अजेय अटल और अंतहीन यात्रा

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Atal Bihari Vajpayee

राजएक्सप्रेस, भोपाल। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) एक ऐसे शिखर पुरुष थे जिनके व्यवहार में सादगी हमेशा बनी रही, आचरण में सदा शुद्धता रही, उच्च नैतिक आदर्शो का ताउम्र पालन करते रहे, शांति के प्रति वे सदा प्रतिबद्ध रहे और मानवता के वे पथ प्रदर्शक बने रहे। बहरहाल भारत रत्न और भारत माता के सच्चे प्रहरी अटल बिहारी वाजपेयी देश और विश्व में एक उच्च कोटि के जननायक के रूप में हमेशा याद किए जाएंगे।

1999 में कारगिल लड़ाई चल रही थी और अटलजी की पड़ोसी पाकिस्तान को लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही थी। उस दौरान पाक के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ थे जो व्यक्तिगत रूप से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के बहुत बड़े प्रशंसक थे। नवाज ने अटलजी से बात कर यह सुझाव दिया कि हमें अपने-अपने डीजीएमओ से बात कर इस विवाद को खत्म करना चाहिए। अटलजी शांति के बड़े हिमायती थे, वे तुरंत राजी हो गए लेकिन उसके बाद भी सीमा पर तनाव में कोई कमी नहीं आई। बकौल शरीफ, मैंने फिर वाजपेयी साहब को फोन कर डीजीएमओ को निर्देश देने को कहा तो उन्होंने टोका कि भाई, आपकी फौज ने हमला बोल दिया है, पहले उन्हें बुलाइए। दरअसल अटल बिहारी वाजपेयी आम इंसान से प्रधानमंत्री तक के सफर में एक ऐसी शख्सियत बने रहे जिनमें किसी भी हालात में नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने का गजब का जज्बा था। वे संसद में लंबे समय तक ऐसे अकेले विपक्षी नेता थे जो अपनी साफगोई, निष्पक्षता और स्पष्टता के कारण समूचे सत्ता दल द्वारा सराहे जाते थे। उनके प्रशंसकों में पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। जब वे सत्ता में रहे तब भी उनकी विनम्रता में कोई कमी नहीं आई। 70 के दशक में जब वे पहली बार विदेश मंत्री बने और उन्होंने अपने ऑफिस से नेहरू की तस्वीर गायब पाई तो नाराज हुए। अपने मातहतों को नेहरू जी की तस्वीर को उसी स्थान पर लगाने का आदेश दिया।

अपने बाल्यकाल में देश की आजादी में अपनी कविताओं से योगदान देते थे। इस कारण फिरंगियों ने उन्हें 24 दिन जेल की हवा खिलाई। उच्च स्तर के पत्रकार रहे और राष्ट्र धर्म, पांचजन्य, स्वदेश और वीर अजरुन जैसे ख्यात समाचार पत्रों का संपादन किया। उनकी आलोचना के तरीके भी अनूठे होते थे। देश विभाजन की संभावनाओं के बीच उनके संपादन में निकली राष्ट्रधर्म पत्रिका का प्रवेशांक का एक काटरून भी बेहद चर्चित हुआ था। इसमें खीर पकाती एक बुढ़िया कांग्रेस की प्रतीक थी। उसने अंगीठी में चरखे को झोंक दिया था। चरखा जो एकता का प्रतीक था, एक कुत्ता खीर चाट रहा था। यह मुस्लिम लीग का प्रतीक था। खीर पक रही थी, कुत्ता खीर चाट रहा था और बुढ़िया मजे से ढोल बजा रही थी। इस काटरून के नीचे शायर अमीर खुसरो की ये पंक्तिया दी गई थी ‘खीर पकाई जतन से चरखा दिया जलाय, आया कुत्तर खा गया, तू बैठी ढोल बजाय।’ कश्मीर पर सरकार की नीतियां जब उन्हें उचित नहीं लगी तो उन्होंने मुखर होकर 22 अप्रैल 1964 को राज्यसभा में सरकार की आलोचना करते हुए कहा संविधान की धारा 370 खत्म होनी चाहिए। यह एक अस्थायी प्रावधान है, किंतु अब घड़ी की सुई को उल्टा घुमाने की कोशिश की जा रही है। काल के प्रवाह को पलटने का प्रयत्न हो रहा है। शेख अब्दुल्ला बड़े व्यक्ति हो सकते हैं, मैं उनका सम्मान करता हूं, किंतु वे जम्मू कश्मीर और शेष भारत से बड़े नहीं हो सकते। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों को लेकर अटलजी बेबाकी से संसद में राय रखते थे।

आपातकाल के सियासी संकट में भी उनके तेवर जस के तस रहे। बेंगलुरु जेल में तबीयत खराब होने के बाद जब उन्हें दिल्ली लाकर एम्स में भर्ती किया गया तो उन्होंने अपना दर्द कुछ इन शब्दों में बयां किया, दर्द कमर का तेज, रात भर लगी न पलकें, सहलाते बस रहे, इमरजेंसी की अलकें, नर्स नींद में चूर, ऊंघते सभी सिपाही, कंठ सूखता, पर उठने की सख्त मनाही। आखिरकार 20 महीने की कैद के बाद आपातकाल हटा और अटलजी समेत कई नेताओं को रिहा कर दिया गया। अपने विपक्षी नेता की तारीफ करने से भी वे नहीं चूकते थे। 1971 में लोकसभा में बतौर विपक्ष के नेता वाजपेयी ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तुलना देवी दुर्गा से की थी। वाजपेयी ने पाकिस्तान पर 1971 की लड़ाई में एक बड़ी जीत पर इंदिराजी की बड़ी सराहना की थी। यही नहीं उन्होंने राजीव गांधी की मुक्त कंठ से सराहना करने से भी परहेज नहीं किया। एक घटना सुनाते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने बताया था कि राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो उन्हें पता नहीं कैसे पता चल गया कि मेरी किडनी में समस्या है और इलाज के लिए मुझे विदेश जाना पड़ेगा। उन्होंने मुझे दफ्तर में आमंत्रित किया और कहा कि वह उन्हें संयुक्त राष्ट्र में न्यूयॉर्क जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर रहे हैं और उम्मीद है कि इस अवसर का लाभ उठाकर आप इलाज करा लेंगे। मैं न्यूयॉर्क गया और आज इसी वजह से जीवित हूं।

अटल जी के राष्ट्रवादी विचारों और चिंतन को जब विरोधियों ने सांप्रदायिकता से जोड़कर विषवमन करने का प्रयास किया तो इसका जवाब जनता जनार्दन ने दिया। 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान लखनऊ की सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं ने उनकी सफलता के लिए उनकी दाहिनी भुजा पर इमाम-जामिन अर्थात पवित्र ताबीज बांधा था। भारत में सांप्रदायिक विद्वेष के बहुसंख्यकों पर प्रभाव को लेकर उन्होंने संसद में बेबाकी से सर्वधर्म समभाव को हिंदू धर्म की जन्म घूंटी बताते हुए कहा था कि सहिष्णुता इस देश की मिट्टी में है। ये अनेकांतवाद का देश है और भारत कभी मजहबी राष्ट्र नहीं हो सकता। स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी सामरिक समस्या कश्मीर विवाद को उन्होंने बेहद जिंदादिली से हल करने का प्रयास किया था। ऐसा माना जाता है कि अटलजी इस समस्या के समाधान के बेहद करीब पहुंच गए थे। पाक-भारत के बीच संबंध सामान्य करने की राजनयिक पहल भी शानदार थी। तीन जनवरी 2004 को इस्लामाबाद रवाना होने से पहले उन्होंने अंतिम कार्य जो किया था, वह पाक टेलीविजन को इंटरव्यू देना था। उन्होंने भारत में दूरदर्शन को भी इंटरव्यू दिया था। दरअसल इस इंटरव्यू के जरिए वे भारत और पाक की जनता से सीधे रूबरू हुए और शांति की योजना को जनमानस के सामने रख दिया।

सैन्य तानाशाह परवेज मुशर्रफ भी वाजपेयी की नीतियों के कायल थे। उन्होंने भारत से मजबूत होते संबंधों पर अपनी खुशी का इजहार इस शब्दों में किया था, ‘हमने नई शुरुआत की है।’ पाक के तत्कालीन प्रधानमंत्री मीर जफरुल्ला जमाली ने तो उत्साहित होकर यह भी कह डाला कि भारत-पाक के बीच शांति की कुंजी प्रधानमंत्री वाजपेयी और राष्ट्रपति मुशर्रफ के पास है। यह वह दौर था जब कश्मीर के लोग भी बेहद उत्साहित थे व उम्मीद से भर गए थे। वाजपेयी और मुशर्रफ के बीच वातावरण में सौजन्यता और ताजगी से भारत पाकिस्तान के लोग खुशी और उत्साह से अपने आंसू नहीं रोक पाए। 1999 में जब वे बस से लाहौर गए थे, तब उन्होंने पाक में कविता सुनाई थी जो बहुत पसंद की गई। कविता के बोल थे, ‘हम जंग न होने देंगे, विश्व शांति के हम साधक हैं, हम जंग न होने देंगे। कभी न खेतों में फिर खूनी खाद फलेगी, खलिहानों में नहीं मौत की फसल खिलेगी।’

अटलजी ने सुशासन की कोशिशों में दलीय राजनीति को कभी हावी नहीं होने दिया। सामान्यत सरकारें बदलने के साथ नीतियां भी बदल जाती है लेकिन वाजपेयी अलहदा थे। नरसिम्हा राव ने आर्थिक सुधारों की जो नीति आरंभ की थी, उसे अटल जी ने जारी रखा। वह उसे इसलिए खारिज नहीं करना चाहते थे कि वह कांग्रेस की आर्थिक नीति थी। वे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति इतने प्रतिबद्ध रहे कि अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के भारत आगमन पर अटलजी ने पाक के अपदस्थ प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की रिहाई के लिए से वार्ता की ताकि पड़ोसी देश में प्रजातंत्र की हत्या न हो सके।
डॉ. ब्रहमदीप अलूने (वरिष्ठ पत्रकार)

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