कोर्ट की दबिश में दागी जन-प्रतिनिधि

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Supreme Court

राजएक्सप्रेस, भोपाल। देश के दागी सांसद व विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने सख्त रुख अपनाया है। सरकार ने भी अपनी तरफ से ईमानदार रहने की बात दोहराई है। मगर मामलों के निपटारे की समय-सीमा भी तय करनी होगी वरना राजनीतिक अपराधी जो खेल जिला एवं सत्र न्यायालयों में खेलते रहे हैं, उसी खेल का हिस्सा विशेष अदालतें भी बन जाएंगी।

देश के दागी सांसद और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को सालभर में निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने सख्त रुख अपना लिया है। अब शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि विशेष त्वरित न्यायालयों के गठन की वह स्वयं निगरानी करेगा। इस नाते न्यायालय ने 18 राज्यों के मुख्य सचिवों समेत उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश देते हुए कहा है कि ‘सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी दें और इस बारे में शपथ-पत्र भी प्रस्तुत करें। इन अदालतों के गठन पर सरकार के जवाब से न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की तीन सदस्यीय पीठ असंतुष्ट दिखी। इस पीठ में नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ भी सदस्य हैं। याद रहे इसी पीठ ने 14 दिसंबर 2017 को केंद्र सरकार को आदेश दिया था कि एक दिसंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने का जो आदेश दिया है, उस पर तुरंत अमल किया जाए। साथ ही इन अदालतों में एक मार्च 2018 तक काम भी शुरू हो जाना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर राज्यों में अदालतें वजूद में नहीं आ पाई हैं। इसके उलट सभी दलों के नेता देश की राजनीति को अपराध मुक्त करने की बात तो बहुत करते हैं, लेकिन जब ठोस पहल करने की जरूरत पड़ती है तो इन्हीं नेताओं को सांप सूंघ जाता है।

अदालत की सख्ती से अपराधी सांसद व विधायकों की राजनीति से विदाई की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि, केंद्र सरकार ने 12 विशेष अदालतों के गठन का निर्णय लेते हुए 7.8 करोड़ रुपए का आवंटन मंजूर किया हुआ है, लेकिन ये अदालतें सुचारू रूप से अपना काम शुरू नहीं कर पाई हैं। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को आपराधिक मामलों में लिप्त जनप्रतिनिधियों के खिलाफ चल रहे मामलों की शीघ्र सुनवाई के लिए विशेष न्यायालयों के गठन का निर्देश दिया था। दरअसल कोर्ट के 10 जुलाई 2013 को जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8;4एच को अंसवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। आदेश के मुताबिक अदालत द्वारा दोषी ठहराते ही जनप्रतिनिधि की सदस्यता समाप्त हो जाएगी। अदालत ने यह भी साफ किया था संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 के अनुसार दोषी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल ही नहीं किए जा सकते हैं। इसके उलट कानून की धारा 8;4एच के अनुसार सजायाफ्ता जनप्रतिनिधियों को निर्वाचन में भागीदारी के सभी अधिकार हासिल हैं। अदालत ने महज इसी धारा को विलोपित किया है। इसी के बाद मधु कोड़ा, लालू प्रसाद यादव, जगन्नाथ मिश्र और जयललिता जैसे नेताओं के जेल जाने का रास्ता खुल गया था।

बीते तीन-चार दशकों के भीतर राजनीतिक अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। बलात्कार, हत्या और उनसे छेड़छाड़ करने वाले अपराधी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं। लूट, डकैती और भ्रष्ट कदाचरण से जुड़े नेता भी विधानमंडलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। 2014 के आम चुनाव और वर्तमान विधानसभाओं में ही 1581 सांसद और विधायक ऐसे हैं, जो अपराधी होते संवैधानिक प्रकिया में सर्वोच्च हिस्सेदार हैं। यह कल्पित अवधारणा नहीं, बल्कि इन जनप्रतिनिधियों ने स्वयं ही अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा प्रत्याशी के रूप में निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत किए शपथ-पत्रों में किया है। साफ है, राजनीति से जुड़े समुदाय की छवि और साख संदिग्ध है। इन्हें देश के भविष्य के लिए हर हाल में उज्‍जवल होना ही चाहिए। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और नवीन सिन्हा की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के क्रम में विशेष अदालतों के गठन का निर्देश केंद्र सरकार को दिया था। यह निर्देश देते हुए न्यायालय ने केंद्र से यह भी पूछा था कि त्वरित न्यायालय कब तक बनाए जाएंगे और इन पर कितना धन खर्च होगा। न्यायालय ने यह भी जानना चाहा था कि 2014 के आम चुनाव के दौरान विभिन्न उम्मीदवारों ने दिए हलफनामों में जिन विचाराधीन अपराधों का जिक्र किया था, उनमें से कितने मामलों का निराकरण हो पाया है? साथ ही, यह भी पूछा कि इनमें से कितनों पर और नए मामले दर्ज हुए हैं? यह जानकारी देते हुए केंद्र सरकार ने बताया है कि दागियों के खिलाफ चल रहे मामलों के निपटारे के लिए 12 विषेश अदालतें गठित की जाएंगी। इनके गठन पर 7.8 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। लेकिन ये आदलतें जमीन पर नहीं उतर पाईं।

सरकार ने न्यायालय को जो ताजा आंकड़े दिए हैं उनके मुताबिक 11 राज्यों में फिलहाल सांसदों और विधायकों के खिलाफ 1233 मामले फास्ट ट्रैक अदालतों में स्थानांतरित किए गए है। इनमें से 136 प्रकरणों का निपटारा भी हुआ है। जबकि 1097 मामले विचाराधीन है। आंध्र-प्रदेश, कर्नाटक, केरल, उत्तर-प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, मध्य-प्रदेश, बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में एक-एक, जबकि दिल्ली में दो विशेष अदालतें काम कर रही हैं। वर्तमान में बिहार में सांसद-विधायकों के खिलाफ सबसे ज्यादा 249, केरल में 233 व पश्चिम बंगाल में 226 अपराधिक मामले लंबित हैं। हमारी कानूनी व्यवस्था में विरोधाभासी कानूनी प्रावधानों के चलते सजायाफ्ता मुजरिमों को आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की मांग उठती रही है, लेकिन सार्थक परिणाम अब तक नहीं निकल पाए हैं। यही वजह है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर अपराधी प्रवृत्ति के राजनीतिक प्रभावी होते चले जा रहे हैं। इसका एक प्रमुख कारण न्यायायिक प्रकिया में सुस्ती और टालने की प्रवृत्ति भी है। नतीजतन मामले लंबे समय तक लटके रहते हैं और नेताओं को पूरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर मिल जाता है। इसलिए यह जरूरी नहीं कि त्वरित न्यायालयों के प्रस्ताव पर अमल होने के बाद भी न्याय में देरी नहीं होगी?

उपभोक्ता, किशोर और परिवार न्यायालयों का गठन इसी उद्देश्य से किया गया था कि इन प्रकृतियों के मामले, इन विशेष अदालतों में तेज गति से निपटेंगे, लेकिन इनकी सार्थकता अभी सिद्ध नहीं हो पाई है। वकीलों द्वारा तारीख दर तारीख मांगकर सुनवाई टालने की मंशा ने इन अदालतों के गठन का मकसद लगभग खत्म कर दिया है। यदि दागी जनप्रतिनिधियों का निस्तारण करने वाली विशेष अदालतें इसी प्रवृत्ति का शिकार हो गईं तो उनके गठन का उद्देश्य व्यर्थ साबित होगा और ये अदालतें देश के लिए सफेद हाथी साबित होंगी। वैसे भी देश का जितना बड़ा भूगोल और संसद, विधानसभाओं और पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं, उस अनुपात में हर जिले में विशेष अदालत खोलना आसान नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें इनका ढांचा खड़ा करने के लिए अर्थ की कमी का बहाना भी करेंगी। दूसरे, हमारे यहां पुलिस हो या सीबीआई जैसी षीर्श जांच एजेंसी, इनकी भूमिकाएं निर्लित नहीं होती हैं। अकसर इनका झुकाव सत्ता के पक्ष में देखा जाता है। इनके दुरुपयोग का आरोप परस्पर विरोधी राजनीतिक दल लगाते ही रहते हैं। इसीलिए देष में यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बनी हुई है कि हमारे यहां अपराध भी अपराध की प्रकृति के अनुसार दर्ज न किए जाकर व्यक्ति की हैसियत के मुताबिक पंजीबद्ध किए जाते हैं व उसी अंदाज में जांच प्रकिया आगे बढ़ती है। इस दौरान कभी-कभी तो यह लगता है कि पूरी कानूनी प्रक्रिया ताकतवर दोषी को निदरेषी सिद्ध करने की मानसिकता से आगे बढ़ाई जा रही है। इसी मानसिकता का परिणाम है कि राजनीति में अपराधियों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।
प्रांजल कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)

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