मुद्रास्फीति नरम रहने के आसार

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CPI Inflation

राजएक्सप्रेस, भोपाल। मार्च महीने में सीपीआई मुद्रास्फीति (CPI Inflation)घटकर 4.24 फीसदी हो गई, जो पिछले महीने 4.44 फीसदी थी। इस महीने खाद्य व पेय पदार्थो और ईंधन की कीमतों में क्रमश: 3.01 फीसदी और 5.73 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जो फरवरी में क्रमश: 3.46 फीसदी और 6.88 फीसदी थी। अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यह बताता है कि तेल की कीमतों को अचानक से विनियंत्रित करने से मुद्रास्फीति में तेज बढ़ोतरी हो सकती है, जैसा कि इंडोनेशिया में कुछ समय पहले हुआ था।

मार्च महीने में सीपीआई मुद्रास्फीति (CPI Inflation) घटकर 4.24 फीसदी हो गई, जो पिछले महीने 4.44 फीसदी थी। इस महीने खाद्य व पेय पदार्थो और ईंधन की कीमतों में क्रमश: 3.01 फीसदी और 5.73 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है, जो फरवरी में क्रमश: 3.46 फीसदी और 6.88 फीसदी थी। इस बीच, फरवरी,18 का संशोधित कोर सीपीआई जो 5.16 फीसदी था वह मार्च में बढ़कर 5.37 फीसदी हो गया है, जिसका कारण शिक्षा और अन्य सेवाओं के घटकों में बढ़ोतरी का होना है। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ोतरी का कारण ट्यूशन शुल्क में इजाफा होना है। मार्च महीने में ग्रामीण मुद्रास्फीति 4.44 फीसदी रही, जो शहरी मुद्रास्फीति 4.12 फीसदी से ज्यादा है। कच्चे तेल की कीमत जून-17 के 46 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर जनवरी-18 में 67 डॉलर प्रति बैरल हो गई। बाद में इसमें गिरावट आई, लेकिन 60 से 67 डॉलर प्रति बैरल की सीमा में इसमें उतार-चढ़ाव आता रहा।

पेट्रोलियम निर्यात करने वाले देशों के संगठन (ओपेक) ने वर्ष 2018 के अंत तक उत्पादन में कटौती का विस्तार करने का निर्णय लिया है। बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मौजूदा तेल भंडार का उपयोग करने की योजना है। इसकी कुछ हद तक पूर्ति अमेरिका में हो रहे कच्चे तेल उत्पादन से की जाएगी। इस आधार पर कहा जा सकता है कि इस साल कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल होगी, जो वर्ष 2017 के दौरान 54 डॉलर प्रति बैरल थी। बाजार में आशंका है कि तेल की कीमतों में निरंतर वृद्धि से मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटे और चालू खाता के घाटे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, लेकिन ऐसा मानने का सशक्त आधार नहीं है। कम से कम मुद्रास्फीति पर कच्चे तेल की कीमतों का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। डर यह भी है कि कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से सभी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में बढ़ोतरी होगी और इससे मुद्रास्फीति में वृद्धि होगी। हालांकि, मामले में रिजर्व बैंक की रिसर्च दूसरी कहानी बताती है। यह अध्ययन वर्ष 2012 में किया गया था, जिसके अनुसार घरेलू कीमतों के कैलिब्रेटेड और चरणबद्ध समायोजन की रणनीति मुद्रास्फीति को बढ़ाने और विकास को अस्थिर करने के बजाय मुद्रास्फीति की संभावनाओं को स्थिर करने में उपयोगी होती है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यह बताता है कि तेल की कीमतों को अचानक से विनियंत्रित करने से मुद्रास्फीति में तेज बढ़ोतरी हो सकती है, जैसा कि इंडोनेशिया में कुछ समय पहले हुआ था। भारत में पेट्रोलियम की कीमतों को चरणबद्ध तरीके से विनियंत्रित किया गया है और कीमतें दैनिक आधार पर समायोजित की जा रही हैं। इसलिए यहां अचानक से ईंधन की कीमत में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। यदि हम कच्चे तेल के संदर्भ में सीपीआई का अध्ययन करते हैं तो जून-17 से मार्च-18 की अवधि में कच्चे तेल की कीमतें जून-17 से बढ़ने लगीं। औसत कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी 17 डॉलर प्रति बैरल की हुई, जिसका प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव लगभग 13 आधार अंकों का रहा। कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि होने पर सीपीआई में 10 आधार अंकों की बढ़ोतरी होती है।

अगर कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि जारी रहती है तो सरकार को उत्पाद शुल्क में कटौती करनी पड़ सकती है। पेट्रोल और डीजल पर शुल्क आरोपित करने जैसे पिछले रुझानों से पता चलता है कि हर 10 डॉलर प्रति बैरल कच्चे तेल के मूल्य में बढ़ोतरी होने पर उत्पाद शुल्क में एक रुपए कटौती हो सकती है। गणना से पता चलता है कि इस तरह की कटौती से सरकारी राजस्व 11905 करोड़ रुपए सालाना कम हो सकती है, जिससे राजकोषीय घाटे में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.06 फीसदी वृद्धि होगी। तेल की कीमत में वार्षिक स्तर पर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से तेल के आयात में लगभग 58 हजार 678 करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे वित्त वर्ष 2019 में कैड पर जीडीपी का 0.3 फीसदी का अतिरिक्त प्रभाव पड़ेगा, जो कच्चे तेल की कीमत के 66 डॉलर प्रति बैरल रहने और जीडीपी की वृद्धि 11.5 फीसदी के दर से होने के अनुमान पर आधारित है।

इस तरह कहा जा सकता है कि कच्चे तेल की कीमत का कारोबार पर पड़ने वाला प्रभाव पहले से कम हुआ है, जिसका कारण प्रौद्योगिकी के प्रसार एवं ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में इजाफा का होना हो सकता है। भारत में पिछले चार वर्षो में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों में 1.4 गुना की वृद्धि हुई है। साथ ही, कुशल श्रम की प्रचुरता ने भी मुद्रास्फीति को कम करने का काम किया है। कुशल मजदूरों में बढ़ोतरी से मजदूरों को वाजिब मजदूरी नहीं मिल पा रही है, जिससे वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति में गिरावट आ रही है। मजदूरी में कम वृद्धि के कारण उपभोक्ता कम खर्च कर पा रहे हैं, जिससे कमजोर मुद्रास्फीति की गतिशीलता बढ़ गई है। भारत में सूचीबद्ध कंपनियों का मजदूरी बिल में वित्त वर्ष-18 में 2.9 फीसदी बढ़ोतरी होने का अनुमान है। मौजूदा समय में वित्त को छोड़कर दूसरे सभी क्षेत्रों में मजदूरी में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है।

हालांकि, सरकार कह रही है कि अर्थयवस्था पिछले कुछ सालों के मुकाबले अब बेहतर स्थिति में है, मगर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें आगे की राह में बड़ी बाधा खड़ी करने को तैयार है। कच्चे तेल की कीमतों पर नियंत्रण हासिल कर सरकार अपने लक्ष्य को पा सकती है, लेकिन यह ऐसा काम है, जो एक-दो दिन में कदापि नहीं हो सकता। मोदी सरकार सत्ता में आने के बाद से अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर जिस तरह से काम कर रही है, उसमें कभी वह पूरी तरह सफल तो कभी ठिठकी हुई नजर आती है। इसका प्रमुख कारण अंतररराष्ट्रीय बाजार में होने वाला उतार-चढ़ाव है। सरकार बनने के बाद कच्चे तेल के दामों में नरमी का सरकार ने खूब फायदा उठाया और अर्थव्यवस्था को गति देने में सफल रही। इस बीच नोटबंदी और जीएसटी के फैसलों ने आर्थिक मोर्चे पर कई चुनौतियां पेश कीं। अब जबकि नोटबंदी और जीएसटी का प्रभाव पूरी तरह खत्म हो चुका है, तो कच्चे तेल के दामों में बढ़ोतरी शुरू हो गई। सीरिया में अमेरिका की कार्रवाई के बाद जिस तेजी से घटनाक्रम बदल रहा है, उसे देखते हुए कच्चे तेल के दाम में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

अब जबकि चीजें सरकार के हाथ में हैं (भारत के लिहाज से), तो यह मानने में गुरेज नहीं कि आने वाले दिनों में स्थिति में बदलाव देखने को मिलेगा। सरकार को आर्थिक मोर्चे पर अपने काम को और गति देनी चाहिए। आज मुद्रास्फीति में नरमी के जो आसार दिख रहे हैं, वे संभव है कि अस्थाई हों और आने वाले दिनों में चीजें बेहतर हो जाएं। सरकार देश की अर्थव्यवस्था सुधारने के जो प्रयास कर रही है, उसे लेकर एसोचैम समेत कई आर्थिक मंचों से इस तरह की शंकाएँ जताई गई थीं। सो, इसे संक्रमण काल के रूप में भी देखा जा सकता है। अभी तो सरकार पर भरोसा करना ही ठीक है।
सतीश सिंह (आर्थिक मामलों के जानकार)

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