पीडीपी से अलगाव सही फैसला

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BJP-PDP Coalition

राजएक्सप्रेस, भोपाल। भाजपा-पीडीपी गठबंधन (BJP-PDP Coalition)सरकार के गठन के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। इस आशंका के मुताबिक हुआ भी वही। इस फैसले को भाजपा का साहसिक फैसला बताया जा रहा है। अब जबकि भाजपा ने पीडीपी से नाता तोड़ लिया है, तो अब कश्मीर घाटी में फिर से आतंकवाद की कमर तोड़ने के मिशन को तेज करना होगा। इसके साथ ही सरकार में रहते भाजपा से जो भी गलतियां हुई हैं, उन्हें जल्द से जल्द दूर करना होगा।

भाजपा-पीडीपी गठबंधन सरकार के गठन के बाद से ही कयास लगाए जा रहे थे कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। इस आशंका के मुताबिक हुआ भी वही। दरअसल, भाजपा अपने जिस फार्मूले के तहत घाटी में काम करना चाहती थी, पीडीपी उसमें शुरू से ही अडंगा अड़ा रही थी। इस लिहाज से भाजपा ने उससे अलग होना ही मुनासिब समझा। सरकार से अलग होने का भाजपा का फैसला देशहित के तौर पर देखा जा रहा है। दहशतगर्दो और पीडीपी को एक बात का अहसास हो गया था कि भाजपा के सरकार में रहते उनके मंसूबे कामयाब नहीं होंगे। इन तीन सालों में भाजपा ने अपने बूते वहां सालों से पनप रहे आतंकवाद की कमर तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। देश को विखंडित और तोड़ने वाली जिन ताकतों पर भाजपा चाबुक चला रही थी उसे सहयोगी पार्टी पीडीपी रोक रही थी। जब से जम्मू में सरकार बनी तभी से तकरीबन सभी जांच एजेंसियों ने वहां डेरा डाला हुआ था। अजीत डोभाल नए मिशन पर काम कर रहे थे जिससे आतंकियों का सफाया होना निश्चित था। इस बाबत जब महबूबा से बात की गई तो उन्होंने ऐसा न करने की बात कही। दरअसल पीडीपी चाहती ही नहीं है जम्मू से आतंक का पूरी तरह से सफाया हो। क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनकी ताकत तो खत्म होगी ही, साथ ही उनकी राजनीति पर भी प्रश्नचिह्न् लग जाएगा।

खैर, देर आए दुरुस्त आए। कश्मीर की राजनीतिक सत्ता में मंगलवार को आए भूचाल के कई कारण और भी माने जा रहे हैं। राजनीतिक जानकार एक बात ठीक से जानते है कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ सत्ता में उनकी समकक्ष भाजपा से रिश्ते एकदम से खराब नहीं हुए। दोनों दलों के बीच आग पिछले कई महीनों से सुलग रही थी। वह अलग बात है जोर का धमाका 19 तारीख को होना तय हुआ। भाजपा ने पीडीपी से अलग होने के पीछे सियासी लाभ लेने की नहीं सोची, बल्कि उसके इस फैसले को देशहित में सही समय पर उठाया गया सटीक कदम कहा जाएगा। भाजपा ने घाटी में अमन-शांति के लिए जो योजनाएं बनाई थीं उन सभी में महबूबा द्वारा आपत्ति दर्ज करना भाजपा के लिए बेहद असहनीय होने लगा था। पत्थरबाजों पर कार्रवाई करना भी उसे ज्यादा अखर रहा था। कुल मिलाकर पीडीपी का भाजपा को साफ कहना था कि प्रदेश में जो भी कुछ होगा उनकी अनुमति और इजाजत से होगा। इस लिहाज से दोनों का इस तल्खी के बीच साथ बने रहना मुश्किल ही था।

भाजपा-पीडीपी के बीच तलाक होने के कुछ और भी कारण रहे। पहला कारण आतंकवादियों के खिलाफ सेना की कार्रवाई में अड़चन पैदा करना। दूसरा कारण पीडीपी द्वारा पत्थरबाजों को मासूम बताकर उन्हें आजाद कराना। तीसरा, समर्थक दल भाजपा की नीतियों की पूरी तरह से अनदेखी करना। चौथा कारण, जम्मू क्षेत्र के विकास की तरफ महबूबा सरकार का ध्यान न देना और पांचवा सबसे बड़ा कारण कठुआ गैंगरेप मामले की जांच के लिए एसआईटी टीम का गठन करना। भाजपा ने महबूबा सरकार को तलाक देने में पांचवा कारण प्रमुखता से नहीं गिनाया है। राजनीतिक विस्फोट की आखिरी चिंगारी कठुआ में नाबालिग से गैंगरेप का शोर देश से विदेश तक खूब गूंजा था। कठुआ मामले से ही दोनों दलों के बीच तल्खियां बढ़ गई थीं। राम माधव ने मामले को शांत करने में पूरी कोशिश की, अंतत: वहीं हुआ जिसका अंदेशा था। प्रदेश में एक बार फिर से राज्यपाल शासन लग गया है। सरकार गिरने के बाद जम्मू में एक फिर से वहां हालात खराब होने का संदेह जताया जाने लगा है।

बहरहाल, अप्रत्याशित घटनाक्रम के बाद भाजपा ने महबूबा सरकार को गिराकर प्रदेश में राज्यपाल शासन लगवा दिया। राज्यपाल शासन लगाने के सिवाय दूसरा कोई रास्ता इसलिए भी नहीं था कि राज्य में मौजूदा राजनीतिक गणित के चलते किसी गठबंधन सरकार बनने की संभावना न के बराबर ही है। नेशनल कान्फ्रेंस के कार्यकारी अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला के पीडीपी को समर्थन न देने तथा कांग्रेस द्वारा भी सरकार बनवाने में किसी भूमिका से इंकार के बाद राज्य में अंतिम विकल्प राज्यपाल शासन ही रह गया था। दरअसल, रमजान के दौरान सरकार द्वारा घोषित एकतरफा संघर्ष विराम तथा उसके प्रति अलगाववादियों के नकारात्मक रवैये के बाद भाजपा ऊहापोह की स्थिति में थी। फिर रमजान के दौरान ही अलगाववादियों द्वारा एक वरिष्ठ पत्रकार की हत्या व अप्रत्याशित हिंसा तथा एलओसी पर पाकिस्तान द्वारा लगातार संघर्ष विराम के उल्लंघन के बाद भाजपा असहज महसूस कर रही थी। ईद के अगले दिन से ही ऑपरेशन ऑल आउट शुरू किए जाने से पीडीपी खफा थी। अगर सरकार से भाजपा हाथ नहीं खींचती तो देर-सबेर पीडीपी ही ऐसा करती, जिसके पीछे का मुख्य कारण कश्मीरी जनमानस की सद्भावना बटोरना होता। महबूबा की मंशा को भांपते हुए भाजपा ने पहले बाजी मार ली और राज्यपाल को अपने मंत्रियों के इस्तीफे भेजकर समर्थन वापस ले लिया। भाजपा के इस अप्रत्याशित फैसले से पीडीपी भी सकते में है।

वैसे भी यह गठबंधन एक अस्वाभाविक गठजोड़ ही था, जिसमें कश्मीर के प्रमुख मुद्दों को लेकर दोनों दलों में मतभेद था, जिसमें सेना के विशेषाधिकार, अनुच्छेद-370, 35-ए आदि प्रमुख हैं। फिर भी जैसे-तैसे गठबंधन को बनाए रखने की कोशिश की गई। कठुआ कांड को लेकर भी दोनों दलों में तीखे मतभेद उभरे थे, जिसके बाद भाजपा को अपने उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों के इस्तीफे लेने पड़े थे। राजनीतिक पंडित इसे केंद्र की कश्मीर नीति की विफलता के तौर पर देखते हैं जो इसे 2019 के आम चुनाव के नजरिये से लिया गया कदम बताते हैं। खैर, वह तो वक्त ही तय करेगा कि इससे भाजपा को कितना लाभ और पीडीपी को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा। कहा यह भी जा रहा है कि भाजपा ने महबूबा मुफ्ती की पीडीपी सरकार से अचानक समर्थन वापस लेने का जो फैसला किया है, उसकी वजह राज्य की राजनीति नहीं, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के बाकी हिस्सों में अपना वोट बेस संभालने की सोच है।

जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजों, अलगाववादियों, पाक और कई अन्य मुद्दों को निपटने के तौर-तरीकों पर पीडीपी के साथ हो रहे गंभीर मतभेदों को लेकर भाजपा रोज-रोज की किचकिच से परेशान थी। भाजपा कश्मीर घाटी में आतंकवाद से निपटने के लिए कठोर रुख अपनाना चाहती थी। इस फैसले से लोकसभा चुनाव सहित आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा को फायदा हो सकता है। भाजपा की वैचारिक संरक्षक आरएसएस भी कश्मीर में पीडीपी से गठबंधन तोड़ने और सख्ती करने के पक्ष में थी। भाजपा इस मसले से निपटने के तौर-तरीकों को स्थानीय और अंतराष्ट्रीय मंच पर सही तरीके से पेश करने की पूरी कोशिश की है। इन सबके बीच महबूबा की उस बात पर भी गौर कर लेना जरूरी होगा, जिसमें वह कह रही हैं कि हमने एक खास एजेंडे के लिए सरकार बनाई थी और वह पूरा हो गया है। अलगाववादियों व पत्थरबाजों की तरफदारी की ओर तो इशारा नहीं है।
रमेश ठाकुर (वरिष्ठ पत्रकार)

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