अटलजी नेता नहीं विचारधारा थे

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Atal Bihari Vajpayee

राजएक्सप्रेस, भोपाल। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) हमारे बीच नहीं हैं। मगर उनके विचार हमें सदा प्रेरणा देते रहेंगे। वे अपने जीवन के जरिए हमारे लिए ऐसे उदाहरण पेश करके गए हैं, जिनका अनुसरण कर हम देश और समाज से कटुता और हिंसा को दूर कर सकते हैं।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) अब हमारे बीच नहीं रहे। 93 साल की उनकी जीवन-यात्रा एक ऐसे व्यक्तित्व का सफरनामा है, जिसने अपनी हर सांस के साथ भारतीय सभ्यता, संस्कृति, समाज व राजनीति को जिया, उसमें निर्णायक योगदान दिया। अटलजी सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि पूरी विचारधारा थे, जिसका अनुसरण कर आज भाजपा ही नहीं, विपक्षी दलों के नेता भी अपनी सियासी पारी को आगे बढ़ा रहे हैं। अटलजी का जाना एक युग का अंत है, जिसकी भरपाई आसान नहीं होगी। आज अटलजी हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनके विचार हमारे बीच सदा रहेंगे। हमें उन विचारों पर आगे बढ़ना होगा और समाज तथा देश में पैदा हुए कटुता और हिंसा के माहौल पर काबू पाना होगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति के विरले लोगों में से थे, जिनके व्यक्तित्व का कद उनके पद से हमेशा ऊंचा रहा।

अटलजी बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी, एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ, कुशल प्रशासक, साहित्यकार, कवि व दृढ़ विचारों के जन-जन के नायक थे, जिनके लिए आज भी लोगों में आदर और प्रेम दिखा है। बुधवार रात को स्वास्थ्य को लेकर खबर आने के बाद जिस तरह आम लोगों से लेकर खास लोगों का एम्स पहुंचना शुरू हुआ, वह यही तो साबित करता है। अटलजी का नाम उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक अपने देश में रहने वाले किसी भी शख्स के लिए अनजान नहीं रहा। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के होते हुए भी जब मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री थे तो उन्होंने पहली बार पाकिस्तान की ओर खुलने वाले भारत के दरवाजे को खोल दिया था। पाकिस्तान से आने वाले लोगों के लिए वीजा के नियम न केवल शिथिल किए गए, बल्कि कुछ हद तक बदल भी दिए गए। आज तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोग इस बात को नहीं भूले, क्योंकि दोनों देशों के बहुत से लोगों के रिश्तेदार यहां-वहां दोनों जगह हैं।

देश अटल जी को उनके शब्दों, अभिव्यक्ति और भाषण कला के लिए तो याद करेगा ही, उनकी समझदारी के लिए भी नहीं भूलेगा। अटल जी ने कभी अपने को खांचे में नहीं बांधा, इसीलिए नेहरू जी व शास्त्री जी उन्हें बहुत पसंद करते थे। अटल जी को विपक्ष में नेहरू स्टाइल राजनीति करने वाला भी कहा जाता रहा। पूरे जनसंघ और भाजपा की विचारधारा से सहमत न होने वाले भारत के मुसलमान केवल अटलजी से कुछ नजदीकी महसूस करते रहे। अटलजी कभी कट्टर हिंदुत्व का चेहरा नहीं बने बल्कि भारतीय मानस के उस पक्ष का चेहरा बने जो कहता है कि मैं तुम्हारी बात सुनूंगा, तुम मेरी बात सुनो। अटल जी की कविताएं उनके अंदर के संवेदनशील इंसान का सही दिग्दर्शन कराती हैं। इनमें कभी वह शिखर के सूनेपन की बात करते हैं, तो कभी यह प्रार्थना करते नजर आते हैं कि उन्हें ऊंचाई कितनी भी नसीब हो जाए, पर वह अपनी विनम्रता कभी न छोड़ें।

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