कैसे बाहर हों बगैर बुलाए बांग्लादेशी

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Bangladeshi Refugees

राज एक्सप्रेस भोपाल। देश में मुसलमान गर्व से और समान अधिकार से रहे, यह सुनिश्चित करने के बाद इस तथ्य पर आम सहमति बनाना जरूरी है कि ये बाहरी लोग हमारे संसाधनों पर डाका डाल रहे हैं और इनका किसी शांति विशेष से कोई लेना देना नहीं है। भारत में बसे विदेशियों की पहचान और फिर उन्हें वापस भेजना एक जटिल प्रक्रिया है। बांग्लादेश अपने लोगों (Bangladeshi Refugees)की वापसी सहजता से नहीं करेगा। अत: इस मामले में सियासती पार्टियों का संयम भी बेहद जरूरी है।

देश की सुरक्षा एजेंसियों के निशाने पर बांग्लादेशी हैं। उनकी भाषा, रहन-सहन व नकली दस्तावेज इस कदर हमारी जमीन से घुलमिल गए हैं कि अब उन्हें विदेशी सिद्ध करना नामुमकिन हो चुका है। जब- जब हमारे पड़ोसी देशों में अशांति हुई या अंदरूनी मतभेद हुए या कोई प्राकृतिक विपदा आई; वहां के लोग शरण लेने के लिए भारत में घुस आए। ये लोग आते तो दीन हीन याचक बन कर, फिर अपने देशों को लौटने के लिए राजी नहीं होते हैं। आजादी मिलने के बाद से ही हमारा देश ऐसे बिन बुलाए मेहमानों को झेल रहा है। ऐसे लोगों को बाहर खदेड़ने के लिए जब कोई बात हुई, सियासत व वोटों की छीना-झपटी में उलझ कर रह गई। आधार, राष्ट्रीय पहचान पत्र जैसे प्रयोगों में ये घुसपैठिये सेंध लगा चुके हैं। गौरतलब है कि राजस्थान में ऐसे कई हिंदू हैं जो कि पाकिस्तान से हमारे यहां आ कर अवैध रूप से रह रहे हैं और उनको ध्यान में रख कर सरकार अवैध प्रवासियों के बारे में किसी दोहरी नीति पर विचार कर रही है। असम में भी विदेशियों को बाहर करने की पूरी प्रक्रिया में धर्मगत भेदभाव विवाद का कारण बना हुआ है।

आज जनसंख्या विस्फोट से देश की व्यवस्था लडखड़ा गई है। अब मूल नागरिकों के सामने भोजन, निवास, सफाई, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव गंभीर होता जा रहा है। तब लगता है कि शरणार्थी बन कर आए या घुसपैठिये  करोड़ों विदेशियों को बाहर निकालना ही श्रेस्कर होगा। हमारे देश में बसे विदेशियों का महज 10 फीसदी ही वैध है। शेष लोग कानून को धता बता कर भारतीयों के हक नाजायज तौर पर बांट रहे हैं। ये लोग यहां के बाशिंदों की रोटी तो छीन ही रहे हैं, देश के सामाजिक व आर्थिक समीकरण को भी गड़बड़ा रहे हैं और अब तो कई गंभीर अपराधों में विदेशियों के शामिल होने से आंतरिक सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है।

अनुमान है कि आज दस करोड़ के करीब बांग्लादेशी हमारे देश में जबरिया रह रहे हैं। 1971 की लड़ाई के समय लगभग 70 लाख बांग्लादेशी (उस समय का पूर्वी पाकिस्तान) इधर आए थे। अलग देश बनने के बाद कुछ लाख लौटे भी। पर उसके बाद भुखमरी, बेरोजगारी के शिकार बांग्लादेशियों का हमारे यहां घुस आना अनवरत जारी रहा। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार व त्रिपुरा के सीमावर्ती जिलों की आबादी हर साल बेतहाशा बढ़ रही है। नादिया जिला (प.बंगाल) की आबादी 1981 में 29 लाख थी। 1986 में यह 45 लाख, 1995 में 60 लाख और आज 65 लाख को पार कर चुकी है । बिहार में पूर्णिया, किशनगज, कटिहार और सहरसा आदि जिलों की जनसंख्या में अचानक वृद्धि का कारण बांग्लादेशियों की अचानक आमद ही है। असम में 50 लाख से अधिक विदेशियों के होने पर सालों खूब खूनी राजनीति भी हुई।

सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के बाद विदेशी नागरिक पहचान कानून को लागू करने में राज्य सरकार का ढुलमुल रवैया नए तनाव भी पैदा कर सकता है। अरुणाचल प्रदेश में मुस्लिम आबादी में बढ़ोतरी सालाना कुल 135.01 प्रतिशत है, जबकि यहां की औसत वृद्धि 38.63 है। इसी तरह पश्चिम बंगाल की जनसंख्या बढ़ोतरी की दर औसतन 24 फीसदी के आसपास है, पर मुस्लिम आबादी का विस्तार 37 प्रतिशत से अधिक है। यही हाल मणिपुर और त्रिपुरा का भी है। जाहिर है कि इसका मूल कारण बांग्लादेशियों का निर्बाध रूप से आना, यहां बसना और निवासी होने के कागजात हासिल करना है। कोलकता में तो अवैध बांग्लादेशी बड़े स्मगलर और बदमाश बन कर व्यवस्था के सामने चुनौती  बने हुए हैं। दिल्ली में सीमापुरी हो या यमुना पुश्ते की कई किमी में फैली झुग्गियां, लाखों बांग्लादेशी डटे हुए हैं। ये भाषा, खानपान, वेशभूषा के कारण स्थानीय बंगालियों से घुलमिल जाते हैं। इनकी बड़ी संख्या इलाके में गंदगी, बिजली और पानी की चोरी ही नहीं, बल्कि डकैती, चोरी, जासूसी तथा हथियारों की तस्करी बेखौफ करते हैं। सीमावर्ती नोएडा व गाजियाबाद में भी इनका आतंक है। इन्हें खदेड़ने के कई अभियान चले। कुेछ सौ लोग गाहे-बगाहे सीमा से दूसरी ओर ढकेले भी गए, पर बांग्लादेश अपने ही लोगों को अपनाता नहीं है। फिर वे कुछ ही दिन बाद यहां लौट आते हैं।

जानकर अचरज होगा कि बांग्लादेशी बदमाशों का नेटवर्क इतना सशक्त है कि वे चोरी के माल को हवाला के जरिए उस पार भेज देते हैं। दिल्ली व करीबी नगरों में इनकी आबादी 10 लाख से अधिक है। सभी नाजायज बाशिंदों के आका सियासी पार्टियों में हैं। इसीलिए इन्हें खदेड़ने के हर बार के अभियानों की हफ्ते-दो हफ्ते में हवा निकल जाती है। सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ की मानें तो भारत-बांग्लादेश सीमा पर स्थित आठ चेक पोस्टों से हर रोज कोई 6400 लोग वैध कागजों के साथ सीमा पार करते हैं और इनमें से 4480 वापस नहीं जाते। औसतन हर साल 16 लाख बांग्लादेशी भारत की सीमा में आ कर यहीं के हो कर रह जाते हैं। सरकारी आंकड़ा है कि सन 2000 से 2009 के बीच एक करोड़ 29 लाख बांग्लादेशी बाकायदा पासपोर्ट-वीजा लेकर भारत आए और वापस नहीं गए। असम तो अवैध बांग्लादेशियों की पसंदीदा जगह है। सन 1985 से अभी तक महज 3000 अवैध अप्रवासियों को ही वापस भेजा जा सका है। अदालतों में अवैध निवासियों की पहचान और उन्हें वापस भेजने के कोई 40 हजार मामले लंबित हैं। अवैध रूप से घुसने व रहने वाले स्थानीय लोगों में शादी करके यहां अपना समाज बना-बढ़ा रहे हैं।

भारत में बस गए करोड़ों से अधिक विदेशियों के खाने-पीने, रहने, सार्वजनिक सेवाओं के उपयोग का खर्च न्यूनतम पच्चीस रुपए रोज भी लगाया जाए तो यह राशि सालाना किसी राज्य के कुल बजट के बराबर हो जाएगी। जाहिर है कि देश में उपलब्ध रोजगार के अवसर, सब्सिडी वाली सुविधाओं पर से इन बिन बुलाए मेहमानों का नाजायज कब्जा हटा दिया जाए तो भारत की मौजूदा गरीबी रेखा में खासा गिराव आएगा। इन घुसपैठियों की जहां भी बस्तियां होती हैं, वहां गंदगी और अनाचार का बोलबाला होता है। ये लोग पलायन से उपजी अस्थिरता के कारण जीवन से निराश होते हैं। इन सबका विकृत असर हमारे सामाजिक परिवेश पर भी बड़ी गहराई से पड़ रहा है। पड़ोसी देशों से हमारे ताल्लुकात इन्हीं घुसपैठियों के कारण तनावपूर्ण भी हैं। इस तरह ये विदेशी हमारे सामाजिक, आर्थिक और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं को आहत कर रहे हैं।

दिनों-दिन गंभीर हो रही समस्या से निबटने के लिए सरकार तत्काल ही कोई अलग से महकमा बना ले तो बेहतर होगा, जिसमें प्रशासन, पुलिस के अलावा मानवाधिकार व स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग भी हों। साथ ही सीमा को चोरी-छिपे पार करने के रैकेट को तोड़ना होगा। वैसे तो हमारी सीमाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन यह अब किसी से छिपा नहीं है कि बांग्लादेश व पाक सीमा पर मानव तस्करी का धंधा चल रहा है, जो कि सरकारी कारिंदों की मिलीभगत के बगैर असंभव है। इस समस्या को किसी संप्रदाय के विरुद्ध नहीं अपितु देश के लिए खतरे के रूप में लेने की इच्छा शक्ति का प्रदर्शन करना होगा।

डॉ. पंकज चतुर्वेदी (स्वतंत्र टिप्पणीकार) 

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