीडी बीडला एडूकेशन सेंटर का मामला छोड़ भी दें तो, हाल में ही दर्जनों ऐसी खबरें मीडिया में आ चुकी हैं। लगभग हर दिन ऐसी खबरें अखबारों में पढ़कर मां बाप असमंजस में हैं कि आखिर अपने लख्ते जिगर की सलामती और सुकून के लिए वे क्या करें। उनके मन में हमेशा डर रहता है कि, कल को उनके बच्चे के साथ कुछ ऐसा वैसा न हो जाए।बच्चे के लिए ‘नरक’ न बन जाए स्कूल (Children)

स्वाभाविक है डरना

माता पिता का डरना स्वाभाविक भी है। लेकिन इस डर से न तो बच्चों को स्कूल भेजने से रोका जा सकता है और न ही दिन भर उनके साथ, साए की तरह रहना संभव है। ऐसे में माता पिता कुछ उपाय अपना कर इस तरह के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं।

बच्चों में जागरूकता 

माना कि बच्चों से नकारात्मक बातें करना ठीक नहीं और उनसे इस तरह की बातें करने से वे डर सकते हैं। लेकिन जैसी घटनाएं आए दिन घट रही हैं, उनके मद्देनजर उन्हें पूरी तरह आप स्कूल प्रबंधन और वहां के स्टाफ के भरोसे भी नहीं छोड़ सकते। इसलिए उन्हें बातों ही बातों में, इधर उधर के किस्सों के माध्यम से, कहानियों के माध्यम से या फिर अखबार में छपी खबरों के माध्यम से अच्छी बुरी नजरों, अच्छी बुरी बातों और अच्छे बुरे स्पर्श के बारे में बताएं। मौजूदा दौर में यह आपका मजबूरी भरा कर्तव्य है कि, आप उसे इस ‘खराब’ दुनिया के खराब लोगों के बारे में बताएं और साथ ही एलर्ट रहने का प्रशिक्षण भी दें।

मनोचिकित्सक का कहना

कोलकाता के फोर्टिस अस्पताल में मनोरोग विभाग के प्रमुख एवं मनोचिकित्सक डॉ. संजय गर्ग कहते हैं, “बच्‍चे को हर चीज संवाद के सामान्य प्रवाह के दौरान बताएं। चीजों को बढ़ाचढ़कर नहीं बल्कि संतुलित तरीके बताएं। आपका उद्देश्य बच्चे को डराना नहीं प्रशिक्षित और जागरूक करना होना चाहिए। चाहें तो इससे जुड़ी यू ट्यूब या अन्य मीडिया पर उपलब्ध डाक्यूमेंट्री व शॉर्ट फिल्म दिखाकर भी उसे ट्रेनिंग दे सकते हैं।”

बच्चे से रोज करें खूब सारी बातें :-

आजकल माता पिता दोनों वर्किंग हैं। एक तो वैसे ही उनके पास वक्त कम रहता है और जो रहा सहा वक्त है, वह सोशल मीडिया और गैजेट्स चूस लेते हैं।नतीजतन पेरेंट्स को अपने बच्चों से खुलकर बात करने का मौका ही नहीं मिलता। बच्चों व पेरेंट्स के बीच बहुत थोड़ी सी, औपचारिक बातें ही होती हैं। न वे बच्चे से उसके स्कूल या क्लास के बारे में बातें करते हैं और न पढ़ाई और उसके फ्रेंड्स के बारे में पूछताछ करते हैं। इससे माता पिता को पता ही नहीं चलता कि, उनका बच्चा क्या पढ़ रहा हैं, उसके क्या मनोभाव हैं और वह किन समस्याओं से गुजर रहा है।

अपने बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए आपका उससे खूब सारी बातें करना जरूरी है। उन्हीं बातों से आप जान पाएंगी कि, उसके साथ कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं या जिन लोगों से उसका रोज वास्ता पड़ता हैं, उनमें से कोई उसे सता या शोषित तो नहीं कर रहा।

बीच-बीच में खुद भी स्कूल लाएं :-

भले ही आपके बच्चे को आप स्कूल बस तक छोड़ती हैं और वो रोज समय से आता जाता है। इसके बावजूद आपका स्कूल जाना साल में सिर्फ एक-दो बार पैरेंट टीचर मीटिंग तक सीमित न रहे। आपको महीने में कम से कम दो तीन बार बच्चे के साथ स्कूल जाना चाहिए। उससे दूसरे कैसा बिहेव करते हैं या वह दूसरों से कैसा व्यवहार करता हैं, स्कूल में सुरक्षा के कैसे इंतजाम हैं, सिक्योरिटी गार्ड कितना एलर्ट हैं, सीसीटीवी काम कर रहे हैं या नहीं आदि बातों का जायजा लेना चाहिए। दूसरे बच्चों के पैरेंट्स के साथ भी आपका संपर्क रहना चाहिए। जब भी स्कूल जाएं बच्चे को पढ़ाने वाली एकाध टीचर्स या क्लास टीचर से जरूर मिलें। उनसे बातचीत के दौरान आपको बहुत कुछ पता चलता है विशेषकर बच्चा क्लास में कैसा परफॉर्म कर रहा हैं, पढ़ने में मन लगा रहा है या नहीं आदि जानकारियां भी मिल जाएंगी।

शिखर चंद जैन

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