हिंदू पाकिस्तान की उन्मादी हुंकार

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Shashi Tharoor

राज एक्सप्रेस भोपाल। जिन्ना ने मुस्लिमों के पिछड़ेपन को हथियार बनाकर पाकिस्तान का सपना साकार किया था जबकि आजादी के बाद भारत के सियासी दलों ने मुस्लिम वोट बैंक पर प्रभाव बनाए रखने के लिए उन्हें भय के बाहुपाश में जकड़े रखने से गुरेज नहीं किया। भारत में मुस्लिमों के जीवन में पाकिस्तान की अपेक्षा खास बदलाव आने के बाद भी सियासी दल अपनी सोच से बाहर आने को तैयार नहीं हैं। हाल ही में कांग्रेस नेता शशि थरूर (Shashi Tharoor)की टिप्पणी को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए।

सियासत का उन्माद सहिष्णु समाज को कट्टरता के कलेवर में ढालकर कभी भी हाहाकार मचा सकता है। जिन्ना इस खेल के एक माहिर खिलाड़ी रहे और उन्होंने अपने अल्पकालीन सियासी हितों के लिए पाकिस्तान को अल्पसंख्यकों का कब्रिस्तान बना दिया। वहीं गांधीजी अपने देश की स्थापना मानवीय मूल्यों पर आधारित रखना चाहते थे। विभाजन के 71 साल बाद जोडऩे और तोडऩे की नीतियों के परिणाम सामने हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा और कामयाब लोकतंत्र है जबकि पाकिस्तान पस्त और बदहाल है। दरअसल भारतीय सियासत के इस बदलते दौर में कथित धर्मनिरपेक्षता को अपने अपने सांचे में ढालने और उसके सियासी फायदे लेने की हसरतें बेलगाम हो चली हैं। इसमें शशि थरूर जैसे शख्स भी शामिलहैं, जिनमें भारतीय लोकाचार की पवित्रता को समझने की शक्ति भले ही न हो लेकिन वे सांप्रदायिक सरोकारों से सत्ता में बने रहने के लिए अवश्य प्रतिबद्ध नजर आते हैं। यह ठीक वैसा ही है जिसका प्रयोग जिन्ना ने किया था और सफल भी हुए थे।

जिन्ना ने मुस्लिमों के पिछड़ेपन को हथियार बनाकर पाकिस्तान का सपना साकार किया था जबकि आजादी के बाद भारत के सियासी दलों ने मुस्लिम वोट बैंक पर प्रभाव बनाए रखने के लिए उन्हें भय के बाहुपाश में जकड़े रखने से गुरेज नहीं किया। भारत के विभाजन की कवायद के बीच एक अमेरिकी पत्रकार ने गांधीजी से पूछा था कि कांग्रेस की सरकार को जिन्ना स्वीकार नहीं करेंगे, मिस्टर जिन्ना कहते हैं कि मुसलमान हिंदू हुकूमत स्वीकार नहीं करेंगे इस सूरत में आजाद भारत का क्या मतलब होगा? महात्मा का जवाब था ‘मैंने अंग्रेजों से यह नहीं कहा है कि वह भारत को कांग्रेस या हिंदुओं के हवाले कर दें वे चाहें तो भारत को भगवान भरोसे भी छोड़ सकते हैं, जिसे आधुनिक शब्दावली में अराजकता कहते हैं। इस सूरत में सारी पार्टियां या तो एक दूसरे के खिलाफ कुत्तों की तरह लड़ेंगी या हो सकता है कि जिम्मेदारी आ पडऩे पर एक वाजिब समझौते पर पहुंच जाएं।

जिन्ना की बहिष्कार की राजनीति के बीच भारत की  संविधान सभा का गठन हुआ, जिसका प्रथम अधिवेशन 9 दिसंबर 1946 को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में प्रारंभ हुआ। 11 दिसंबर 1946 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष बनाए गए, वहीं 13 दिसंबर 1946 को संविधान निर्माण की दिशा में पहला कदम बढ़ाते हुए पंडित जवाहरलाल लाल नेहरू ने उद्देश्य प्रस्ताव रखते हुए कहा मैं आपके सामने जो प्रस्ताव प्रस्तुत कर रहा हूं उसमें हमारे उद्देश्यों की व्याख्या की गई है, योजना की रूपरेखा दी गई है और बताया गया है की हम किस रास्ते पर चलने वाले है।

13 दिसंबर से 19 दिसंबर 1946 तक कुल आठ दिन संविधान सभा ने उद्देश्य प्रस्ताव पर विचार विमर्श किया। अंतत: सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से इसे पास कर दिया। इस उद्देश्य प्रस्ताव में भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के साथ विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की प्रतिज्ञा से यह साफ कर दिया गया कि भारत की पहचान धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में ही होगी। तमाम विरोधाभास व जिन्ना की राजनीतिक पृथकतावाद के बाद भी भारत देश का धर्मनिरपेक्ष बना रहना मानवीयता की महान घटना से ही संभव हुआ था। इस बीच कभी कभी गांधी भी सांप्रदायिक ताकतों से विचलित हो जाया करते थे।

द हिंदू के संवाददाता  से बात करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था कि वक्त एक बेरहम दुश्मन है। मैं इस सवाल से जूझता रहा हूं कि आखिर मैंने और सारे लोगों ने मिलकर सच्चे दिल से जो प्रयास किए उनके बावजूद एकता की कोशिशें नाकाम रहीं। ये कोशिशें इस कदर नाकाम रहीं कि मेरी गरिमा का भी पूरी तरह क्षय हो गया और कुछ मुसलमान अखबारों ने मुझे भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन तक करार दे दिया। मैं इस परिघटना की वजह केवल एक ही बता सकता हूं कि तीसरी ताकत जानबूझकर कोशिश न भी करे तो भी सच्ची एकता नहीं होने देगी। इसलिए नतीजे के तौर पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि ब्रिटिश सत्ता का जैसे ही अंत होगा दोनों समुदायों में एकता आ जाएगी।

1947 के बाद भारत में अल्पसंख्यक जहां समानता के अधिकार से देश के हमकदम बने वहीं पाक अल्पसंख्यकों के लिए नर्क बन गया। दुनिया भर में अल्पसंख्यकों के लिए नर्क के नाम से पहचाने जाने वाले पाकिस्तान में देश की स्थापना के 71वें साल 2017 में हिंदुओं को विवाह पंजीयन की मान्यता मिली तो अंतिम सांसे गिनते हिंदुओं के कुछेक परिवारों की आंखों में अचानक संभावना जागी कि शायद अब उनकी बेटियों का अपहरण नहीं होगा और न ही बलात उनकी शादी करवाई जाएगी। मानव अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्थाओं ने भयावहता सामने लाते हुए साफ किया है की पाक में हर साल 10 हजार हिंदू लडकियों का अपहरण कर इस्लाम धर्म परिवर्तन कर निकाह कर दिया जाता है। किसी देश के नागरिकों के साथ इतना घिनौना मजाक कुछ और नहीं हो सकता कि आबादी का 25 प्रतिशत अल्पसंख्यक तबका नीति निर्माताओं की बातों पर भरोसा करके द्विराष्ट्रवाद के जानलेवा सिद्धांत के बाद भी उसी देश में रहना स्वीकार कर ले। किसी देश के मूल निवासियों पर अत्याचार का ऐसा अंतहीन सिलसिला और कहीं इतिहास में नहीं है कि जब दुनिया की आबादी में 50 गुना की वृद्धि हो वहीं हिंदुओं की आबादी 70 सालों में घटकर एक प्रतिशत तक आ जाए।

जिन्ना के बाद भी सत्ता पर काबिज पाक के नीति निर्माताओं ने जानबूझकर हिंदुओं के मानवाधिकारों को नजरअंदाज किया। विभाजन के बाद ही वहां रहने वाले हिंदुओं की हत्या बड़े पैमाने पर की गई, महिलाओं का अपहरण कर उन्हें सेक्स गुलाम बनाया गया, संपत्ति लूटकर उन्हें बदहाल व बेकार कर दिया गया। वहीं भारत में मुसलमानों की आबादी अब बढ़कर 21 करोड़ के करीब पहुंच गई और उन्हें ठीक वैसे ही अधिकार प्राप्त हैं जैसे अन्य किसी आम भारतीय को। वे देश के सर्वोच्च पदों से लेकर देश के नीति निर्माता बने हुए हैं, लेकिन स्वतंत्र भारत की यह भी बदतरीन सच्चाई रही कि अधिकांश सरकारों ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमानों को मध्यकालीन नियमों में बांध कर रखा और उन्हें वोट बैंक की तरह उपयोग किया। इस कारण मुसलमान विकास दे दूर होकर गरीबी और पिछड़ेपन का शिकार हो गए।

इस समय की मोदी सरकार उन परंपरागत नीतियों को दरकिनार कर मुस्लिम विकास के लिए तीन तलाक और हलाला जैसे भेदभावपूर्ण कानून को खत्म करना चाहती है। इन बदलावों से सहमे हुए लोग  सियासी कारणों से अपने हित संवर्धन करना चाहते हैं। शशि थरूर का भारत को अल्पसंख्यकों के लिए पाकिस्तान बताने का प्रयास जिन्ना की कुत्सित सोच का ही एक हिस्सा है, जो भय दिखाकर पृथकतावाद को बढ़ावा देते हैं। शशि और उनके जैसे लोगों को इस सोच से बाहर आकर फिजूल की बात करने से बचना चाहिए।
डॉ. ब्रहमदीप अलूने (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)

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