रिश्ते बड़े ही नाज़ुक होते है। एक ओर तो इतने मजबूत की रिश्तों (Relationships) के लिए जान तक दे दी जाती है। वही एक ओर इतने कमजोर की एक छोटी सी बात पर रिश्तों (Relationships) की डोरी टूट जाती है। वो कौनसी परिस्थितियाँ होती है जो व्यक्ति को कभी मजबूत तो कभी इतना कमजोर बना देती है कि, उनका खुद पर कोई बस ही नहीं चलता इसलिए रिश्तों (Relationships) को सँभालते-सँभालते वो खुद को ही संभालना भूल जाते है और यही से शुरुआत होती है रिश्तों (Relationships) की नाकामी की। रिश्तों ( Relationships ) को संभालना है तो पहले खुद को संभालना सीखिए।

व्यक्ति को जीवन में रिश्तों (Relationships) का सही महत्व पता होना अनिवार्य होता है। उन्हें यह समझना ज़रूरी है कि, किसी भी रिश्ते को निभाने से पहले वो स्वयं के मन को समझे उसको जाने और खुद से पूछी कि क्या वो किसी भी रिश्ते को निभाने के लिए मानसिक रूप से तैयार है। क्या वो रिश्तों में भावनात्मक गहराई समझते है ?

अक्सर ऐसा देखा गया है कि, कुछ लोग तो भावना भी नहीं समझते और कुछ ऐसे होते है की वो भावना की गहराई में डूबते जाते है एवं वो इस हद तक डूब जाते है कि, उन्हें खुद के अस्तित्व के डूबने का भी एहसास नहीं होता।

ज़रा सोचिये ! अगर आपके ही व्यक्तित्व का अस्तित्व नहीं रहेगा तो, रिश्तें निभेंगे कैसे ? क्योंकि आप वो तो हो ही नहीं जो की आप असल में हो। और एक और प्रश्न सामने आता है जो व्यक्ति खुद को ही नहीं संभाल सकता तो वो किसी रिश्तें (Relationships) को कैसे संभालेगा ? रिश्तों ( Relationships ) को संभालना है तो पहले खुद को संभालना सीखिए।

ह्रदय में भावनात्मक भाव रखना अच्छा है। इससे आप जीवित हो इसकी अनुभूति होती है। किन्तु इसका अर्थ यह बिलकुल नहीं है कि, आप भावनाओं में बहकर खुद के अस्तित्व को ही भूल जाओ।

दुनिया में रिश्ते बहुत ही खूबसूरत होते है। जैसे माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, प्रेमी, पडोसी, रिश्तेदार, दोस्त आदि। इन सबको जो व्यक्ति सही तरीके से संजो कर रखता है वही खुश रह पता है एवं यही रिश्ते उसकी मजबूती भी बन जाते है। क्योंकि इन्ही रिश्तों की वजह से ही तो वो खुद पर भरोसा करना सीखता है खुद को भीतरी तरीके से मजबूत बनाता है। इसलिए रिश्तों को सदैव संतुलित करके रखना बेहद ही आवश्यक है।

जैसे कि – आपने देखा होगा अगर हमारे घर में लगाए पौधे के अंदर प्रतिदिन सही मात्रा में पानी दिया जाता है तो वो पौधा बहुत फलता फूलता है। लेकिन उसी पौधे में अगर हम पानी न दे या ज़रूरत से अधिक पानी दे तब क्या होगा ? ज़ाहिर सी बात है पौधा या तो सुख जायेगा या सढ़ के खत्म हो जायेगा।रिश्तों ( Relationships ) को संभालना है तो पहले खुद को संभालना सीखिए।

कुछ ऐसे ही होते है रिश्ते, उन्हें भी प्रतिदिन ख्याल की आवश्यकता होती है किन्तु अगर आप उनका ज़रूरत से ज्यादा ख्याल रखने लगते है तो वही रिश्ते मजबूत होने की जगह खत्म होने लगते है। क्योंकि ज़रूरत से ज़्यादा कुछ भी हो वो हानिकारक ही बन जाता है।

हमारे सभी रिश्तों में एक संतुलन का होना बहुत आवश्यक है। यही संतुलन आगे चलकर रिश्तों की उम्र को बढ़ा देता है। वरना आपने भी देखा होगा कि, कभी कभी किसी से भी रिश्ते ख़राब होने में ज़रा भी देरी नहीं लगती। इसलिए आपको पहले खुद को सँभालने की बहुत आवश्यकता है। यह आवश्यकता आपको स्वार्थी नहीं बनती बल्कि आपको जीने का एक तरीका सिखाती है।

अगर व्यक्ति खुद में ही संतुष्ट एवं खुश नहीं है तो, वो कैसे किसी रिश्ते (Relationships) को ख़ुशी से निभा सकता है ? यदि व्यक्ति खुद में खुश नहीं होता तो, उसको कई मानसिक अवस्था से होकर गुजरना पड़ता है।
  • असंतुष्ट व्यक्ति चिड़चिड़ा हो जायेगा, छोटी-छोटी बात पर चीड़ चीड़ करेगा।
  • कभी किसी भी चीज़ के लिए संतुष्ट नहीं रहेगा।
  • उसके मन में एक साथ हज़ारों विचारों आएंगे जायेंगे।
  • वो खुद को दृणनिश्चयी नहीं बना पायेगा। उसके द्वारा लिए गए फैसले पल पल बदलेंगे।
  • व्यक्ति खुद को अवसाद से घिरा हुआ महसूस करेगा।
  • हर समय उसको किसी न किसी बात का भय रहेगा।

ऐसी कई तरह की समस्या का व्यक्ति को सामना करना पड़ता है। फिर ज़रा सोचिये ! ऐसा व्यक्ति कैसे किसी को खुश रख सकता है, इसलिए सबसे पहले व्यक्ति को स्वयं खुश रहने की आवश्यकता है। रिश्तों (Relationships) को संतुलित बनाने की आवश्यकता है।

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