सेना के अधिकारों की भी सोचें हम

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BSF Jawan Brutally Killed

राजएक्सप्रेस,भोपाल। पिछले दिनों एक आतंकी के शव को घसीटे जाने पर मानवाधिकार संगठनों ने खूब तमाशा किया, पर अब एक जवान के साथ की गई क्रूरता (BSF Jawan Brutally Killed)पर वे खामोश हैं। सवाल है कि इन लोगों को सेना का मानवाधिकार क्यों नहीं दिखता? क्या हमारे जवान इंसान नहीं हैं।

पिछले दिनों सेना द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के एक आतंकी को मौत के घाट उतारने के बाद उसे सड़क पर घसीटते हुए ले जाने की तस्वीर वायरल होने के बाद कुछ मानवाधिकार संगठन और उसके लोगों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। दलीलें ऐसी दी गईं मानों मरने वाला आतंकी नहीं महात्मा हो। सेना को खूब बुरा-भला कहा गया। सरकार तक को सामने आ कर सफाई देनी पड़ी और सेना को किए गए सलूक का कारण बताना पड़ा। बावजूद इसके वे टस से मस नहीं हुए। खैर, विवाद अब भी जारी है। मगर इस बीच सांबा जिले के रामगढ़ सेक्टर में पाकिस्तान ने बीएसएफ जवानों पर हमला कर दिया। इसमें एक जवान शहीद हो गया। शहीद जवान के साथ सीमा पार क्रूरता की गई और उसके शरीर को क्षत-विक्षत किया गया। सेना को जवान का शव जिस हालत में मिला, वह रोंगटे खड़े कर देता है। मगर अब तक एक भी मानवाधिकार संगठन की जुबान नहीं खुली है।

आतंकियों के नाम पर पड़ोसी मुल्क से अपनी जेबें गर्म करने वाले कुछ तथाकथित लोगों को सेना का मानवाधिकार क्यों नहीं दिखता? क्या वे इंसान नहीं हैं या फिर बॉर्डर पर मरने के लिए ही खड़े हैं। आतंकी के साथ जो सलूक किया गया था, वैसा कई देशों में किया जाता है। आतंकी के शव पर विस्फोटक बंधा होने की आशंका के चलते कुछ देर तक शव को घसीटा जाता है। बाद में उसके शव को दफन कर दिया जाता है। आतंकियों के मानवाधिकार की बात करने वाले क्या यह भूल गए कि कारगिल जंग के बाद पाक की सेना जब अपने जवानों को मरने के बाद छोड़ गई थी, तो हमारी सेना ने ही सम्मानपूर्वक उनका अंतिम संस्कार किया था। यह सब कुछ जानते हुए आतंकी की मौत पर कोहराम मचाना और अपने जवानों की शहादत पर मौन रहना दोगली नीति का परिचायक है। इस तरह की मानसिकता देश में सौहाद्र्र को कम करती है और सेना का मनोबल कमजोर करती है।

याद होगा कश्मीर में पत्थरबाजी के बीच जवानों के बच्चों ने मानवाधिकार आयोग से गुहार लगाई थी कि क्या कश्मीर में पत्थरबाजों के ही मानवाधिकार होते हैं, सैनिकों के नहीं? बता दें कि सेना की टुकड़ी पर पत्थर फेंकने वालों पर सेना की कार्रवाई में दो नागरिकों की मौत हो गई थी। इसके बाद पुलिस ने सेना के एक अधिकारी पर हत्या का मुकदमा दर्ज किया था। सेना ने भी जवाबी एफआईआर दर्ज कराई थी। इन बच्चों ने राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष एचएल दत्तू को लिखे पत्र में जवानों के मानव अधिकारों के संरक्षण की मांग की थी और पूछा था कि पत्थरबाजों पर रहम और सैनिकों पर सितम क्यों हो रहा है? इन बच्चों का तर्क था कि पत्थरबाज रोज सैनिकों के मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि हम क्यों सेना के मानवाधिकारों को लेकर मुखर नहीं हैं। क्यों नहीं आतंक परस्त बातें करने वालों पर सख्ती कर पा रहे।

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