सीजफायर बना ‘आतंकियों की ईद’

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Jammu Kashmir Ceasefire

राजएक्सप्रेस, भोपाल। अब केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर में जारी सीजफायर (Jammu Kashmir Ceasefire)भले ही समाप्त कर दिया हो, मगर इस फैसले की समीक्षा उसे जरूर करनी चाहिए। ताकि भविष्य में फिर कोई दूसरा मुख्यमंत्री अलगाववादियों की रहनुमाई करते हुए इस तरह का आदेश न लागू करा पाए। जम्मू-कश्मीर में सीजफायर का आतंकियों ने किस कदर फायदा उठाया, यह किसी से छिपा नहीं है। अब जबकि सेना को फिर से छूट मिल गई है, तो पड़ोसी मुल्क से एक के बाद एक गिनकर हिसाब लेना चाहिए।

रमजान व अमरनाथ यात्रा को देखते हुए सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में किया गया सीजफायर (Siegefire) खत्म कर दिया गया है। पिछले महीने जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-भाजपा संयुक्त सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती द्वारा भारतीय सेना से एकतरफा सीजफायर करने के अनुरोध किया गया था। केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को स्वीकार तो कर लिया परंतु देश व कश्मीरवासियों को इस सीजफायर की भारी कीमत चुकानी पड़ी है। क्या राज्य की जिस जनता की आजादी, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता, उनकी शांति तथा रमजान के दौरान दिन-रात की जाने वाली इबादतों के मद्देनजर सरकार द्वारा सेना को आतंकियों के विरुद्ध कोई बड़ी कार्रवाई न करने का जो निर्देश ‘सीजफायर’ के रूप में दिया गया था उसके सकारात्मक परिणाम मिले भी हैं? या फिर यह एकतरफा सीजफायर की कवायद कश्मीरवासियों के लिए तथा भारतीय सेना के लिए एक घाटे का सौदा साबित हुई जबकि आतंकियों द्वारा इस एकतरफा सीजफायर का एकतरफा फायदा उठाया गया और यह ‘आतंकियों की ईद’ ही साबित हुआ?

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में भी इसी प्रकार का एक प्रयोग कश्मीर में किया गया था। परंतु उस समय भी आतंकी अपनी हिंसापूर्ण कार्रवाईयों से बाज नहीं आए थे। इस बार भी पवित्र रमजान में जहां भारतीय सेना ने तथा राज्य व केंद्र की सरकार ने सामूहिक रूप से आतंकवादियों के प्रति नरमी बरतने का जो सद्भावपूर्ण फैसला किया आतंकियों ने संभवत: उसे सेना और सरकार की कमजोरी समझा और अपनी नापाक हरकतों को रमजान के लगभग पूरे महीने जारी रखा। कश्मीरी अलगाववादियों व आतंकवादियों की इस कार्रवाई में सीमापार पाकिस्तान की ओर से भी भरपूर मदद की जा रही थी। नतीजतन पूरे महीने में घुसपैठ की कई घटनाएं घटीं। पाक द्वारा सीमा पर कई बार गोलीबारी की गई, सीमावर्ती गांवों के रहने वाले सैकड़ों लोगों को रमजान में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। कई भारतीय जवान शहीद हुए व कई बेगुनाह नागरिकों की जानें गईं। आखिरकार रमजान के महीने का समापन कश्मीर घाटी के एक वरिष्ठ, प्रसिद्ध एवं निष्पक्ष पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या के साथ हुआ। शुजात बुखारी के साथ आतंकवादियों ने उनके सहयोगी दो पुलिस कर्मियों की भी हत्या कर दी।

सवाल यह है कि एक ओर तो जहां इसी ईद के दौरान दुनिया के सबसे बड़े आतंकी संगठन समझे जाने वाले तालिबानों ने अफगानिस्तान में चल रहे इसी प्रकार के संघर्ष विराम को सम्मान देते हुए वहां ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि राष्ट्रपति अशरफ गनी ने संघर्ष विराम की समय सीमा को और अधिक बढ़ाए जाने की घोषणा कर दी है तथा तालिबानों से भी राष्ट्रपति गनी ने ऐसी ही अपील की है। अफगानिस्तान सरकार द्वारा कई तालिबानी आतंकियों को वहां की जेलों से भी रिहा कर दिया गया है। और तो और गत् दिवस मनाई गई ईद में अफगान सैनिक और तालिबानी आतंकी जो कभी एक-दूसरे के खून के प्यासे दिखाई देते थे वही एक-दूसरे से गले मिलते और ईद की मुबारकबाद का आदान-प्रदान करते हुए देखे गए। वहीं आखिर भारतवर्ष की कश्मीर समस्या या कश्मीर में फैला आतंकवाद क्या तालिबानी आतंकी विचारधारा से भी ज्यादा खतरनाक रूप धारण कर चुका है?

बड़े आश्चर्य की बात है कि अफगानिस्तान, सीरिया, इराक तथा यमन जैसे देशों की हालत देखने के बावजूद मुट्ठीभर आतंकी तथा उनको भड़काने वाले चंद स्वार्थी अलगाववादी नेता यह नहीं समझ पाते कि यदि भारतीय सेना द्वारा भी आतंकियों के विरुद्ध दमनात्मक कार्रवाई एकतरफा तरीके से की गई, ऐसे में वहां के आम आदमियों को कितनी परेशानी का सामना उठाना पड़ सकता है। उन्हें इस बात का भी अहसास नहीं कि दमनात्मक सैनिक कार्रवाई का कश्मीर के सौंदर्य, वहां के पर्यटन तथा लोगों के जनजीवन, शिक्षा स्वास्थ्य, व्यवसाय आदि पर कितना विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। वे यह भी नहीं समझ पाते कि उन्हें भड़काने तथा उकसाने वाला उनका कथित शुभचिंतक पाकिस्तान स्वयं अपने ही देश में किस प्रकार से आतंकवाद का शिकार है? कई राजनीतिक विश्लेषक इस बात का संदेह जता चुके हैं कि पाक अपने अंतर्विरोधों के चलते तथा वहां के अनेक सत्ता केंद्र होने के नाते लगभग बिखरने की कगार पर खड़ा हुआ है और इन्हीं अलग-अलग सत्ता केंद्रों ने पूरे पाकिस्तान में आतंकवाद को फलने-फूलने का ऐसा मौका उपलब्ध कराया है, जिससे पाक को पूरी दुनिया आतंकवाद के एक बड़े उत्पादक देश के रूप में देख रही है। क्या ऐसा पाकिस्तान इन कश्मीरी अलगाववादियों व आतंकवादियों की किसी प्रकार की दूरगामी सहायता कर पाने की स्थिति में है? सिवाय इसके कि वह धर्म के नाम पर कश्मीर के बेरोजगार, गरीब युवाओं को बरगलाता रहे।

पत्रकार शुजात बुखारी निश्चित रूप से ऐसे पत्रकार नहीं थे जो कश्मीर की अवाम का पक्ष न रखते हों। या फिर कश्मीर में होने वाली सैन्य ज्यादतियों पर आंखें बंद रखते हों। वे वास्तव में एक निष्पक्ष व निडर पत्रकार थे जो अपने पेशे को पूरी ईमानदारी के साथ अंजाम देना जानते थे और दे रहे थे। एक पत्रकार के रूप में कश्मीर में उनकी कितनी लोकप्रियता थी और उनकी शहादत के बाद कश्मीर की अवाम ने उसे किस रूप में देखा यह बुखारी की उस शव यात्र से स्वयं साबित हो जाता है जिसमें हजारों की भीड़ उनके जनाजे में शरीक होकर मातमपुरसी कर रही थी। कौन कश्मीरी या कौन मुसलमान या कौन सा इंसान शुजात बुखारी की ईद से एक दिन पूर्व व रमजान के आखिरी रोजे के इफ्तार के वक्त से चंद मिनट पहले होने वाली इस हत्या को जायज ठहराएगा? शुजात बुखारी के परिजनों तथा कश्मीर के शांतिप्रिय लोगों ने कभी सोचा नहीं होगा कि कश्मीर में सेना द्वारा रमजान में घोषित किए गए संघर्ष विराम का इतना बड़ा खामियाजा कश्मीर के लोगों को भुगतना पड़ेगा।

कहा जा सकता है कि जहां सरकार ने राज्य सरकार के एकतरफा सीजफायर करने के निवेदन को स्वीकार कर अपनी ओर से यह दर्शाने की कोशिश की कि भारत कश्मीर में शांति बहाली के लिए हर प्रकार के जोखिम उठाने को तैयार है और निश्चित रूप से सरकार को अपने इस फैसले का खामियाजा भी भुगतना पड़ा है। वहीं यह भी साफ हो गया है कि आतंक की राह पर चलने वाले लोग न तो रमजान की पाकीजगी को समझने की क्षमता रखते हैं न ही उन्हें अल्लाह, इस्लाम तथा धार्मिक शिक्षाओं की कोई परवाह है। संभवत: सेना द्वारा सीजफायर के रूप में उनके प्रति बरती गई नरमी आतंकवादियों के लिए तो ईद साबित हुई जबकि रमजान के महीने में शहीद होने वाले भारतीय सैनिकों, राज्य के पुलिस कर्मियों, शुजात बुखारी के परिजनों तथा रमजान में मारे गए बेगुनाह लोगों के परिवार के लिए यह महीना मोहर्रम जैसे किसी शोकपूर्ण महीने से कम नहीं रहा। लिहाजा सरकार को आतंकवाद का जवाब उसी की भाषा में देने की जरूरत है। शांति पड़ोसी मुल्क को अच्छी नहीं लगती।
तनवीर जाफरी (वरिष्ठ पत्रकार)

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