अपनों की जिंदगी बचाती आधी आबादी

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Organ Donation

राजएक्सप्रेस,भोपाल। अपनों का जीवन संवारने-सहेजने में जुटी रहने वाली महिलाएं अपनों का जीवन बचाने के मोर्चे पर भी आगे हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत ही नहीं दुनियाभर में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा अंगदान (Organ Donation) कर रही हैं। पुरुषों में अब भी संवदेनशीलता के पैमाने पर जागरूकता आनी बाकी है। अगर केंद्र सरकार नियमों में ढील दे और समाज में भ्रांतियों को दूर किया जाए, तो यकीनन स्थिति में बदलाव किया जा सकता है।

अपनों का जीवन संवारने-सहेजने में जुटी रहने वाली महिलाएं अपनों का जीवन बचाने के मोर्चे पर भी आगे हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत ही नहीं दुनियाभर में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा अंगदान कर रही हैं। सिर्फ जीवनसाथी के लिए ही नहीं, महिलाएं अपने बच्चों, भाई-बहनों या दूसरे परिजनों के लिए अंगदान करती हैं। कुछ समय पहले देश के तीन अस्पतालों (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, पीजीआई चंडीगढ़ और नारायणा अस्पताल, हैदराबाद) में अंग प्रत्यारोपण और अंगदान के आंकड़ों से पता चलता है कि ऑर्गन डोनेट करने वालों में 85 फीसदी तक महिलाएं हैं। अंग का लेन-देन अगर पति और पत्नी के बीच है तो पति की जान बचाने के लिए अपनी किडनी देने वालों में 87 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि पत्नियों की जान बचाने में पुरुषों का प्रतिशत केवल 13 फीसदी ही है। गौरतलब है कि 1997 में ऐसे आंकड़े जुटाने वाला पहला शोध अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली में हुआ था। उसके बाद कई अस्पतालों के अंगदान के आंकड़ों से इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि अंगदान करने का लगभग पूरा भार महिलाओं के ही हिस्से है। व्यावहारिक रूप से भी अपने परिवेश में गौर करें तो देखने में आता है कि अंगदान कर अपनों का जीवन बचाने में वालों में अधिकतर महिला डोनर्स ही हैं।

सुरक्षा और समानता के मोर्चे पर आज भी अपने अधिकारों के लिए जूझ रही आधी आबादी अपनों का जीवन बचाने के मोर्चे पर आगे हैं। यूं भी भारत जैसे परंपरागत समाज में तो मानो यह रीत ही है कि अपनों की दु:ख तकलीफों का हल तलाशने के लिए महिलाओं की तरफ ही उम्मीद भरी नजर से देखा जाता है। तभी तो अंगदान करने के निर्णय में महिलाओं का फैसला भी अपनों की कितनी ही अपेक्षाओं तले दबा होता है। कई मामलों में तो पत्नी पर ससुराल ही नहीं मायके तक के लोगों का यह दबाव होता है कि वो अंगदान करे और अपने जीवनसाथी की जान बचाए। एक सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारी की तरह यह जवाबदेही भी आधी आबादी के हिस्से कर दी गई। यही वजह है कि जब परिवार में किसी को अंगदान की जरूरत पड़ती है तो मां, बहन, पत्नी या बेटी आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी उठा लेती हैं। विचारणीय यह है कि ऑर्गन डोनेशन के मामले में विकसित देशों की स्थिति भी खास अलग नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि अमरीका में भी किडनी दान करने वालों में 60 फीसदी महिलाएं ही होती हैं। इतना ही नहीं दुनिया के दूसरे कई देशों में भी किडनी डोनेट करने के मामले में महिलाओं और पुरुषों का अनुपात कमोबेश यही है।

कहना गलत नहीं होगा कि अंगदान जैसे सार्थक और सराहनीय कार्य से महिलाओं का जज्बाती होना ही नहीं बल्कि सामाजिक दबाव और आर्थिक निर्भरता का पहलू भी जुड़ा है। भारत में तो अंगदान को लेकर बनी सोच में लिंग भेद और आर्थिक असमानता जैसी वजहें भी शामिल हैं, जिनके चलते कई बार महिलाए अनिच्छा से भी ऑर्गन डोनेशन करती हैं। कितने ही सामजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक कारण है जो स्त्री-पुरुषों के बीच भेद की वजह ही नहीं अंगदान के आंकड़ों में भी स्त्री और पुरुष में भेद का कारण बन रहे हैं। कभी भावनात्मक बंधनों का हवाला देकर तो आर्थिक निर्भरता का भी दिखाकर। उनके अपने भी उनसे यही आशा रखते हैं कि वे घर के किसी सदस्य का जीवन बचाएं। ऐसे में गौर करें तो लगता है कि अंगदान की प्रक्रिया भले ही पूरी तरह चिकित्सकीय और वैज्ञानिक है, लेकिन हमारे यहां इसके पीछे समाज में मौजूद जटिल सामाजिक स्थितियां और सोच भी जिम्मेदार है। जीवन बचाने की इस जिम्मेदारी का बोझ लगभग पूरी तरह महिलाओं के ही सिर आ जाना कहीं न कहीं समाज और परिवार में आधी आबादी के उस दोयम दर्जे को सामने लाता है, जहां वे अपना मानवीय हक पाने में आज भी पीछे ही है। फैसले लेने का अधिकार आज भी उनके पास नहीं है। नि:संदेह, महिला डोनर्स की संख्या ज्यादा होने की जड़ भी समाज की सोच में ही है।

अपने परायों को नई जिंदगी देने में हम सहभागी बनें इससे अच्छा क्या हो सकता है? लेकिन आबादी के लिहाज से दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश भारत में आज भी अंगदान करने वाले लोग मुट्ठी भर ही हैं। बीते कुछ सालों में बदलती जीवनशैली के चलते कम आयु में कई तरह की बीमारियां दस्तक दे रही हैं। इन बीमारियों के चलते किसी महत्वपूर्ण अंग में खराबी आ जाने के मामले तेजी से बढ़े हैं। इनमें से कुछ व्याधियों का हल केवल अंग प्रत्यारोपण है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर अंग दान करने वालों की संख्या एक से भी कम है। हालांकि, भारत में अंगदान को लेकर आमजन की उदासीनता की वजह जागरूकता की कमी ही नहीं सरकारी स्तर पर इसकी उपेक्षा किया जाना है। यही वजह है कि बीते साल जागरूकता लाने और अंगदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने भी अंगदान करने वाले परिजनों को रियायत और प्रोत्साहन देने की बात भी कही थी। असल में देखा जाए तो अंगदान को प्रोत्साहन देने वाले ऐसे प्रयास जरूरी भी हैं, क्योंकि नागरिकों की ओर से स्वैच्छिक अंगदान ही अंग प्रत्यारोपण का एकमात्र वैध तरीका है। इसका कोई और चिकित्सकीय विकल्प नहीं है। अंगदान दूसरों के लिए जीवनदान समान है। लेकिन यह भी एक कटु सच है कि आकार और आबादी के हिसाब से स्पेन, क्रोएशिया, इटली और ऑस्ट्रिया जैसे छोटे देश भी अंगदान में भारत से काफी आगे हैं।

अंगदान के लिए लोगों को बार-बार प्रेरित करने व जन जागरूकता लाने वाले अभियान चलाने के बावजूद हमारे यहां अंगदान को लेकर सोच नहीं बदली है। यहां तक कि मौत के बाद भी अधिकांश लोग धार्मिक मान्यताओं और अंधविश्वासों के कारण अंगदान नहीं करते। अब इसे जागरूकता की कमी कहें या उदासीनता की प्रवृत्ति। हमारे देश में हमेशा से ही अंगों की मांग और आपूर्ति में भारी अंतर रहा है। जो मांग पूरी हो रही है उसमें भी ज्यादातर डोनर्स महिलाएं ही हैं। यह भी आधी आबादी पर बोझ बढ़ाने वाली बात ही है, जबकि भारत में साल 1994 में अंगदान को लेकर बना कानून भी जेंडर की कोई बात नहीं करता। अपने करीबी रिश्तेदारों के लिए महिलाएं और पुरुष दोनों ही अंगदान कर सकते हैं। पत्नी, मां या बहन ही नहीं पति, पिता या बेटा भी ऑर्गन डोनेट कर सकता है। नियमों के मुताबिक भारत में प्रत्यारोपण का पूरा कार्यक्रम द ट्रांसप्लांट ऑफ ह्यूमन ऑर्गन एक्ट 1994 के तहत किया जाता है। जिसके मुताबिक कोई भी व्यक्ति अंगों को बेच या खरीद नहीं सकता। जिस इन्सान का प्रत्यारोपण होना है, अंगदान सिर्फ उसके सगे-संबंधी या बेहद नजदीकी रिश्तेदार ही कर सकते हैं, जिसके लिए पूरी जांच-पड़ताल की जाती है। अंग देने का निर्णय डोनर स्वेच्छा से बिना किसी दबाव के करे यह इस एक्ट का अहम नियम है। ऐसे में देखने और समझने में यही लगता है कि महिलाएं भी अपनी इच्छा से अंगदान करती हैं, लेकिन ऐसे कई कारण हैं जिन्होंने जीवन बचाने के इस सार्थक कार्य को भी उनके लिए बोझ और मजबूरी बना दिया है। अगर सरकार नियमों में ढील दे और समाज में भ्रांतियों को दूर किया जाए, तो स्थिति बदल सकती है। अब धीरे-धीरे अंगदान को लेकर लोगों में जागरूकता आ रही है, मगर अभी जो औसत है, उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है।
डॉ. मोनिका शर्मा (वरिष्ठ पत्रकार)

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