कर्ज माफी से आगे हो ध्यान

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Agriculture Losses India

राज एक्सप्रेस भोपाल। भारत में पिछले दो दशकों से खेती लगातार घाटे (Agriculture Losses India) का सौदा होती गई है। यह बात एक स्टडी में कही गई है। कई दशकों में सरकारों ने कर्ज माफ करने जैसी नीति पर काम तो किया, मगर उन पहलुओं को भूल गईं, जो किसानों की दशा में जबरदस्त सुधार जा सकती थीं।

पिछले कुछ समय से देश में कृषि और किसानों का मुद्दा चर्चा में है। अब इस पर आम सहमति है कि कृषि संकट में है, किसान बदहाल होता जा रहा है, लेकिन यह एकाएक नहीं हुआ है। ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डिवेलपमेंट (ओ ई सी डी) और इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकनॉमिक रिलेशंस (आई सी आर ई आई आर) के एक अध्ययन के मुताबिक भारत में पिछले दो दशकों से खेती लगातार घाटे का सौदा होती गई है। यानी दो दशकों में किसानों की हालत लगातार खराब होती गई है। अध्ययन में शामिल किए गए 26 देशों में भारत के अलावा यूक्रेन और वियतनाम ही हैं जिनके हालात एक जैसे हैं। अध्ययन में कहा गया है कि 2014-16 के दौरान इन तीनों देशों का कृषि राजस्व ऋणात्मक रहा है। कृषि के लाभप्रद न होने के लिए सरकारी नीति को जिम्मेदार ठहराया गया है। कहा गया है कि भारत में मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए अनाज की कीमत कम रखने पर जोर दिया गया, जिससे किसानों को कम कीमत मिली। यही नहीं सरकार ने निर्यात को भी नियंत्रित किया और न्यूनतम समर्थन मूल्य भी अंतरराष्ट्रीय कीमत से कम रखा।

सचाई यह है कि उदारीकरण की नीति अपनाए जाने के बाद से ही किसान प्राथमिकता में नहीं रहे हैं। ज्यादातर नीतियां औद्योगिक विकास को ध्यान में रखकर बनीं। विकास के नाम पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर किया गया है, जिसकी मार किसानों पर पड़ी है। बाहर से जो पूंजी आई वह उद्योग-धंधों और अन्य क्षेत्रों में ही लगी है। कृषि में निवेश नाममात्र का ही हुआ है। हालांकि यह बात कोई भी सरकार स्वीकार नहीं करती है। उसके पास कृषि क्षेत्र को लेकर बड़े-बड़े वादे और नारे रहते हैं। वह किसानों को संतुष्ट करने के लिए उनके कर्ज माफ कर देती है पर कृषि क्षेत्र के लिए जिस बुनियादी बदलाव की जरूरत है, वह नहीं करती। वर्तमान सरकार भी 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा कर रही है, पर यह आसान नहीं है और इससे भी समस्या शायद ही सुलझे।

अभी बिहार में एक किसान की मासिक आय औसतन तीन हजार 558 रुपए तो पश्चिम बंगाल में तीन हजार 980 रुपए है। वहीं पंजाब के एक किसान की मासिक आय 18 हजार 59 रुपए तक होती है। अगर इसे दोगुना भी कर दिया जाए, तो यह आय अन्य छोटी नौकरियों और मामूली कारोबार की तुलना में बेहद कम है। किसानों की आय कम से कम दूसरे पेशों के बराबर हो, तभी वे खेती से संतुष्ट रहेंगे। किसानों को एमएसपी मिले, इसके लिए अनुकूल खरीद नीति की जरूरत है। अब कई राज्यों में व्यवस्थित मंडियां ही नहीं हैं। वहां खरीदारी का समुचित प्रबंध किया जाए। इसके अलावा किसानों के लिए आय का दूसरा जरिया भी उपलब्ध कराना होगा। सरकार को किसानों के कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होगा।

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