बस्तियों में क्यों भटकते वन्यप्राणी

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Wild Animals Intrusion

राजएक्सप्रेस, भोपाल। जंगली जानवरों के इंसानी बस्ती में घुसने (Wild Animals Intrusion)की खबरें अब डराती नहीं, बल्कि चिंता पैदा करती है। हम जानवरों के आतंक से आहत तो हैं, मगर उन बिंदुओं पर चर्चा करना तक जरूरी नहीं समझ रहे, जिनके चलते जानवरों को इंसानों के बीच आने को मजबूर होना पड़ रहा है। कायदे से देखें तो जानवर इंसान के नहीं, बल्कि इंसान जानवरों के करीब आता जा रहा है। जंगलों में बढ़ते आवासीय निर्माण की वजह ही जानवरों को विचलित कर रही है।

बाघ-तेंदुये जैसे मांसभोजी पशुओं के बस्तियों के आसपास आवागमन की खबरें मीडिया में अब रोजमर्रा की सुर्खियां बनने लगी हैं। ये वन्यप्राणी लोगों के घरों में घुसकर वारदातों को अंजाम दे रहे हैं। खेत-खलिहानों में दादा के पास सोते पौत्रों को उठाकर ले जाते हैं। मवेशियों का शिकार करके मवेशीखोरी के मॉडल हमारे सामने हैं। मवेशी चराने वालों को इन जंगली जानवरों ने अपना शिकार बनाया है। जैसी कि हमारी संस्कृति है, पहले तो हमने इन खबरों को झुठलाया। लेकिन जब स्वयं वनकर्मियों की बाघ-तेंदुओं से घातक मुलाकातें होने लगीं तब तो एक निहायत दुखद सत्य निश्चय ही सामने आ ही गया। एक बाघ तो भोपाल के एक सरकारी दफ्तर की छत पर कम्प्यूटर बाबा की शैली में धूनी रमाते और धमाचौकड़ी मचाते मिला था। अब बेचारे वनकर्मी क्या करें? सो उन्होंने वैसी ही एडवायजरी जारी कर दी जैसी कि केंद्र द्वारा राज्य सरकारों को दी जाती है। मवेशी जंगलों में न जाएं। लोग वहां न जाएं। बाघमित्र नियुक्त करने की बात थी जो लोगों को बताएं कि यदि यकायक बाघ मिल जाए तो क्या करें? सब जानते हैं कि ऐसी स्थिति में तो जो कुछ करना है वह बाघ को ही करना होता है। न मानें तो आईएफएस के वरिष्ठतम अफसर वहां जाकर देख लें-एकाध जोड़ एक्स्ट्रा पैंट अपने साथ जरूर लेते जाएं। यह सीधा-सीधा मानव-वन्यप्राणी टकराव का मॉडल है। इसे हल्के में लेना आपराधिक लापरवाही है।

मध्यप्रदेश में ऐसे अफसरों की कमी नहीं है जो मैदानी हालात के तहत व्यावहारिक वन और वन्यप्राणी-प्रबंधन लागू करने में सर्वथा समर्थ हैं। फिर ऐसे हालात क्यों बन रहे हैं? क्या वनसेवा का त्रिभुज उलटा हो गया है जिसमें साहब लोग जरूरत से ज्यादा हैं और मैदानी कर्मी यानी फॉरेस्ट गार्ड से लेकर रेन्जर तक आनुपातिक रूप से कम हैं? क्या डिजिटल सर्विलेंस उस परंपरागत वनकर्मी-संस्कृति पर हावी है जिसमें वनकर्मी सूर्योदय के पूर्व अपने प्रभारों का गश्त करके कुदरत की उस किताब से रूबरू होते थे जो कम्प्यूटर कैमराट्रेप और जीपीएस जैसी विधाओं को जननी है? प्रौद्योगिकी हमारी अनुजा है, अग्रजा नहीं। वह निश्चय ही हमारी कार्यक्षमता में वृद्धि करती है लेकिन उसका विकल्प नहीं है। वह तो शक्ति (पॉवर) है, लेकिन ऊर्जा (एनर्जी) नहीं।

सब जानते हैं कि यदि वन्य जीवन को अनुकूल प्राकृतिक रहवास हो तो उसकी उपस्थिति बस्तियों के आसपास अपवाद स्वरूप ही होगी। वन्यपशु विशेषकर मांसभोजी, कभी भी मानव के समीप नहीं जाना चाहता। अनुकूल रहवास का सीधा मतलब है सुरक्षा, भोजन और प्रजनन का अनुकूल प्राकृतिक पर्यावरण। देश के सर्वाधिक राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्य तो मध्यप्रदेश में ही हैं। सवरेत्तम प्रशिक्षित और कार्यक्षम वनसेवा हमारे यहां प्रत्येक स्तर पर मौजूद है। परन्तु क्या राजनीतिक नेतृत्व नेकनियत-पर्यावरण-मित्र है ? क्या हमारी वन और वन्यप्राणी संरक्षण तथा प्रबंधननीति पर खनिज-लॉबी, पर्यटन-लॉबी और निर्माण-लॉबी हावी नहीं है। स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड का एजेंडा उठाकर देख लें। पता चल जाएगा। केन-बेतवा लिंक परियोजना की कुंडली देख लें। पता चल जाएगा कि उसमें पन्ना नेशनल पार्क का कितना कोर एरिया डूब में जाने वाला है। एक दिन न पार्क रहेगा न पानी- प्रदेश के ही एक पूर्व वन सचिव और प्रख्यात वन्यप्राणीविद् एमके रणजीत सिंह ने अभी हाल ही में भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में चेतावनी के स्वर में विलाप किया था। उद्योग-लॉबी के दबाव की वजह से रातापानी अभ्यारण्य को टाइगर रिजर्व का दर्जा नहीं मिल पा रहा है जबकि पैसा केंद्र देता है। उद्योगीकरण होना चाहिए लेकिन कल के दिन अगर कान्हा राष्ट्रीय उद्यान के नीचे हीरे की खदानों का पता चले तो क्या हम कान्हा को खोद डालेंगे।

राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रेत-माफिया की गतिविधि के कारण चम्बल घड़ियाल अभ्यारण्य से घड़ियाल लुप्त हो गया है। मंत्रियों के बोल कभी-कभी इतने लोक लुभावन होते हैं कि एक मंत्रणी ने तो पन्ना के बाघ को बुन्देली बाघ की संज्ञा देकर प्राणि-विज्ञान को पानी भरवा दिया। आज हमारे प्रदेश में मानव-वन्य जीवन टकराव का जो मॉडल उभरता दिखाई दे रहा है उसकी जड़ें गत सात दशकों के एकांगी विकास-मॉडल में हैं। भोपाल के आसपास जिन क्षेत्रों में आज बाघ दाखिल हो जाता है वह अंधाधुंध नगरीकरण के पहले उसी का क्षेत्र था। यदि वन्यप्राणी पानी की तलाश में बस्तियों की तरफ आ रहे हैं तो उसका कारण भी वन-प्रबंध में ही खोजना होगा क्योंकि व नही जलधाराओं को बारामासी प्रवाहित रखते हैं। यदि बाघ, तेंदुये शिकार की तलाश में बस्तियों के पास आकर मवेशीखोर या नरभक्षी बनते हैं तो उसका कारण हमारी चारागाह-नीति में खोजना होगा जो है ही नहीं। अतिक्रमण नियमित करने के चक्कर में अतिक्रामक को बढ़ावा मिल रहा है। मांसभोजियों को चीतल, सांभर, नीलगाय, हिरण, सुअर, खरगोश आदि शाकभोजी प्रजातियों की प्री-बेस चाहिए और उन्हें चाहिए चारा, घास, पत्ती आदि। इसका सीधा मतलब है कि वन्यप्रणी-प्रबंधन के साथ-साथ वन-प्रबंधन चाहिए और उसके भी पहले संतुलित भू-उपयोग (लैंड यूज) की जरूरत है। जब बिगड़े वनों के सुधार जैसी योजनाएं वन विभाग वर्षो से लागू करता है, तब सहज सवाल उठता है कि क्या यह इलाके इतने बिगड़ैल हैं कि जो एक सदी के बाद सुधरने के बदले बिगड़ते ही जा रहे हैं? जब यह संस्कृति है तो फिर दो संरक्षित क्षेत्रों के बीच के वनविहीन कॉरीडोर को वृक्षाच्छादित करके वन्यपशुओं के बाधाहीन विचरण की योजना क्या मुंगेरीलाल का सपना बनकर नहीं रह जाएगी। मंत्रीजी चुनाव-दर-चुनाव जीतते जाएंगे। अफसर अपना प्रमोशन और अपनी पेंशन लेकर घर चले जाएंगे। प्रभु करे कि हम सब अति दीर्घजीवी हों क्योंकि इस सदी के अंत तक सांस लेने के लिए क्या नौकर रखेंगे।

जंगली जानवरों के शहरों में आने की घटनाओं के बाद लगने लगा है कि मानो अपनी रिहाइश को लेकर इंसान और जंगली जानवरों के बीच जंग सी छिड़ी हुई है। असंतुलित एवं अनियंत्रित विकास से जंगल नष्ट हो रहे हैं और वहां रहने वाले जंगली जानवर कंक्रीट के आधुनिक जंगलों में भूखे-प्यासे और बौखलाए हुए भटक रहे हैं। पूरे देश में ऐसी घटनाएं रुकने की बजाए बढ़ती जा रही हैं, ऐसे में सवाल पूछा जाना चाहिए कि जानवर इसानों की बस्ती में घुस रहे हैं या इंसान जानवरों के क्षेत्र को कब्जा रहे हैं? वास्तव में मानवीय हस्तक्षेप और दोहन के कारण न सिर्फ वन क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं, बल्कि वन्य जीवों के शांत जीवन में मानवीय खलल में भी सीमा से अधिक वृद्धि हुई है। घास के मैदान कम होने से वे जीव भी कम हुए हैं, जो मांसाहारी जंगली जानवरों का भोजन होते हैं। भोजन की अनुपलब्धता उन्हें इंसानी बस्तियों में खींच लाती है, जिसके बाद मानव और वन्यजीव संघर्ष की तस्वीरें सामने आती हैं। दुनिया भर में जंगली जानवरों के हमलों में हर साल सैकड़ों लोग अपनी जान गंवाते हैं तो बड़ी संख्या में लोग घायल भी होते हैं।मनुष्य ने अपने निजी स्वार्थो के चलते आज वनों का अनुचित तरीके से विदोहन किया किया है, जिसके चलते आज जंगली जानवर आबादी की ओर आ रहे हैं और दोनों के बीच संघर्ष बढ़ रहा है। इस संघर्ष को तुरंत रोका जाना समय की जरूरत है और देश और समाज के हित में भी जरूरी है।
घनश्याम सक्सेना (वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार)

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